Biofloc Fish Farming In India: बायोफ्लॉक मछली पालन शुरू करने के लिए किन चीज़ों की होती है ज़रूरत?

छत्तीसगढ़ के दुर्ग ज़िले के पथरिया (डोमा) गांव में मत्स्य पालन विभाग ने बायोफ्लॉक तकनीक (Biofloc Technique) से पहला फ़िश फार्म (Fish Farm) स्थापित किया।

बायोफ्लॉक मछली पालन

 

खेती और खेती से जुड़े हर क्षेत्र में  नई तकनीकें ईज़ाद होती रहती हैं। मछली पालन के क्षेत्र में ऐसी ही एक नई तकनीक है बायोफ्लॉक, जिसमें मछलियों के अपशिष्ट को दोबारा फ़ीड में बदल दिया जाता है। अगर आप मछली पालन के बारे में सोच रहे हैं, लेकिन आपके पास तालाब बनाने के लिए पर्याप्त ज़मीन नहीं है, तो बायोफ्लॉक तकनीक आपके लिए सही है, क्योंकि इसमें आप एक टैंक में मछली पालन कर सकते हैं। छत्तीसगढ़ के दुर्ग ज़िले के पथरिया (डोमा) गांव में मत्स्य पालन विभाग ने बायोफ्लॉक तकनीक से पहला फ़िश फार्म (Fish Farm) स्थापित किया। यहां 15 हज़ार तेलापिया मछलियों को पाला जा रहा है। इस फिश फार्म की निरिक्षक स्वीटी सिंह ने मछली पालन की नई तकनीक यानि बायोफ्लॉक मछली पालन पर खुलकर बात की किसान ऑफ इंडिया की संवाददाता एश्वर्या श्रीवास्तव से।

क्यों अपनाई बायोफ्लॉक मछली पालन तकनीक?

स्वीटी सिंह का कहना है कि पथरिया गांव में बायोफ्लॉक की शुरुआत करने का मकसद है कि गांव के लोगों को ज़्यादा रोज़गार मिले और वो आत्मनिर्भर बनें। उन्होंने बताया कि मछली पालन की शुरुआत के लिए सबसे पहले कोलकाता से मछलियां मंगाई गई और उसे फ़ार्म में रखकर पहले देखा गया कि वो नए वातावरण में कैसे ढलती हैं। उसके बाद मछलियों को यहां टैंक में डाला गया और उसके बाद 60 टैंक में कुल 15 हजार मछलियां लाई गई।

क्या है बायोफ्लॉक तकनीक?

बायोफ्लॉक मछली पालन तकनीक के बारे में स्वीटी सिंह बताती हैं कि दरअसल, ये एक प्रोसेस है जिसमें नाइट्रोजन साइकल को मेंटेन करना होता है, इस तकनीक का सिद्धांत ही है कि फिश टैंक के अंदर नाइट्रोजन साइकल को मेंटेन किया जाए। मछलियां जो आहार खाती हैं उसका 75 फीसदी अपशिष्ट निकालती हैं जिसकी वजह से टैंक या किसी भी सिस्टम में अमोनिया की मात्रा बढ़ जाती है, ये अमोनिया मछलियों के लिए हानिकारक होता है। इसलिए इस अमोनिया को नाइट्रोजन में बदलने की एक प्रक्रिया होती है जिसे फ्लॉक्यूलेशन (flocculation) या नाइट्रोजन साइकल कहते हैं, इस प्रक्रिया से जो उत्पाद प्राप्त होता है उसे फ्लॉक (floc) कहते हैं, तो पहले इसमें पहले कार्बन के सोर्स के रूप में गुड़ डालते हैं और नाइट्रोजन के लिए अमोनिया का इस्तेमाल किया जाता है और इसमें कुछ प्रोबायोटिक, बैक्टीरिया और कुछ यीस्ट डालते हैं। बैक्टीरिया और यीस्ट अमोनिया को नाइट्रोजन में बदलता है और जो अच्छे बैक्टीरिया विकसित होते हैं वो इसे फ्लॉक में बदल देते हैं जिसे मछलियां खाती हैं। ये फ्लॉक माइक्रोऑर्गेनिज़्म और माइक्रोन्यूट्रिएंट का मिश्रण होती है जो मछलियों के लिए फायदेमंद होता है। फ्लॉक बनने की ये प्रक्रिया चलती रहती है। मछलियां फ्लॉक खाएंगी और अपशिष्ट निकालेंगी और फिर अमोनिया को नाइट्रोजन में बदलने की प्रक्रिया होगी और फिर से फ्लॉक बनेंगे। बायोफ्लॉक तकनीक का मुख्य मकसद है अपशिष्ट की रिसाइकलिंग। इसमें बैक्टीरिया पानी को प्यूरिफाई करते रहते हैं यानी कम पानी की ज़रूरत होती है। इस सिस्टम से डबल फायदा होता है फ्लॉक के रूप में मछलियों को प्रोटीन मिल जाता है और पानी भी प्यूरीफाई हो जाता है। कम जगह, पानी और मछलियों का आहार बचाने के लिए बेहतरीन तकनीक है।

