Padma Shri Umashankar Pandey: बुंदेलखंड का ‘पानी का पहरेदार’ जिसने मेड़ और पेड़ से बदली किसानों की किस्मत

उमा शंकर जी (Padma Shri Umashankar Pandey: बुंदेलखंड का 'पानी का पहरेदार' जिसने मेड़ और पेड़ से बदली किसानों की किस्मत) कहते हैं कि उन्होंने न तो कभी कृषि लैब (Agricultural Lab) देखी, न ही कोई औपचारिक ट्रेनिंग ली। उनका तो बस एक ही नारा था- ‘खेत की मेड़बंदी करो और उन मेड़ों पर पेड़ लगाओ’।

Padma Shri Umashankar Pandey: बुंदेलखंड का 'पानी का पहरेदार' जिसने मेड़ और पेड़ से बदली किसानों की किस्मत

‘मैं लैब का आदमी नहीं, लैंड का आदमी हूं।’ ये शब्द हैं पद्मश्री उमा शंकर पांडे (Padma Shri Umashankar Pandey) के,जिन्होंने बिना किसी डिग्री या लैब ट्रेनिंग (Degree or lab training) के, सिर्फ अपने ‘खेत पर मेड़ और मेड़ पर पेड़’ के मंत्र से बुंदेलखंड के सूखाग्रस्त इलाकों (drought-affected areas of Bundelkhand) में पानी लौटा दिया। किसान ऑफ इंडिया सम्मान 2025 (Kisan of India Samman 2025) के मंच से उन्होंने जल संकट और टिकाऊ खेती (Water crisis and sustainable agriculture) पर जो गहरी और मार्के की बातें कहीं, वो हर नागरिक और नीति-निर्माता के लिए सोचने का विषय है।

विज्ञान नहीं, विवेक से किया काम

उमा शंकर जी कहते हैं कि उन्होंने न तो कभी कृषि लैब (Agricultural Lab) देखी, न ही कोई औपचारिक ट्रेनिंग ली। उनका तो बस एक ही नारा था- ‘खेत की मेड़बंदी करो और उन मेड़ों पर पेड़ लगाओ’। इस साधारण से सिद्धांत ने बुंदेलखंड का नक्शा बदल दिया। जहां पहले मालगाड़ियों से पानी जाता था, आज वहां से बासमती चावल आता है। बिना किसी बड़े अनुदान या एनजीओ के, सिर्फ समुदाय की मेहनत से 10-15 सालों में वॉटर लेवर 20 फीट ऊपर आया।

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पुरखों की तकनीक ही असली विज्ञान है

वो सवाल उठाते हैं कि ‘जिस खाद ने जमीन बर्बाद की, लाखों कुएं सूखाए, आज वही लैब वाले कह रहे हैं गोबर की खाद डालो।’ उनका मानना है कि Modern science अभी तक उन पुरखों की तकनीकों तक नहीं पहुंच पाया, जो पहाड़ों पर कुएँ और तालाब बनाते थे या ‘मेघ मल्हार’ से बादल बरसाते थे। ‘विज्ञान बादल को दो हिस्सों में नहीं बांट सकता, न ही उसे वापस लौटा सकता है, वे कहते हैं।

चौंकाने वाले आंकड़े और सवाल

उन्होंने कुछ ऐसे फैक्ट्स सामने रखे जो हमें झकझोर देते हैं- 

  • दुनिया की 18 फीसदी आबादी हमारे पास, लेकिन सिर्फ 4 फीसदी ज़मीन और 1 प्रतिशत पीने लायक पानी।
  • देश में 80 कृषि विश्वविद्यालय हैं, लेकिन जल की एक भी यूनिवर्सिटी नहीं।
  • पूरी दुनिया में Water Museum या पानी की पाठशालाएं नहीं हैं।

‘धान’ पर विवाद और स्थानीय समाधान

जब धान को पानी की फसल कहा जाता है, तो वे सवाल करते हैं कि ‘जगन्नाथ का भात’ सदियों से हमारा मुख्य भोजन (Main course) रहा है। समस्या फसल में नहीं, बल्कि समानता थोपने में है। उनका साफ मत है कि हर क्षेत्र की अपनी जलवायु है। हिमाचल सेब के लिए उपयुक्त है, महाराष्ट्र प्याज के लिए, बुंदेलखंड मसालों के लिए। ज़बरदस्ती गन्ना या धान थोपना ही संकट का कारण है।

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पानी का बाज़ार और भविष्य की चेतावनी

वे चेतावनी देते हैं कि आज Technology फायदा कर रही है, लेकिन यही 20 साल बाद नुकसान करेगी। पानी को 10 रूपये से लेकर 5000 रुपये तक बेचा जा रहा है, एक बड़ा बाज़ार खड़ा हो गया है। जबकि पानी जीवन का आधार है- बच्चे के शरीर में 80 फीसदी पानी है, बूढ़े में 48 फीसदी।

समाधान: वापस पुरखों के रास्ते पर

उनका मैसेज क्लियर है- ‘हमें पुरखों के जल जोड़ने के बेजोड़ तरीकों को फिर से अपनाना होगा।’ उनकी सफलता इस बात का जीता-जागता प्रमाण है कि टिकाऊ विकास का रास्ता लैब से नहीं, बल्कि ज़मीन और समुदाय की साझी समझ से निकलेगा। बुंदेलखंड में हर हरा-भरा खेत और भरा कुआं, उमा शंकर पांडे के इसी सोंच की सच्ची मिसाल है।

 

सम्पर्क सूत्र: किसान साथी यदि खेती-किसानी से जुड़ी जानकारी या अनुभव हमारे साथ साझा करना चाहें तो हमें फ़ोन नम्बर 9599273766 पर कॉल करके या kisanofindia.mail@gmail.com पर ईमेल लिखकर या फिर अपनी बात को रिकॉर्ड करके हमें भेज सकते हैं। किसान ऑफ़ इंडिया के ज़रिये हम आपकी बात लोगों तक पहुँचाएँगे, क्योंकि हम मानते हैं कि किसान उन्नत तो देश ख़ुशहाल।

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