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किसानों की स्टोरेज की समस्या को दूर करेगा ‘सब्जीकोठी’ (Sabjikothi), IIT Kanpur के निक्की झा ने ईज़ाद किया मॉडल

सप्तकृषि नाम से एग्री स्टार्टअप, 30 दिन तक ताज़ी रहेंगी फल-सब्जियां

किसान ऑफ़ इंडिया से खास बातचीत में IIT Kanpur के छात्र निक्की कुमार झा ने बताया कि ये मॉडल किसानों की एक बड़ी समस्या को हल कर सकता है। निक्की कुमार झा ने मेरे साथ खास बातचीत की। इस लेख में आप जानेंगे सब्जीकोठी कैसे किसानों की मदद कर रहा है और इससे उनकी आय में कैसे इजाफ़ा हो सकता है। 

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देश में किसानों के लिए पैदावार से ज़्यादा मुश्किल काम उपज को सुरक्षित रखना है। स्टोरेज के अभाव में भारी मात्रा में उपज यानी फल और सब्जियां खराब हो जाती हैं। इससे किसानों की कमाई बहुत हद तक प्रभावित होती है। भारत में उत्पादित कुल फलों और सब्जियों का लगभग 30 से 40 प्रतिशत हर साल बर्बाद हो जाता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर इन उत्पादों को ठीक से संरक्षित किया जाए तो देश न सिर्फ़ उत्पादन बढ़ाने में सक्षम होगा, बल्कि ये किसानों की आय दोगुनी करने में भी मददगार हो सकता है।

हाल ही में मेरी नज़र एक इश्तेहार पड़ी। ये इश्तेहार ‘सब्जीकोठी’ का था, जिसमें लिखा था ‘बिना कूलिंग तकनीक के चलने वाला चलता-फिरता स्टोरेज’। ये कॉन्सेप्ट मुझे बढ़िया लगा, लेकिन सवाल ये भी था कि क्या ये संभव है और क्या इससे किसानों को फ़ायदा होगा?

इन्हीं सवालों के जवाब जानने के लिए मैंने सप्तकृषि (Saptkrishi) के फाउंडर निक्की कुमार झा से बात की। इन्होंने ही ‘सब्जीकोठी’ नाम का ये प्रॉडक्ट बनाया है। अपको बता दूं कि निक्की कुमार झा ने नालंदा विश्वविद्यालय से पारिस्थितिकी और पर्यावरण विज्ञान (Ecology and Environmental Science) में मास्टर्स किया हुआ है। अभी वो आईआईटी कानपुर से डिज़ाइन विषय में पीएचडी कर रहे हैं। मैंने उनसे ‘सब्जीकोठी’ के बारे में कई सवाल पूछे। आइए जानते हैं क्या दिया उन्होंने जवाब:

अर्पित- कैसे आया ‘सब्जीकोठी’ को शुरू करने का आइडिया?

निक्की- मेरा घर बिहार के भागलपुर के छोटे से गांव में है। हमारा इलाका गंगा के किनारे पड़ता है। इसी वजह से हमारे यहां की मिट्टी बहुत उपजाऊ है। फसल की ज़्यादा पैदावार मिलती है। ज़्यादा पैदावार मिलने का मतलब ये बिल्कुल नहीं है कि इससे किसानों की आय में इजाफ़ा ही होगा। ये जरूर समझ सकते हैं कि ज़्यादा पैदावार की वजह से फसल बर्बाद होने की आशंका बनी रहती है।

30 से 40 प्रतिशत फसल इसलिए बर्बाद हो जाती है क्योंकि हमारे पास उपयुक्त स्टोरेज की सुविधा नहीं होती। मैंने अपने यहां देखा है कि कैसे किसान स्टोरेज के अभाव में सड़कों पर टमाटर और प्याज़ की फसल फेंक देते हैं। इन्हीं सब को देखते हुए मुझे इस समस्या का समाधान निकालने की इच्छा हुई।

जब मैं नालंदा विश्वविद्यालय में था तो वहाँ सोमनाथ सर मेरे प्रोफेसर और गाइड थे। उन्होंने मुझसे कहा कि निक्की देखो तुमसे कोई उम्मीद नहीं कर रहा कि तुम दुनिया की कोई बड़ी समस्या हल करो। हां, लेकिन हर कोई ये उम्मीद ज़रूर करता है कि तुम अपने आसपास के समाज की समस्या का हल निकाल सको। इसलिए मैंने फल और सब्जियों के नुकसान का समाधान निकालने को चुना।

अर्पित- आपने कब इस प्रॉडक्ट पर काम करना शुरू किया और क्या कुछ मुश्किलें भी आई?

