Table of Contents
भूसे का इस्तेमाल जानवरों के चारे के रूप में होता है, इसलिए किसान गेहूं की कटाई के बाद पूरे साल चारे के रूप में भूसा स्टोर करके रखते हैं। मगर भूसा हल्का होता है और बिखरा रहता है जिसकी वजह से भूसा स्टोरेज के लिए ज़्यादा जगह की ज़रूरत पड़ती है, मगर अब ऐसा नहीं है। क्योंकि अब कई नई तकनीक ने इस काम को आसान बना दिया है। जयपुर के गोपाल निठारवाल, जो पिछले 20 सालों से भूसे का व्यापार कर रहे हैं, बता रहे हैं कि कंप्रेशन मशीन की मदद से भूसे को दबाकर छोटे-छोटे गट्ठों में बदलकर आसानी से स्टोर किया जा सकता है, इससे किसानों के समय, मेहनत और जगह की बचत होती है।
कम जगह में ज़्यादा भूसा स्टोरेज
गेहूं की कटाई के बाद उसकी थ्रेसिंग की जाती है, फिर अपशिष्ट यानी भूसे को जानवरों के लिए स्टोर किया जाता है। भूसे को स्टोर करना थोड़ा मुश्किल होता है, क्योंकि वो बिखरा हुआ होता है। लेकिन अब कई नई तकनीक आ चुकी है जिससे कम जगह में ज़्यादा भूसे को स्टोर किया जा सकता है। जयपुर के गोपाल निठारवाल, जो 20 सालों से भूसे का व्यापार कर रहे हैं उनका कहना है कि 4-5 साल से वो नई तकनीक से बने भूसे के गट्ठे मंगाकर बेच रहे हैं। दरअसल, कंप्रेशन मशीन से दबाकर बिखरे हुए भूसे का गट्ठा बनाया जाता है।
क्या होता है फ़ायदा?
गोपाल निठारवाल का कहना है कि भूसे का गट्ठा बनाने का फ़ायदा ये होता है कि इससे कम जगह में ज़्यादा भूसा स्टोर किया जा सकता है और गाड़ी से ले जाने में भी आसान होता है। वो पंजाब से भूसे का गट्ठा मंगार बेचते हैं। इसके एक बंडल में 150 से 160 किलो भूसा होता है। गट्ठा बन जाने पर भूसा एक साथ दब जाता है जिससे छोटी सी जगह में 50-60 क्विंटल भूसा आ जाता है। गोपाल कहते हैं कि वो फोन पर ही ऑर्डर देकर भूसा मंगा लेते हैं। वो 700 रुपए प्रति क्विंटल भूसा मंगाते हैं और 725 रुपए प्रति क्विंटल पर बेचते हैं।
इतना ही नहीं इसकी क़ीमत में भी बदलाव होता है जब भूसा कम होता है तो इसकी क़ीमत बढ़ जाती है और जब अधिक होता है तो क़ीमत कम हो जाती है। वो पूरे साल भूसे का कारोबार करते हैं। उनके यहां छोटे से बड़े हर तरह के किसान भूसा ले जाते हैं। कोई 2 गट्ठे भी ले जाता है और कोई 20 गट्ठे भी साथ में ले जाता है।
वो बताते हैं कि गर्मियों में जब हरा चारा कम होता है तो भूसे की मांग ज़्यादा होती है और गर्मी में ही ये सबसे सस्ता होता है, क्योंकि उस समय गेहूं की कटाई होती है। भूसा सबसे महंगा होता है दीवाली के समय जब चारा खत्म हो जाता है और उस समय तक गेहूं की बुवाई हो जाती है। बरसात के समय भूसे को बचाने के लिए वो इसे पॉलीथीन से ढंककर बांध देते हैं।
जैव प्लास्टिक के रूप में भूसे का इस्तेमाल
पुश चारे के अलावा भूसे के दूसरे कई इस्तेमाल भी है। गेहूं के भूसे में सेल्यूलोज होता है और इसे दोबारा इस्तेमाल करके प्लास्टिक जैसा पदार्थ बनाया जा सकता है। साधारण प्लास्टिक कृत्रिम पॉलीमर से बनाया जाता है, जबकि गेहूं के भूसे से बने पॉलीमर पूरी तरह से प्राकृतिक होते हैं। गेहूं के भूसे से बने प्लास्टिक से कंटेनर, स्ट्रॉ, प्लास्टिक प्लेट, कॉफी कप जैसी कई उपयोगी चीज़ें बनाई जा सकती है। यानी यह प्लास्टिक उत्पादों का बेहतरीन विकल्प साबित हो सकता है।
