Sugarcane Farming: गन्ने की खेती की तस्वीर बदलने वाले डी.पी. सिंह ने खेती के लिए किए हैं 30 से अधिक इनोवेशन

डी.पी. सिंह के नवाचारों से गन्ने की खेती (Sugarcane Farming) अब हो रही है आसान और किफायती, जो किसानों के श्रम को कम कर नई दिशा दे रही है।

गन्ने की खेती Sugarcane Farming

गन्ने की खेती (Sugarcane Farming) में श्रम की अधिक ज़रूरत पड़ती है जिससे खेती की लागत बढ़ जाती है, यही वजह है कि बहुत से किसान गन्ने की खेती (Sugarcane Farming) से करतराते हैं। मगर किसान परिवार में जन्में डी.पी. सिंह के किए नवाचार गन्ना किसानों के लिए वरदान साबित हो रहे हैं। गन्ने की खेती (Sugarcane Farming) के लिए 20 से भी ज़्यादा इनोवेशन कर चुके हैं, जो किसानों के लिए श्रम साध्य खेती को आसान बना रही है और खेती को नई दिशा दे रही है। कृषि के क्षेत्र में किए उनके ख़ास नवाचारों के बारे में जानने के लिए उनसे ख़ास बातचीत की किसान ऑफ़ इंडिया के संवाददाता सर्वेश बुंदेली ने।

कैसे शुरू हुआ इनोवेशन का सफ़र?

किसानों के लिए 30 से अधिक नावाचार कर चुके डी.पी. सिंह का जन्म एक किसान परिवार में हुआ और उन्होंने पूरी पढ़ाई भी एग्रीकल्चर में ही की है। उन्होंने एग्रीकल्चर में मास्टर डिग्री और एग्रीकल्चरर इकोनॉमिक्स में पीएचडी की है। वो बताते हैं कि बचपन में वो बहुत नटखट थे, आगे चलकर उनका वही नटखटपना इनोवेशन और क्रिएटिवीटी में बदल गया।

अपने इनोवेशन के सफ़र का ज़िक्र करते हुए वो बताते हैं कि आज से क़रीब 18-20 साल पहले उन्हें किसी फ़सल के लिए एक मशीन की ज़रूरत पड़ी थी और वो मशीन कहीं नहीं मिली, यहां तक विदेशों में भी नहीं मिली। बस इसी वाकये ने इन्हें इनोवेशन के लिए प्रेरित किया और वो उस मशीन को बनाने में जुट गए, इस तरह उनकी नवाचार की शुरुआत हुई, फिर एक के बाद एक सफलता मिलती चली गई।

उनका कहना है कि उन्होंने 85-86 प्रतिशत छोटे और सीमांत किसानों को ध्यान में रखकर ही कृषि में 30 से भी अधिक, जो किसानों को किफायती क़ीमत पर उपलब्ध है। उनका कहना है कि सारे बजट फ्रेंडली, ईको फ्रेंडी और यूज़र फ्रेंडली है।

गन्ने की खेती को आसान बनाने वाले इनोवेशन

गन्ने की खेती (Sugarcane Farming) में श्रम और समय दोनों ही अधिक लगता है और आज के समय में जब मजदूर दिन ब दिन महंगे होते जा रहे हैं, तो खेती की लागत बहुत बढ़ जाती है। इससे किसान बहुत परेशान रहते हैं। डी.पी. सिंह कहते हैं कि गन्ने की छिलाई की बात करें तो 50-60 रुपए प्रति क्विंटल का खर्च आता है। साथ ही बाकी इनपुट जैसे फर्टिलाइज़र, इंसेक्टीसाइड, पेस्टीसाइड आदि पर भी बहुत खर्च होता है।

जिससे किसानों को घाटा होता है और वो कर्ज में डूबते जा रहे हैं। इसे देखते हुए ही उन्होंने गन्ने की खेती (Sugarcane Farming) के लिए कई इनोवेशन किए। उन्होंने ऐसी मशीनें बनाईं जो डीजल पेट्रोल से नहीं, बल्कि बैटरी और सोलर से चलती हैं। जिससे किसानों को ज़्यादा खर्च न करना पड़े।

गन्ने की बुवाई के लिए मशीन

गन्ने की बुवाई के लिए किसान एक आंख (जिसे नोड या सेट भी कहते हैं), दो आंख या तीन आंख के टुकड़े (यही बीज होते हैं) काटकर बुवाई करता है। इस काम में अधिक श्रम लगता है, मगर डी.पी. सिंह ने ऐसी मशीन बनाई है जिससे किसान एक, दो या तीन आंख के गन्ने की कटाई आसानी से कर सकते हैं। डी.पी. सिंह कहते हैं कि उनकी तैयार sugarcane seed cutting machine से एक अकेला आदमी 10 आदमी के बराबर काम कर सकता है यानी बीज तैयार कर सकता है और ये मशीन बहुत किफायती भी है।