बायोफ्लॉक तकनीक में मछली प्रजातियों का चयन

स्वीटी बताती हैं कि बायोफ्लॉक क्योंकि टैंक सिस्टम है तो इसमें ऐसी मछलियां पालनी चाहिए जो थोड़ी हार्ड यानी सख्त प्रजाति की है, मतलब ये कि वो तापमान, पीएच के बदलाव को सहन कर सकें। हार्डी फिश एयर ब्रिदिंग और नॉन एयर ब्रिदिंग फिश हो सकती हैं, बस ये थोड़ी मज़बूत होनी चाहिए जो वातावरण के बदलाव और पीएच आदि को सहन कर सके। पथरिया गांव के फिश फार्म में फिलहाल तेलापिया मछलियों का पालन किया जा रहा है, लेकिन आप इसमें पंगेशियस भी पाल सकते हैं।

Biofloc Fish Farming In India: बायोफ्लॉक मछली पालन शुरू करने के लिए किन चीज़ों की होती है ज़रूरत?

बायोफ्लॉक शुरू करने के लिए किन चीज़ों की ज़रूरत?

मत्स्य पालन विभाग की निरिक्षक स्वीटी सिंह कहती हैं कि बायोफ्लॉक सिस्टम शुरू करने के लिए पानी और बिजली की उपलब्धता पहली ज़रूरत है। जब उन्होंने यहां काम शुरु किया तो दोनों ही चीज़ें उपलब्ध थीं। लेकिन यहां कि मिट्टी गीली थी, जो पैरों में चिपकती जिससे सिस्टम को ऑपरेट करने में मुश्किल होती थी, इसलिए पहले उसे समतल बनाया गया और फिर टैंक सेटअप किया जिसमें 2-3 महीने का समय लगा। फिर टैंक में 5-6 दिन तक पानी भरकर रखा, तो देखा की पानी हार्ड था। फिर चूना आदि डालकर उसे सामान्य करने की कोशिश की गई। उसके बाद इसमें कुछ मछलियां लाकर डाली और देखा क्या वो यहां एडजस्ट हो पाती हैं या नहीं, पहले कोलकाता से मछली लाकर 15 दिनों तक रखा गया और देखा कि क्या वो नए तापमान और वातावरण में एडजस्ट हो पाती हैं या नहीं, उसके बाद बड़ी संख्या में मछली लाई गईं।

फीड की लागत कम

बायोफ्लॉक तकनीक में फीड की लागत कम आती है। इस बारे में स्वीटी बताती हैं कि फिश कल्चर के समय हम जो फीड डालते हैं उसमें ही सबसे ज़्यादा लागत आती है। कुल इनपुट लागत का करीब 60 फीसदी फीड पर ही खर्च होता है, तो इसे कम करने का सबसे अच्छा तरीका है बायोफ्लॉक तकनीक। क्योंकि ये अपशिष्ट को रिसाइकल करता है। इसमें मछलियां फ्लॉक खाती है जिससे बाहरी फीड की खप्त कम होती है और इससे लागत अपने आप घट जाती है। साथ ही इस तकनीक में आप रोज़ाना निरिक्षण कर सकते हैं। आप बाहर से देख सकते हैं कि मछलियां दाना खा रही हैं या नहीं यानी ये पता चल जाता है कि वो स्वस्थ हैं या नहीं।

टैंक में पानी की ज़रूरत

तालाब में मछली पालन के लिए कम से कम 5-6 फीट भरना पड़ता है, लेकिन बायोफ्लॉक तकनीक में टैंक में सिर्फ 1.2 फीट पानी भरने की ज़रूरत पड़ती है, क्योंकि टैंक की गहराई सिर्फ डेढ़ फीट ही होती है। इसमें बार-बार एक ही पानी को फिल्टर करके इस्तेमाल किया जाता है, जिससे पानी बर्बाद नहीं होता है।

मछलियां लाने और टंकी में डालने तक कितना समय लगता है?

स्वीटी बताती हैं कि सबसे पहले तो टैंक में पानी भरते हैं फिर इनोक्यूलम डालना पड़ता है फ्लॉक बनाने के लिए। जिसे बनाने के लिए थोड़ा सा यूरिया, गुड़ (कार्बन-हाइड्रोजन सोर्स), नमक (टीडीएस लेवल मेंटेन करने के लिए), यीस्ट, प्रोबायोटिक और प्रोबायोटिक एक्टिवेट को मिलाया जाता है ताकि फायदेमंद बैक्टीरिया पनप सके। फिर इसे 5-6 दिन छोड़ देते हैं जिससे यीस्ट विकसित होगा। इस मिश्रण को पानी में डालेंगे तो 6-7 दिन बाद फ्लॉक डेवलप होगा, एक उपकरण की मदद से फ्लॉक को चेक किया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में करीब 20 दिन का समय लग जाता है। फ्लॉक विकसित होने के बाद ही टैंक में मछलियां डाली जाती हैं।

