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कोरोना प्रतिबन्धों की वजह से कर्नाटक में खेत में ही फसल सड़ा रहे किसान

सब्ज़ियों और फलों के उत्पादकों के लिए महामारी बनी और बड़ी आफ़त

कोरोना काल में अनाज के उत्पादकों को तो फिर भी न्यूनतम समर्थन मूल्य से राहत हो सकती है, लेकिन सब्ज़ियों और फलों के उत्पादकों के लिए तो महामारी और बड़ी आफ़त बनकर सामने खड़ी है। हालात और किसानों की लाचारी का फ़ायदा उठाकर बिचौलिये मोटा मुनाफ़ा कमा रहे हैं।

खेत में ही फसल सड़ा रहे किसान: कोरोना लॉकडाउन या कर्फ़्यू जैसे प्रतिबन्धों की वजह से देश के कई हिस्सों में जहाँ सब्ज़ियों और फलों के दाम आसमान छू रहे हैं वहीं दक्षिण भारतीय राज्यों के किसानों के किसान अपनी उपज का सही दाम नहीं पाने की वजह से बेहद मायूस हैं।

कर्नाटक के टमाटर उत्पादक किसान तो इस कदर बेहाल हैं कि उन्होंने अपनी तैयार फसल को खेतों में ही सड़ने के लिए छोड़ दिया है। ताकि वो अगली फसल के लिए खाद का काम ही कर सके।

कर्नाटक के टमाटर किसानों का बुरा हाल

ज़ाहिर है, किसानों को लग रहा है कि मंडी में उपज को पहुँचाने से जो दाम मिलेगा, उससे तो बेहतर है उपज में खेत में ही सड़ाकर खाद बना लेना। किसानों की ऐसी हालात बेहद दर्दनाक है। कई महीनों से कर्नाटक के खुदरा बाज़ार में 15 रुपये के भाव से बिक रहा टमाटर अभी 4 रुपये किलो बिक रहा है। इससे किसानों के हाथ दो रुपये किलो भी नहीं पहुँच रहे।

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सब्ज़़ियों और फलों के किसानों पर दोहरी मार

कोरोना काल में अनाज के उत्पादकों को तो फिर भी न्यूनतम समर्थन मूल्य से राहत हो सकती है, लेकिन सब्ज़ियों और फलों के उत्पादकों के लिए तो महामारी और बड़ी आफ़त बनकर सामने खड़ी है। हालात और किसानों की लाचारी का फ़ायदा उठाकर बिचौलिये मोटा मुनाफ़ा कमा रहे हैं।

सब्ज़ियों और फलों के लिए मूल्य नियंत्रण या सन्तुलन की कोई व्यवस्था नहीं है। इन्हें कोल्ड स्टोरेज़ में रखना भी मुश्किल है। फूड प्रोसेसिंग इकाईयों का नेटवर्क इतना व्यापक है नहीं कि वो किसानों के आँसू पोंछ सके। इसीलिए अन्नदातों को औने-पौने दाम पर सब्ज़ियाँ और फल बेचने के लिए मज़बूर होना पड़ रहा है।

लगातार दूसरे साल पड़ी किसानों पर मार

लॉकडाउन की वजह से पिछले साल भी कर्नाटक के किसानों को काफी घाटा हुआ था। इस बार सब्ज़ियों और फलों की बम्पर पैदावार हुई तो किसानों को उम्मीद थी कि शायद पिछले साल के घाटे की कुछ भरपाई हो जाए। लेकिन राज्य में कोरोना की मौजूदा लहर ने किसानों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया। इससे भी दुःखद ये है कि कृषि प्रबन्धन की सारी व्यवस्था में किसानों की सुध लेने, उनके प्रति संवेदनशीलता रखने वाली कोई प्राथमिकता नहीं है।

कोरोना संक्रमण को रोकथाम के लिए कर्नाटक सरकार ने भी अन्य राज्यों की तरह पूरे सूबे में पाबन्दियाँ लगा दी हैं। शादी-समारोह में लोगों की संख्या तय करने के अलावा, सामाजिक मेल-जोल, मेलों और त्योहारों पर रोक लगा है। इनका सीधा असर किसानों की कमाई पर पड़ा है। क्योंकि ऐसे प्रतिबन्धों की वजह से किसानों को उनकी सब्ज़ियों और फलों का खरीदार नहीं मिल रहे। दूसरों राज्यों में जाने वाले ट्रकों की आवाजाही प्रभावित होने से पड़ोसी राज्यों, केरल और तमिलनाडु में किसानों की उपज नहीं जा पा रही है।

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औने-पौने दाम पर उपज बेचने की मज़बूरी

इसीलिए कर्नाटक के किसान अपनी सब्ज़ियों और फलों को आधे दाम में बेचने और भारी घाटा उठाने के लिए मज़बूर हैं। बेहतर दाम की उम्मीद में जिन किसानों ने टमाटर, फलियाँ, पत्तागोभी, तरबूत, खीरा और केले की खेती में काफी खर्च किया है उन्हें अपनी मेहनत और निवेश का बेहतर नतीज़ा पाने का कोई रास्ता नहीं सूझ रहा, इसीलिए वो औने-पाने दाम पर उपज बेचने को मज़बूर हैं।

सब्ज़ियों और फलों के दाम में भारी गिरावट की वजह से कई किसानों को लाखों का घाटा हुआ है। लगातार दूसरे साल घाटा सहने के बाद कई किसान बर्बादी के कगार है। वही राज्य किसान संगठनों के महासंघ का कहना है कि गलती पूरी तरह से राज्य सरकार की है जिन्होंने विशेषज्ञों की सलाह को गम्भीरता से नहीं लिया। और कोरोना की दूसरी लहर को रोकने के लिए कोई प्लान नहीं बनाया। इसका ख़ामियाजा आज राज्य के किसानों को भुगतना पड़ा रहा है।

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