सीड मैनेजमेंट है ज़रूरी

डी.पी. सिंह का कहना है कि गन्ने की अच्छी फ़सल के लिए सीड मैनेजमेंट में इनोवेटिव प्रैक्टिस ज़रूरी है। सीड मैनेजमेंट की प्रक्रिया किसानों को ज़रूर करनी चाहिए। इसमें गन्ने की बुवाई से पहले सबसे अच्छे बीजों का चुनाव करें, उसके बाद बुवाई से 15-20 दिन पहले गन्ने के ऊपर के पत्ते और अगोला (ऊपरी हिस्से) को काटकर उस पर पानी लगाकर यूरिया लगाए। ऐसा करने से गन्ने का अंकुरण 15-20 प्रतिशत तेज़ी से होगा।

निराई-गुड़ाई के लिए मशीन

डी.पी. सिंह कहते हैं कि गन्ने की फ़सल में खरपतवार नियंत्रण भी बहुत ज़रूरी है। इसलिए उन्होंने बैटरी से चलने वाली weeding machine बनाई है, तो आसानी से निराई-गुड़ाई कर लेती है और इसमें 6-7 अटैचमेंट भी है। ये मशीन 3 फार कल्टीवेटर भी चलाती है, स्प्रे भी करती है और पाटा भी चलाती है। गन्ने की अच्छी उपज के लिए खरपतवार को नियंत्रित करना बहुत ज़रूरी है क्योंकि खरपतवार में बहुत से कीट होते हैं जो मुख्य फ़सल को नुकसान पहुंचाते हैं।

इंट्रा-रॉ वीडिंग मशीन

डी.पी. सिंह बताते हैं कि लाइन में बोई जानी वाली फ़सलों की दो तरह से निराई-गुड़ाई होती है। एक तो इंट्रा रॉ वीडिंग, इसके लिए डीजल, पेट्रोल से चलने वाले बहुत से वीडर आते हैं, मगर किसानों के सामने समस्या तब आती है जब उन्हें दो पौधों के बीच निराई-गुड़ाई करनी होती है।

तो इंट्रा रॉ वीडिंग करने के लिए किसान के पास ऐसा कोई मैकेनिज़्म नहीं था, तो उन्होंने ऐसी मशीन बनाई है जो लाइन में बोई जाने वाली दो फ़सलें के बीच का खरपतवार निकालेगी और मुख्य फ़सल के पौधों को कटने नहीं देगी। इंट्रा रॉ वीडिंग के लिए किसानों को बहुत श्रम की ज़रूरत पड़ती थी जिससे खर्च बढ़ जाता था। मगर इस मशीन से खर्च बचेगा, ये मशीन खरपतवार निकालने के साथ ही गुड़ाई भी करती है और ये डीसी पावर से चलती है।

गन्ने के साथ इंटरक्रॉपिंग

डी.पी. सिंह बताते हैं कि गन्ने की बुवाई की कई अलग-अलग विधिया हैं। पापरंपरिक विधि में गन्ने को 28 से 30 इंच की दूरी पर बोया जाता है। मगर विशेषज्ञ गन्ने को 4 फीट की दूरी पर लगाने की सलाह देते हैं, क्योंकि इससे इंटरक्रॉपिंग के लिए पर्याप्त जगह मिल जाती है। उनका कहना है कि छोटे किसान इंटरक्रॉपिंग यानी अंतरफ़सल उगाकर अतिरिक्त कमाई कर सकते हैं, क्योंकि गन्ना एक लंबी अवधि की फ़सल है।

वो कहते हैं कि गन्ने की फ़सल के साथ मूंग, चना, उड़द जैसी दलहनी फ़सलें लगाना सबसे अच्छा होता है, क्योंकि इससे गन्ने की जड़ों को नाइट्रोजन की आपूर्ति होती रहती है। साथ ही फ़सल लेने के बाद इसके अपशिष्ट को खेत में जोत देने से ज़मीन अधिक उपजाऊ भी बनती हैं। वो कहते हैं कि इंटरक्रॉपिंग के लिए मूंग और उड़द के अलावा किसान प्याज़, लहसुन और आलू भी लगा सकते हैं।