निक्की- मैंने मास्टर्स की पढ़ाई के दौरान एक प्रोजेक्ट के रूप में कोल्ड चैम्बर डेवलप किया था। वो काफ़ी अच्छा मॉडल था, उसकी छत ऑटोमैटिक घूमती थी। मेरा यह मॉडल सोलर ऊर्जा से चलता था। इसके अंदर फल और सब्जियां ज़्यादा समय के लिए सही कंडीशन में रहती थी। इस मॉडल में दिक्कत ये आई कि 9 महीने तो ये अच्छा चलता था, लेकिन बारिश के मौसम के लिए ये कारगर नहीं था। उस समय ही फसलों को नुकसान भी ज़्यादा होता है।

एक दिन इसी चीज़ पर मैं घर पर डिनर टेबल पर सबसे बात कर रहा था। तभी मेरी बहन रश्मी झा मज़ाक में बोली “भैय्या इसमें तुमने क्या नया कर दिया, बस थोड़ा पहले बने प्रोजेक्ट से बेहतर ही तो किया है। तुमने भी तो वही किया जो दुनिया कर रही है। तुम कुछ अलग करते। कोई बिना कूलिंग की तकनीक का ही इस्तेमाल कर लेते।” ये बात मेरे दिमाग पर हिट कर गई कि बिना कूलिंग की तकनीक भी तो हो सकती है जो फल और सब्जियों को नुकसान से बचा सके।

अर्पित- कैसे ईज़ाद की ‘सब्जीकोठी’ बिना कूलिंग वाली तकनीक?

निक्की- इसको लेकर मैंने स्टडी की। मेरी बहन रश्मी जो बायोटेक्नोलॉजिस्ट हैं, उन्होंने भी इस काम में मेरी मदद की और अब वो कंपनी की को-फाउंडर भी है। रिसर्च मैं मैंने पाया कि फल और सब्जियों के खराब होने के मुख्य रूप से तीन कारण होते हैं।

1. फल को पकने के लिए ईथीलीन (ethylene) की ज़रूरत होती है। कोल्ड-स्टोरेज़, केमिकल कोटिंग ईथीलीन को बाहर निकलने से बचाते हैं। साल 2019 में मैंने माइक्रोक्लाइमेट पोर्टेबल सिस्टम तैयार किया, जो कूलिंग की बजाय प्रिजर्वेटर के तौर पर काम करता था। मेरे सब्जीकोठी मॉडल का काम इन चीजों से विपरीत है। इसमें हम ईथीलीन को बाहर निकलने देते हैं। जैसे ही ये बाहर निकलती है हम इसकी फॉर्म को कार्बन डाइऑक्साइड, हाइड्रोजन और पानी में तब्दील करते हैं।

2. हर एक फल-सब्जी को जीवाणु (Bacteria) और कवक (fungus) से भी नुकसान होता है। इसलिए हमारे मॉडल में हम ऐसा Sterile Environment बनाते हैं, जिससे ये सब नष्ट हो जाते हैं।

3. फल-सब्जी का वजन कम होना भी एक मुख्य समस्या है। इसको हम ऐसे समझ सकते हैं कि अगर किसान 100 किलोग्राम किसी फल का उत्पादन करता है। उसे मंडी तक जाने में अगर तीन से चार घंटे लगते हैं तो प्रति घंटा 1 प्रतिशत वजन कम हो जाता है। अगर 25 रुपये प्रति किलो भी हम उसका भाव माने तो 100 रुपये का सीधा-सीधा नुकसान हो जाता है। हमारा ये मॉडल इसी कमी को दूर करने का काम कर रहा है, जिससे उनकी आय में इजाफ़ा होगा।

अर्पित- क्या ये मॉडल सभी फसलों के लिए काम करता है?

निक्की- जी नहीं, ये मॉडल सिर्फ़ फल और सब्जियों के लिए उपयुक्त है।

सब्जीकोठी की खासियत और विशेषताएँ
तस्वीर साभार: WWF-India (Youtube)

अर्पित- सब्जीकोठी की ख़ासियत और विशेषताएं क्या हैं?

