Holi And Indian Farming : केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि किसानों की मेहनत का जश्न है होली

होली का त्योहार (Holi festival) सिर्फ रंगों का ही नहीं, बल्कि खुशियों और मेहनत के रंगों का भी (Holi and Indian farming) त्योहार है। और इस खुशी में सबसे आगे होते हैं हमारे अन्नदाता किसान भाई।

Holi And Indian Farming : केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि किसानों की मेहनत का जश्न है होली

फाल्गुन का महीना आते ही चारों तरफ रंग ही रंग नजर आने लगते हैं। गलियों में बच्चे पिचकारी लेकर दौड़ते हैं, बड़े-बूढ़े गुलाल लगाकर गले मिलते हैं। होली का त्योहार (Holi festival) सिर्फ रंगों का ही नहीं, बल्कि खुशियों और मेहनत के रंगों का भी (Holi and Indian farming) त्योहार है। और इस खुशी में सबसे आगे होते हैं हमारे अन्नदाता किसान भाई।

फ़सल पकने की खुशी

क्या आप जानते हैं कि होली असल में किसानों की मेहनत पूरी होने की खुशी में मनाई जाती है? फाल्गुन का महीना (the month of Phalguna) यानी मार्च के आसपास रबी की फसल पककर तैयार हो जाती है। गेहूं की सुनहरी बालियां, सरसों के पीले फूल और चने की हरी-भरी फसल। ये नजारा देखने लायक होता है। महीनों की मेहनत के बाद जब किसान के घर अनाज आता है, तो खुशी का ठिकाना नहीं रहता। यही खुशी होली के रंगों में बहती है।

होलिका दहन का मतलब

होली से एक रात पहले होलिका दहन होता है। लोग लकड़ियां इकट्ठा करते हैं और आग जलाते हैं। इस आग में किसान नई फसल की बालियां ले जाकर भूंजते हैं। यह एक तरह से प्रकृति को धन्यवाद देने का तरीका है कि उसने अच्छी फसल दी। यही भूने हुए अनाज को प्रसाद की तरह बांटा जाता है और खाया जाता है। ये रिवाज आज भी गांवों में बड़ी श्रद्धा से निभाया जाता है।

पुराने ज़माने के रंग

होली में जो रंग इस्तेमाल होते थे, वो भी खेतों में ही मिलते थे। लाल रंग के लिए पलाश के फूल या अनार के छिलके सुखाकर पीस लिए जाते थे। पीला रंग हल्दी और गेंदे के फूलों से बनता था। हरा रंग मेंहदी या नीम की पत्तियों से तैयार किया जाता था। यानी किसान न सिर्फ हमारे लिए अनाज उगाते थे, बल्कि त्योहार के रंग भी उन्हीं की देन होते थे। आज हम केमिकल वाले रंगों से बचने की बात करते हैं, तो असल में हम पुरानी परंपरा की ओर ही लौट रहे हैं।

गांवों की होली का मज़ा

गांवों में होली का मजा ही कुछ और है। यहां होली दिखावे की नहीं, बल्कि दिल से मनाई जाती है। उत्तर प्रदेश के ब्रज क्षेत्र की होली (Holi in the Braj region of Uttar Pradesh) तो दुनियाभर में मशहूर है। वहां पूरे 15 दिन होली चलती है। लोग ढोल-मंजीरे लेकर सड़कों पर नाचते हैं और रंग खेलते हैं। राजस्थान के बारां जिले में आदिवासी भाई-बहन होली पर गोबर से भैंसों की मूर्तियां बनाते हैं और अपने जानवरों और फसल की रक्षा के लिए भगवान का शुक्रिया अदा करते हैं।

नई शुरुआत का प्रतीक

होली सिर्फ पुरानी खुशियों का जश्न नहीं है, बल्कि नई शुरुआत का भी प्रतीक है। फसल कट जाने के बाद किसान अगली फसल की तैयारी शुरू कर देते हैं। होलिका दहन की आग में पुरानी पत्तियां और फसल के अवशेष जलाए जाते हैं, जिससे खेत साफ हो जाता है और नई फसल के लिए जमीन तैयार होती है। इस तरह होली खेती का एक अहम हिस्सा भी है।

सीख

तो जब आप होली खेलें और किसी को रंग लगाएं, तो ये ज़रूर याद करें कि ये रंग सिर्फ रंग का नहीं, बल्कि हमारे किसान भाइयों की मेहनत का भी रंग है। याद करें उन हाथों को, जिन्होंने गेहूं की बालियां काटी, सरसों के फूल तोड़े और हमारे घर तक अनाज पहुंचाया।

होली हमें सिखाती है कि मेहनत कभी बेकार नहीं जाती। जैसे फसल पकने पर किसान को खुशी मिलती है, वैसे ही मेहनत करने वाले हर इंसान को एक न एक दिन रंगीन फल जरूर मिलता है।

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