दरअसल, गेहूं की फ़सल में लिग्निन नाम तत्व होता है, जिसे चीनी में मिलाकर बायो-प्लास्टिक में तब्दील की जाता है। प्लास्टिक बनाने के लिए सबसे पहले लिग्निन को तोड़ा जाता है, इसे मिट्टी में पाए जाने वाले रोडोकोकस जोस्टी नामक बैक्टीरिया से तोड़ा जाता है। यह बैक्टीरिया एसिड उत्पन्न करता है जिससे लिग्निन कुदरती रूप से टूट जाता है। टूटने के बाद इसे चीनी के साथ मिलाकर प्लास्टिक जैसा पदार्थ बनाया जाता है। फिर इस पदार्थ से कप, प्लेट, स्ट्रॉ, कंटेनर जैसी चीज़ें बनाई जाती है। ये चीज़ें पर्यावरण के अनुकूल होती है और उसे प्रदूषित नहीं करती हैं।
ऊर्जा का स्रोत है भूसा
भूसे का उपयोग चारे और जैविक प्लास्टिक में करने के अलावा बायोगैस और अन्य जैव ऊर्जा (जैसे बायोएथेनॉल और बायो-तेल) के उत्पादन के लिए किया जा सकता है। बायोगैस बनाने के लिए, भूसे को अन्य बायोमास के साथ ‘अवायवीय पाचन (anaerobic digestion)’ नाम की प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है, इस प्रक्रिया में मौजूद सूक्ष्मजीव भूसे को मीथेन और कार्बन डाइऑक्साइड में तोड़ते हैं। भूसे को सीधे जलाने से वायू प्रदूषण होता है, लेकिन ऊर्जा उत्पादन के लिए इसका उपयोग करके वायु प्रदूषण को कम किया जा सकता है और ये टिकाऊ ऊर्जा का एक स्रोत बन सकता है।
मल्चिंग के रूप में इस्तेमाल
भूसे का इस्तेमाल मल्चिंग की तरह भी किया जा सकता है। इस विधि में पौधों के बेहतर विकास के लिए मिट्टी की सतह पर भूसे की एक परत बिछाई जाती है। इसके कई फ़ायदे हैं, जैसे इससे मिट्टी में नमी बनी रहती है, खरपतवार नियंत्रण में मदद मिलती है, मिट्टी के कटाव को कम करने और मिट्टी के तापमान को संतुलित करने में भी मदद मिलती है। यह जैविक मल्चिंग का एक प्रकार है जो उत्पादन बढ़ाने के साथ ही मिट्टी के स्वास्थ्य में सुधार करता है।
ईंट बनाने में भूसे का इस्तेमाल
ईंट बनाने में भूसे का उपयोग दो तरीके से किया जाता है। एक तो मिट्टी-भूसे की ईंटें बनाने के लिए एक निर्माण सामग्री के रूप में इसका इस्तेमाल होता है और दूसरा ईंट पकाने के लिए ईंधन के रूप में भी भूसे का उपयोग किया जाता है। मिट्टी-भूसे की ईंट बनाने के लिए भूसे को मिट्टी और पानी में मिलाकर ईंटें बनाई जाती है, ये बिना पकी हुई होती है इसलिए ये पर्यावरण के अनुकूल होती हैं। इसके अलावा ईंट पकाने के लिए भट्टी में कोयले की जगह ईंधन के रूप में भूसे का इस्तेमाल किया जा सकता है।
भूसे को लेकर लगातार एक्सपेरिमेंट हो रहे हैं और उससे अलग-अलग उत्पाद बन रहे हैं। भूसे से हस्तनिर्मित टोकरी और सजावट के कई सामान बनाए जा रहे हैं। धान-गेहूं के भूसे का इस्तेमाल हो जाने पर उसे जलाने से होने वाले प्रदूषण से छुटकारा मिल जाएगा।
ये भी पढ़ें : हिमाचल के सेवानिवृत्त फ़ौजी किसान सुरेश कुमार ने मिट्टी बचाने की राह पर अपनाई प्राकृतिक खेती
सम्पर्क सूत्र: किसान साथी यदि खेती-किसानी से जुड़ी जानकारी या अनुभव हमारे साथ साझा करना चाहें तो हमें फ़ोन नम्बर 9599273766 पर कॉल करके या kisanofindia.mail@gmail.com पर ईमेल लिखकर या फिर अपनी बात को रिकॉर्ड करके हमें भेज सकते हैं। किसान ऑफ़ इंडिया के ज़रिये हम आपकी बात लोगों तक पहुंचाएँगे, क्योंकि हम मानते हैं कि किसान उन्नत तो देश ख़ुशहाल।