खाद डालने की मशीन

आमतौर पर किसान छिटकवा विधि या ब्रॉडकास्टिंग विधि से फ़सल में खाद डालते हैं, जो वैज्ञानिक तरीका नहीं है। डी.पी. सिंह कहते हैं इससे सिर्फ़ 15-20 प्रतिशत खाद ही पौधों को मिलता है। बाकी खाद मुख्य फ़सल तक नहीं पहुंच पाता, इसलिए उन्होंने खाद डालने के काम को आसान बनाने के लिए Plant Fertilizing Hack नामक मशीन बनाई है, जिससे खाद जिसे रूट ज़ोन में डाला जाता है। इससे खाद डालते समय किसानों को थकान भी नहीं होती और एकदम सही तरीके से फ़सल को खाद मिल जाता है। इस मशीन में जो चमड़ा इस्तेमाल किया गया है वो वॉटर प्रूफ और डस्ट प्रूफ है, जो लंबे समय तक चलता है।

Sugarcane Farming: गन्ने की खेती की तस्वीर बदलने वाले डी.पी. सिंह ने खेती के लिए किए हैं 30 से अधिक इनोवेशन

गन्ने में लीफ ट्रिमिंग

लीफ ट्रिमिंग भी गन्ने की खेती (Sugarcane Farming) का एक अहम हिस्सा है। डी.पी. सिंह कहते हैं कि अधिकांश किसानों को ये पता नहीं पोता है कि गन्ने में लीफ ट्रीमिंग क्या होती है और जिनको पता होता है, उनके पास भी इसके लिए कोई उपकरण नहीं है। तो उन्होंने एक ऐसा उपकरण बनाया है जो एक-डेढ़ घंटे में एक एकड़ में लगे गन्ने की लीफ ट्रीमिंग कर देता है।

लीफ ट्रिमिंग का एक स्टेज होता है, जिसका पता किसान को होना चाहिए। लीफ ट्रिमिंग करने से कल्ला तेज़ी से बढ़ता है और स्वस्थ होता है। इसके अलावा टॉप बोरर, अर्ली टॉप बोरर और पत्तियों में लगने वाले फंगल डिसीज से छुटकारा मिल जाता है। आगे वो बताते हैं कि फरवरी-मार्च में लगाए गए गन्ने की लीफ ट्रिमिंग मई-जून के पहले हफ्ते तक की जा सकती है, जब गन्ना दो से ढाई फीट का हो जाए। लीफ ट्रिमिंग कैनोपी से 4-6 या 6-8 इंच ऊपर से की जानी चाहिए।

करें गन्नें की डी ट्रैसिंग

डी.पी. सिंह कहते हैं कि जब फ़सल 5-6 या 6-7 महीने की हो, तो उसकी De-Trashing की जानी चाहिए। वो बताते हैं कि गन्ने में नीचे से पत्तियों को हटाने की प्रक्रिया को डी-ट्रैसिंग कहते हैं, उन्होंने इसके लिए एक मैकेनाइज़ मशीन बनाई है। डी-ट्रैसिंग करते समय सिर्फ़ नीचे की सूखी और पीली पत्तियों को ही हटाना होता है, जिससे पौधों में हवा का संचार बढ़ता है और सूर्य का प्रकाश ज़्यादा अंदर तक जाता है जिससे गन्ने स्वस्थ होते हैं।

वो कहते हैं कि लीफ ट्रिमिंग बुवाई के दो से ढाई महीने बाद और डी-ट्रैसिंग 5-7 महीने में करनी चाहिए। साथ ही किसान इस बात का भी ध्यान रखें कि जो गन्ने बीज के लिए रखने हो उसकी डी-ट्रैसिंग न करें। इसके लिए ऊपर का अगोला काटकर यूरिया लगाने की प्रक्रिया करनी चाहिए।

गन्ना कटाई की मशीन

गन्ने की कटाई में भी अधिक श्रम की ज़रूरत होती है, मगर डी.पी. सिंह की बनाई मशीन का उपयोग करने के बाद किसानों की कटाई के लिए मज़दूरों पर निर्भरता खत्म हो जाएगी। बैटरी से चलने वाली ये मशीन गन्ना काटती है, फिर कटे हुए गन्ने का ऊपर से अगोला भी काटती है, उसके बाद ऊपर की पत्तियों को भी साफ करती है।

इसके अलावा मशीन में गन्ने के गट्ठर बांधने के लिए भी दो टूल आते हैं। डी.पी. सिंह कहते हैं कि किसान इस मशीन को बहुत पसंद कर रहे हैं, क्योंकि इससे उनका एक बेहद मुश्किल काम आसान हो गया है और अपनी तरह की ये पहली मशीन है। वो आगे बताते हैं कि मार्च-अप्रैल में किसानों को प्रति क्विंटल 60-70 रुपए गन्ना छिलाई देनी पड़ती है, मगर इस मशीन के इस्तेमाल से इसकी बचत होगी, उन्हें मजदूरों के पीछे नहीं घूमना पड़ेगा, डीजल-पेट्रोल की ज़रूरत नहीं होगी, क्योंकि ये बैटरी से चलती है। इस मशीन की ख़ासियत है कि ये बिना गन्ने को हाथ लगाए कटाई करने के साथ ही अगोला भी निकाल सकती है।

