क्यों है Pongal सिर्फ दक्षिण का नहीं, बल्कि पूरे भारत का जीवन-उत्सव? एक पर्व जो प्रकृति को फसल से भी बढ़कर जोड़ता है

पोंगल (Pongal) शब्द का अर्थ है 'उफनना' या 'भरपूर होना'। ये उफनाव केवल बर्तन में दूध-चावल का नहीं, बल्कि जीवन में सुख-समृद्धि और आशाओं का है। इस त्योहार का सेंटर है नई फसल, जिसे किसान सूर्य देव और धरती माता को अर्पित कर प्रकृति के प्रति अपना आभार व्यक्त करते हैं।

क्यों है Pongal सिर्फ दक्षिण का नहीं, बल्कि पूरे भारत का जीवन-उत्सव? एक पर्व जो प्रकृति को फसल से भी बढ़कर जोड़ता है

हर साल जनवरी में धूमधाम से मनाया जाने वाला पोंगल (Pongal), सिर्फ दक्षिण भारत (South India) का त्योहार नहीं, बल्कि धरती का शुक्रगुज़ार और सौभाग्य का दर्शन है। 2026 में ये त्योहार 14 से 17 जनवरी (Makar Sankranti) तक मनाया जाएगा। ये वो वक्त है जब सूर्य देव उत्तरायण होकर मकर राशि में प्रवेश करते हैं, जिसे ज्योतिष में अत्यंत शुभ और नई सकारात्मक ऊर्जा की शुरुआत माना गया है।

सिर्फ फसल नहीं, एक संपूर्ण ‘जीवन-पर्व’

पोंगल (Pongal) शब्द का अर्थ है ‘उफनना’ या ‘भरपूर होना’। ये उफनाव केवल बर्तन में दूध-चावल का नहीं, बल्कि जीवन में सुख-समृद्धि और आशाओं का है। इस त्योहार का सेंटर है नई फसल, जिसे किसान सूर्य देव और धरती माता को अर्पित कर प्रकृति के प्रति अपना आभार व्यक्त करते हैं। मान्यता है कि नई अन्न की पहली पूजा करने से वो शुद्ध रहता है और आने वाला पूरा वर्ष अन्न और सुख से भरपूर रहता है।

ज्योतिष और विज्ञान का अद्भुत मेल

पोंगल का समय मकर संक्रांति (Pongal coincides with Makar Sankranti) से जुड़ा है। ज्योतिष के अनुसार, इस दिन से सूर्य की राशि और दिशा बदलने से पृथ्वी पर पॉजिटिव ऊर्जा का प्रवाह बढ़ता है। वैज्ञानिक दृष्टि से, इस अवधि के बाद दिन बड़े और रातें छोटी होने लगती हैं, जो फसलों के लिए ज़्यादा लाइट और एनर्जी लाती है। इसलिए सूर्य की उपासना न केवल आस्था, बल्कि प्रकृति के इस वैज्ञानिक चक्र को सम्मान देने का तरीका है।

चार दिन, चार गहरे अर्थ: पोंगल की ख़ास परंपराएं

1.भोगी पोंगल (14 जनवरी): ये नए की शुरुआत का दिन है। इसमें पुराने सामान को जलाया जाता है। ये मन के बोझ और बुराइयों को त्यागने का प्रतीक है।

2.सूर्य पोंगल या थाई पोंगल (15 जनवरी): ये मुख्य दिन है। नए चावल, दूध और गुड़ से पोंगल नामक मीठा व्यंजन बनाकर सूर्य देव को अर्पित किया जाता है। घर के आंगन में रंगोली (कोलम) बनाई जाती है, जो सौंदर्य और सुख का प्रवेश द्वार मानी जाती है।

3.मट्टू पोंगल (16 जनवरी): ये दिन हमारे कृषि सहयोगी पशुओं का है। गाय-बैलों को नहलाकर, सिंगर में तेल लगाकर, फूलों की माला पहनाकर उनका सम्मान किया जाता है। ये प्रकृति के हर एक अंग के योगदान को स्वीकारना सिखाता है।

4.कानूम पोंगल (17 जनवरी): ये परिवार और रिश्तों का दिन है। बहनें भाइयों की खुशहाली के लिए, और परिवार के सदस्य एक-दूसरे से मिलकर उत्सव को पूरा करते हैं। सामाजिक एकता इस दिन का सार है।

क्यों है Pongal सिर्फ दक्षिण का नहीं, बल्कि पूरे भारत का जीवन-उत्सव? एक पर्व जो प्रकृति को फसल से भी बढ़कर जोड़ता है

पोंगल से जुड़ी कुछ अनोखी बातें

  • ‘पोंगल’ बनाने की विधि: मिट्टी के बर्तन में नए चावल, दूध और गुड़ को खुले आकाश के नीचे उबाला जाता है। जब ये उफनकर बर्तन से बाहर निकलता है, तो सभी एकसाथ ‘पोंगलो पोंगल’ का उद्घोष करते हैं। ये आशाओं के उफान और समृद्धि का संकेत है।
  • जल्लीकट्टू का संबंध: तमिलनाडु में मट्टू पोंगल के दिन जल्लीकट्टू (सांडों की ललाट पट्टी को पकड़ने की प्रतियोगिता) का आयोजन होता है, जो साहस और कौशल का प्रदर्शन माना जाता है।
  • जैविक खेती से गहरा नाता: पोंगल से पहले की जाने वाली पारंपरिक खेती के तरीके और बीज बचाने की प्रथाएं, आधुनिक जैविक और टिकाऊ खेती के सिद्धांतों से काफी मेल खाती हैं।

पोंगल: जीवन का संदेश 

पोंगल का संदेश साफ है कि जीवन एक चक्र है। बीज बोने से लेकर फसल काटने तक का परिश्रम, प्रकृति का सहयोग और अंत में शुक्रगुजारी। यही सफल जीवन का मंत्र है।  

 

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