भारतीय कृषि अर्थव्यवस्था में पशुपालन का महत्वपूर्ण योगदान है। पशुपालन ही गाँवों में बसी 60 से 70 फ़ीसदी आबादी की रोज़ी-रोटी का ज़रिया है। पशुपालन की उत्पादकता को बढ़ाने में उत्तम किस्म के हरे चारा की बहुत बड़ी भूमिका होती है, क्योंकि इसी से पशुओं को ऐसा सन्तुलित आहार मिल पाता है जिसमें खनिज, प्रोटीन, विटामिन और वसा आदि की उचित मात्रा होती है। खरीफ़ मौसम में दीनानाथ घास की खेती करना एक बेहतरीन विकल्प है क्योंकि ये एक सीधी, तेज़ी से बढ़ने वाली घास है और इससे पशुओं के लिए ज़रूरी पोषक तत्वों की भरपायी हो जाती है।
देश में कहीं भी उगने वाला हरा चारा
दीनानाथ घास एक ऐसा हरा चारा है जिसे देश के हर इलाके में उगाया जा सकता है। इसकी बुआई खरीफ़ में जून-जुलाई की बारिश के मौके पर की जाती है, क्योंकि गर्म और ऊमस भरे बरसाती मौसम में इसकी बढ़वार बहुत शानदार होती है और इससे पौष्टिक हरे चारा की अच्छी उपज प्राप्त होती है। दीनानाथ घास में अत्यधिक कल्ला उत्पादन क्षमता है। इसकी पत्तियाँ लम्बे समय तक हरी-भरी रहती हैं। भारत में इसकी खेती बिहार, बंगाल, हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में सफलतापूर्वक की जा सकती है।
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एक बार बोएँ और बार-बार काटें
दीनानाथ घास का मूलस्थान इथियोपिया को माना गया है। लेकिन इसकी खेती अफ्रीका और एशिया की गर्म जलवायु वाले काफ़ी देशों में होती है। दीनानाथ घास पूरे साल हरा चारा देने वाली फसल है, लेकिन इसे बहुवर्षीय फसल माना जाता है। इसका फसल चक्र ऐसा है कि पकने पर इसके बीज खेत में गिर जाते हैं और अगले खरीफ़ मौसम में इनसे अपने आप ही शानदार पौधे उगने लगते हैं। इस तरह, एक बार बुआई करने के बाद दीनानाथ घास खेत में 3-4 साल तक अपने आप उगती रहती है। इसी वजह से दीनानाथ घास परती ज़मीन और जंगलों में ख़ूब दिखायी देती है।
दीनानाथ घास के लिए खेत की तैयारी
आमतौर पर दीनानाथ घास को ख़राब, कम उपजाऊ और परती भूमि पर उगाया जाता है। इसकी खेती हल्की, मध्यम और भारी जैसी सभी किस्म की मिट्टी में सफलतापूर्वक की जा सकती है। वैसे इसके अच्छे जमाव और पैदावार के लिए दोमट मिट्टी सर्वोत्तम है। यदि दीनानाथ घास की उन्नत किस्म के बीज का इस्तेमाल बुआई के लिए किया जाए तो खेत की तैयारी के लिहाज़ से एक से दो जुताई पर्याप्त है।
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दीनानाथ घास की उन्नत किस्में
बुन्देल दीनानाथ-1, बुन्देल दीनानाथ-2 और पूसा-19 को दीनानाथ घास की ऐसी उन्नत किस्मों का दर्ज़ा हासिल है जिसे सभी इलाकों में उगाया जा सकता है। इनकी सालाना पैदावार 22 से 28 टन प्रति हेक्टेयर तक है। जबकि दक्षिण भारतीय राज्यों के लिए एक और विकसित किस्म TNDN का विकल्प भी मौजूद है जिसकी पैदावार 30 से 35 टन प्रति हेक्टेयर तक होती है। दीनानाथ घास की ऊँचाई 30-150 सेंटीमीटर तक होती है। इसकी पत्तियाँ 5 से 25 सेंटीमीटर लम्बी तथा 4 से 15 मिलीमीटर चौड़ी होती है। फसल पकने पर इसमें 5-15 सेंटीमीटर लम्बे रोयेंदार बाल निकलते हैं। इन्हीं से अत्यन्त छोटे और रोयेंदार खोल से ढके हुए बीज प्राप्त होते हैं।