निक्की- इस मॉडल की सबसे बड़ी खासियत है कि आप इसे किसी भी परिवहन के साथ लगा सकते हैं। इसे ऑटो, कार, ई-रिक्शा किसी के ऊपर भी इंस्टॉल किया जा सकता है। मतलब ये एक चलता-फिरता स्टोरेज है। इसका वजन सिर्फ़ 10 किलोग्राम है। इसको चलाने के लिए सिर्फ़ 20 वॉट पॉवर और हफ़्ते में सिर्फ़ 2 लीटर पानी की ज़रूरत होती है। इसके रखरखाव में भी कोई खर्चा नहीं आता। इसको हम पॉवर बैंक से भी चला सकते हैं। इसमें 200 किलो तक फल और सब्जियां रख सकते हैं।

अर्पित- इस प्रॉडक्ट का बाज़ार में दाम कितना पड़ेगा और इसमें कितने दिन तक फल-सब्जियां सुरक्षित रहती हैं?

निक्की- हमने दो प्रॉडक्ट निकाले हैं। 200 किलो तक फल और सब्जियां रखने वाले सब्जीकोठी की कीमत 10 हज़ार रुपये पड़ेगी। 300 किलो तक फल-सब्जियां रखने वाले मॉडल की कीमत 15 हज़ार 950 रुपये पड़ेगी। इसमें फल-सब्जियां सामान्य से 5 से 30 दिन ज़्यादा तक ताज़ा रहती हैं।

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अर्पित- आपके इस स्टार्टअप का बिज़नेस मॉडल क्या है?

निक्की- अभी हम सबसे पहले लोगों में जागरूकता फैला रहे हैं कि बाज़ार में ऐसा प्रॉडक्ट भी मौजूद है, जो कम खर्च में फल-सब्जियों को नया जीवन दे सकता है। इसके लिए स्वयं सहायता समूह (Self-Help Groups), गैर-सरकारी संगठनों (Non Government Organisations) और कृषि विज्ञान केंद्रों की मदद ली जा रही है। अभी हम सरकारी और गैर-सरकारी संस्थानों को कॉर्पोरेट सामाजिक ज़िम्मेदारी (Corporate social responsibility) के ज़रिए बेच रहे हैं।

इसके अलावा, हमारी वेबसाइट https://www.saptkrishi.com/ पर भी 10 से ऊपर ऑर्डर तक के लिए लोग बुकिंग कर रहे हैं। हमारा B2B (Business to Business) और B2C (Business to Customer) दोनों पर काम चल रहा है। अभी हमने डीलर वितरण भी शुरू किया है। आप डीलर बनने के लिए भी आवेदन कर सकते हैं। इसके लिए आप हमें saptkrishi@gmail.com पर मेल कर सकते हैं।

सब्जीकोठी का बिज़नेस मॉडल

अर्पित- क्या किसान या आम नागरिक सब्जीकोठी प्रॉडक्ट को खरीद सकता है?

निक्की- अभी तक हम किसी संस्थान या बल्क में ही 10 प्रॉडक्ट देते थे। अब हमने एक फैक्ट्री बना ली है और एक सप्लाई चैन सिस्टम भी तैयार कर लिया है। जल्द ही आम नागरिक और किसान भी इसे खरीद पाएंगे।

अर्पित- अभी तक आपके पास कितने ऑर्डर आए हैं ?

निक्की- अभी तक हमारे पास हज़ार से भी ज़्यादा प्री-ऑर्डर हैं। अभी कंपनी का टर्नओवर एक करोड़ के आसपास है। हमने ICICI फाउंडेशन के साथ भी डील साइन की है।

अर्पित- सब्जीकोठी को अब तक कहां-कहां मान्यता मिल चुकी है?

निक्की- इस प्रॉडक्ट का अरुणाचल प्रदेश सरकार द्वारा व्यापक रूप से मान्य और परीक्षण किया गया हैं। इसके अलावा, हमारे स्टार्टअप ‘सप्तकृषि’ का बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन के समर्थन से बिहार में सफलतापूर्वक पायलट परीक्षण भी पूरा हुआ है। हमारा प्रॉडक्ट प्रधानमंत्री विज्ञान प्रौद्योगिकी और नवाचार सलाहकार परिषद (पीएम-एसटीआईएसी) के तहत नौ प्रौद्योगिकी मिशनों में से एक है।

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सम्पर्क सूत्र: किसान साथी यदि खेती-किसानी से जुड़ी जानकारी या अनुभव हमारे साथ साझा करना चाहें तो हमें फ़ोन नम्बर 9599273766 पर कॉल करके या kisanofindia.mail@gmail.com पर ईमेल लिखकर या फिर अपनी बात को रिकॉर्ड करके हमें भेज सकते हैं। किसान ऑफ़ इंडिया के ज़रिये हम आपकी बात लोगों तक पहुँचाएँगे, क्योंकि हम मानते हैं कि किसान उन्नत तो देश ख़ुशहाल।

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