टैंक सेटअप की विधि

पहले बेस तैयार किया जाता है फिर वायरस मैस (राउंड शेप में) बनाया जाता है, उसके ऊपर तारपोलीन बनाना होता है। 4 एयररेटर को सेट करना पड़ता है, जो ऑक्सीजन लेवल को बनाए रखता है। टैंक में 1.2 फीट पानी भरकर 3-4 दिन छोड़ दें, अगर किसी वजह से दुर्गंध आ जाए तो उसे निकालकर दोबारा पानी भरे। फिर इनोक्लयूलम डालें, फ्लॉक डेवलप होने में 7 दिन का समय लगता है उसके बाद मछलियां डालें।

बायोफ्लॉक तकनीक में इन बातों का रखें ध्यान

खुद की ज़मीन हो या लीज़ पर ज़मीन लेकर कर भी शुरु किया जा सकता है।

ज़मीन नदी, नाले के पास नहीं होना चाहिए, बाढ़ में डूबना नहीं चाहिए।

ज़मीन पर बोर और पंप होना चाहिए (5 एचपी का पंप)।

ज़रूरी उपकरण खरीदने के लिए पैसे होने चाहिए।

बायोफ्लॉक तकनीक में सब्सिडी

बायोफ्लॉक तकनीक के लिए किसानों को सब्सिडी मिलती है। इसके लिए ज़मीन के डॉक्यूमेंट लेकर वो मत्सय विभाग से संपर्क कर सकते हैं। उन्हें 40 प्रतिशत सब्सिडी मिलेगी अगर वो ओबीसी और जनरल कैटेगरी के हैं तो। एससी और एसटी कैटेगरी वालों को 60 प्रतिशत तक सब्सि़डी मिलती है।

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फ़िश टैंक की साफ़-सफ़ाई कैसे करें?

स्वीटी सिंह कहती हैं कि टैंक के पानी को बदलने की ज़रूरत नहीं होती है, लेकिन हां, कभी अगर फ्लॉक डेवलप नहीं हो पाता है या पानी बहुत गंदा हो जाता है और आपको लगे कि इसे बदलना है तो टैंक के सेंटर में एक आउटलेट होता है उसे खोल दीजिए तो सारा पानी निकल जाएगा।

पानी के लिए पैरामीटर

बायोफ्लॉक तकनीक में सही तरीके से मछली पालन के लिए पानी के कुछ पैरामीटर्स का ध्यान रखना ज़रूरी है। इस बारे में स्वीटी सिंह का कहना है कि सबसे ज़्यादा ज़रूरी है डिजॉल्व्ड ऑक्सीजन (DO) लेवल 5-6 या 6-8 भी हो सकता है, लेकिन 6-8 सबसे अच्छा होता है, तो मेंटेन करना चाहिए। इसके लिए एयरेटर को कम या ज़्यादा करके इसे मेंटेन किया जा सकता है। टीडीएस का लेवल भी मेंटेन करना ज़रूरी है। ये 300-600 मिली ग्राम प्रति लीटर के हिसाब से होना चाहिए। तापमान की जांच करने के लिए उपकरण दिया गया है जिससे इसे चेक किया जा सकता है। तापमान 25-35 डिग्री तक होना चाहिए। अमोनिया 0.01 से नीचे होना चाहिए।

बायोफ्लॉक तकनीक में लागत और कमाई

शुरुआती लागत और मुनाफे के बारे में स्वीटी सिंह बताती है कि इसे शुरु करने के लिए कम से कम 1.5 लाख का खर्च होता है। 6 महीने कल्चर करने के बाद आपको आदमनी आना शुरू जाती है। 20-30 ग्राम की मछली का वज़न 6 महीने में 500 ग्राम तक हो जाता है। तो अगर आप 7 हज़ार मछलियां डालते हैं और उसमें से अगर 3 हज़ार भी बचती हैं तो आप महीने का डे़ढ़ लाख रुपए तक कमा सकते हैं। लेकिन आप अगर पेशेवर मछलीपालक है तो आप महीने में 3 लाख रुपए तक की भी कमाई कर सकते हैं।

सम्पर्क सूत्र: किसान साथी यदि खेती-किसानी से जुड़ी जानकारी या अनुभव हमारे साथ साझा करना चाहें तो हमें फ़ोन नम्बर 9599273766 पर कॉल करके या [email protected] पर ईमेल लिखकर या फिर अपनी बात को रिकॉर्ड करके हमें भेज सकते हैं। किसान ऑफ़ इंडिया के ज़रिये हम आपकी बात लोगों तक पहुँचाएँगे, क्योंकि हम मानते हैं कि किसान उन्नत तो देश ख़ुशहाल।

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