दीनानाथ घास की बीज दर और बुआई
दीनानाथ घास की बुआई के लिए खेत की मिट्टी को भुरभुरा और खरपतवार रहित होना चाहिए। बुआई सीधे खेत में हो सकती है। इसको 1.5 सेंटीमीटर से ज़्यादा गहराई पर नहीं बोना चाहिए। वर्ना, बीजों का अकुंरण और पौधों का जमाव प्रभावित होता है। दीनानाथ घास के बीजों की अंकुरण क्षमता बढ़िया होती है। इसके लिए प्रति हेक्टेयर 3 से 4 किलोग्राम रोयेदार बीज की ज़रूरत होती है। लेकिन यदि ICAR-भारतीय चरागाह और चारा अनुसन्धान संस्थान, झाँसी में उपलब्ध खोल रहित बीजों का इस्तेमाल किया जाए तो प्रति हेक्टेयर के लिए 400 ग्राम बीज पर्याप्त होता है।
खाद और उर्वरक
दीनानाथ घास को अपनी तेज़ बढ़वार की वजह से ज़्यादा पोषक तत्वों की ज़रूरत पड़ती है। इसीलिए इसकी खेती में बुआई से करीब महीने भर पहले प्रति हेक्टेयर 8-10 टन सड़े हुए गोबर की खाद डालना बहुत फ़ायदेमन्द रहता है। इसके अलावा 30 किलोग्राम नाइट्रोजन और 30 किलोग्राम फॉस्फोरस को भी बीजों के नज़दीक पट्टियों के रूप में डालना चाहिए। इसी तरह 40-45 दिनों के बाद फिर से 30 किलोग्राम नाइट्रोजन प्रति हेक्टेयर का छिड़काव करना बहुत लाभदायक रहता है।
फसल चक्र
आमतौर पर दीनानाथ घास को अन्य फसलों के साथ मिश्रित करके नहीं बोते हैं। लेकिन यदि इसे स्टाइलों के साथ मिश्रित करके बोया जाता है तो इससे हरे चारे की गुणवत्ता में वृद्धि होती है। दूसरी ओर, दीनानाथ घास की खेती लोबिया, ग्वार अथवा अरहर के साथ बुआई करके भी की जा सकती है। दीनानाथ घास की खेती पर आधारित प्रमुख फसल चक्र के तहत दीनानाथ घास + लोबिया-बरसीम, दीनानाथ घास + अरहर, दीनानाथ घास + लोबिया-रिजका का इस्तेमाल करने की सिफ़ारिश ICAR-भारतीय चरागाह और चारा अनुसन्धान संस्थान, झाँसी के विशेषज्ञ करते हैं।
सिंचाई, खरपतवार नियंत्रण और कटाई
दीनानाथ घास की बुआई की तभी करनी चाहिए जबकि खेत में पर्याप्त नमी मौजूद हो। खरीफ़ के मौसम में यदि बारिश के बीच का अन्तराल ज़्यादा लम्बा खिंच जाए तभी इस हरे चारे को सिंचाई की ज़रूरत पड़ती है। इस घास की एक और विशेषता ये है कि इसकी तेज़ बढ़वार 40-45 दिनों के बाद खेत में अन्य खरपतवारों की वृद्धि रोक देती है।
लेकिन उससे पहले जब फसल 25-30 दिन की हो जाए तब खुरपी या वीडर कम मल्चर की सहायता से एक बार गुड़ाई कर देने से खरपतवार का निपटारा करना चाहिए। इस हरे साल की पहली कटाई बुआई के करीब ढाई महीने बाद करनी चाहिए। उसके बाद की अगली कटाईयाँ 40-45 दिनों के अन्तराल पर की जा सकती है।
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