मिट्टी चढ़ाने की मशीन

डी.पी. सिंह अपनी एक और ख़ास मशीन के बारे में बताते हैं जो गन्ना किसानों के लिए बहुत मददगार है, वो है मिट्टी चढ़ाने यानी अर्थिंग अप की मशीन। वो कहते हैं कि ट्रेंच विधि से बोए गए गन्ने की अर्थिंग अप करना ज़रूरी है। ऐस करने से गन्ना गिरने से बच जाता है। जब गन्ना 4-5 फीट का हो जाए तभी अर्थिंग अप कर देनी चाहिए। पहले हल्की मिट्टी चढ़ाएं और उसके कुछ दिन के बाद जब गन्ना थोड़ा और विकसित हो जाए, तब हैवी अर्थिंग अप करें। इससे गन्ना गिरने से बचेगा।

गन्ना लोडिंग की सस्ती मशीन

गन्ने की लोडिंग भी एक बड़ी समस्या होती है। गन्ने की भराई के लिए कम से कम 50-60 क्विंटल की एक ट्रॉली किसानों को भरनी पड़े तो कम से कम 5-6 आदमी लगते हैं। मगर डी.पी. सिंह ने एक ऐसी मशीन बनाई है जो इस मुश्किल काम को 2-3 घंटे में ही कर देती है और वो भी सिर्फ़ 2 लोगों की मदद से। इसकी बदौलत गन्ने के गट्ठर को सिर पर उठाने की ज़रूरत भी नहीं पड़ती है।

ये मशीन ट्रैक्टर की बैटरी से चलती है और रिमोट से ऑपरेट होती है। बस बटन दबाया और मशीन गट्ठर को उठाकर ट्रॉली में रख देती है। वैसे तो किसान 30-35 किलो या ज़्यादा से ज़्यादा 50 किलो का गट्ठर बनाते हैं, मगर मशीन की क्षमता 250 से 300 किलो वज़न उठाने की है। ये मशीन 20 मीटर के एरिया में जितने भी गट्ठर होते हैं उसे एक साथ उठाती है। 

खेती में मैकनाइज़ेशन कितना ज़रूरी है?

डी.पी. सिंह कहते हैं कि उन्होंने देखा कि आने वाली युवा पीढ़ी खेती से मुंह मोड़ रही है। किसान का बेटा खुद खेती नहीं करना चाहता। ऐसी स्थिति में अगर युवाओं को खेती को ओर लाना है तो उन्हें स्मार्ट टूल और स्मार्ट फ़ार्मिंग के तरीके बताने होंगे, क्योंकि अब वो अपने दादा-परदादा की तरह मेहनत वाली खेती नहीं कर सकते। जब खेती में स्मार्ट उपकरणों का इस्तेमाल किया जाएगा, तभी युवा इस ओर आकर्षित होंगे। साथ ही आमदनी बढ़ाने के लिए भी मैकनाइजेशन ज़रूरी है। युवा हाइटेक फ़ार्मिंग को अच्छी तरह कर सकते हैं।

छोटी जोत वाले किसानों के लिए

डी.पी. सिंह का कहना है कि हमारे देश में 90 से 94 प्रतिशत किसान गरीब है, इसलिए उन्होंने ऐसी मशीनें बनाई है जो किफायती, इस्तेमाल में आसान हो और लो मेंटेनेंस वाली है। साथ ही इनका ऑपरेशनल कॉस्ट भी कम है। वो आगे भी ऐसी ही मशीनों को बनाने की बात कहते हैं, साथ ही इसमें सरकार की मदद के साथ ही सब्सिडी दिए जाने की ज़रूरत पर भी ज़ोर देते हैं।

डी.पी. सिंह को अपने ख़ास इनोवेशन और खेती में किए योगदान के लिए कई अवॉर्ड मिल चुके हैं। उनके लिए इनोवेशन एक एडिक्शन बन चुका है, जब भी वो किसानों की कोई समस्या देखते हैं तो नए नवाचार का विचार दिमाग में आ जाता है। वो कहते हैं कि अगर छोटे और सीमांत किसान मुनाफ़ा बढ़ाना जाते हैं, तो फ़ार्म मैकेनाइजेशन ज़रूरी है। साथ ही आने वाले समय में लेबर खत्म हो जाएगा और खेती पूरी तरह से मशीनों पर निर्भर हो जाएगी।

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