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तेलंगाना में इस सीजन कपास उत्पादक किसानों के लिए राहत भरी खबर सामने आई है। भारतीय कपास निगम यानी CCI ने बड़े स्तर पर कपास की खरीद करते हुए अब तक 12,823 करोड़ रुपये का भुगतान किया है। राज्य में 8.80 लाख किसानों से कुल 16.15 लाख टन कपास की खरीद की जा चुकी है। यह आंकड़ा इस बात का संकेत है कि इस वर्ष कपास की खेती करने वाले किसानों को अपनी उपज बेचने का बेहतर अवसर मिला है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार इस साल तेलंगाना में 18.21 लाख हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में कपास की खेती की गई थी। बड़े रकबे में बोई गई फ़सल के चलते बाज़ार में भी कपास की आवक अधिक रही, जिसे ध्यान में रखते हुए कपास की खरीद को प्राथमिकता दी गई।
10 लाख टन कपास बाज़ार में आने की उम्मीद
राज्य के कृषि मंत्री तुम्मला नागेश्वर राव ने जानकारी दी कि अभी लगभग 10 लाख टन कपास बाज़ार में आना बाकी है। उनका कहना है कि आने वाले दिनों में किसान अपनी बची हुई उपज को CCI के मार्केट यार्ड में लेकर आएंगे। इस संभावित आवक को देखते हुए कपास की खरीद व्यवस्था को सुचारु बनाए रखने की तैयारी की जा रही है।
उन्होंने बताया कि राज्य सरकार किसानों से लगातार संपर्क में है ताकि कपास की खेती से जुड़े उत्पादकों को अपनी उपज बेचने में किसी तरह की दिक्कत न हो। सरकार का उद्देश्य है कि हर किसान को समय पर उचित समर्थन मूल्य मिल सके।
27 फरवरी तक खुला रहेगा बाज़ार
मंडियों में फ़सल देर से पहुंचने के पीछे इस बार सीजन में हुई देरी को मुख्य कारण माना जा रहा है। कई किसानों की फ़सल समय पर तैयार नहीं हो सकी, जिससे कपास की खरीद की प्रक्रिया प्रभावित हुई। इस स्थिति को देखते हुए राज्य सरकार ने केंद्र सरकार से समय सीमा बढ़ाने का अनुरोध किया था।
कृषि मंत्री ने बताया कि CCI ने किसानों के हित में कपास की खरीद की अंतिम तारीख 27 फरवरी तक बढ़ाने पर सहमति दे दी है। इससे उन किसानों को राहत मिलेगी जो अब तक अपनी उपज नहीं बेच पाए हैं। यह फैसला ख़ास तौर पर उन इलाकों के किसानों के लिए महत्वपूर्ण है जहां कपास की खेती देर से पूरी हुई।
नए मोबाइल ऐप से बदली खरीद प्रक्रिया
इस सीजन में कपास की खरीद के लिए सरकार ने एक नया मोबाइल ऐप भी लागू किया है। शुरुआत में किसानों और जिनिंग मिलों की ओर से इस ऐप को लेकर कुछ आपत्तियां सामने आई थीं, लेकिन अब अधिकांश समस्याएं सुलझा ली गई हैं।
कृषि मंत्री ने कहा कि ऐप के जरिए पूरी प्रक्रिया अधिक पारदर्शी और सरल हो गई है। पहले जहां मंडियों में लंबी कतारें लगती थीं, अब पंजीकरण और लेन-देन की प्रक्रिया डिजिटल माध्यम से तेजी से हो रही है। इससे कपास की खरीद में समय की बचत हो रही है और किसानों को बार-बार चक्कर नहीं लगाने पड़ रहे।
डिजिटल व्यवस्था से कपास की खेती करने वाले किसानों को भुगतान प्रक्रिया में भी सुविधा मिल रही है। ऑनलाइन सिस्टम के कारण रिकॉर्ड रखना आसान हुआ है और पारदर्शिता बढ़ी है।
ग्रामीण क्षेत्रों के किसानों को बड़ी राहत
तेलंगाना के ग्रामीण इलाकों में बड़ी संख्या में किसान कपास की खेती पर निर्भर हैं। ऐसे में समय पर कपास की खरीद होना उनके लिए बेहद ज़रूरी है। इस बार बड़ी मात्रा में की गई खरीद और भुगतान से किसानों की आय में सीधा असर पड़ा है।
सरकार का मानना है कि खरीद प्रक्रिया में सुधार से किसानों का भरोसा भी बढ़ा है। पहले कई बार किसान मंडियों में इंतजार करते रहते थे, लेकिन अब बेहतर प्रबंधन के कारण प्रक्रिया सुचारु हो रही है। कपास की खरीद को तय समय तक जारी रखने से किसानों को अपनी पूरी उपज बेचने का अवसर मिलेगा।
उत्पादन और विपणन के बीच संतुलन की कोशिश
राज्य में बड़े पैमाने पर कपास की खेती होने के कारण विपणन व्यवस्था मज़बूत होना ज़रूरी था। 18.21 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में बोई गई फ़सल का सीधा असर बाज़ार में आपूर्ति पर पड़ा। ऐसे में CCI की सक्रिय भूमिका से कपास की खरीद को व्यवस्थित तरीके से आगे बढ़ाया गया।
कृषि मंत्री ने उम्मीद जताई कि आने वाले दिनों में शेष कपास भी मंडियों में पहुंचेगी और किसानों को पूरा लाभ मिलेगा। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार किसानों की समस्याओं को समझते हुए हर ज़रूरी कदम उठा रही है।
किसानों के हित में उठाए गए कदम
इस पूरे अभियान का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कपास की खेती करने वाले किसी भी किसान को अपनी उपज बेचने में परेशानी न हो। 27 फरवरी तक बढ़ाई गई समय सीमा और डिजिटल ऐप जैसे सुधारों से कपास की खरीद प्रक्रिया पहले से अधिक व्यवस्थित और किसान हितैषी बनी है।
तेलंगाना में अब तक 12,823 करोड़ रुपये की कपास की खरीद यह दिखाती है कि सरकारी एजेंसियां सक्रिय रूप से किसानों की उपज खरीद रही हैं। आने वाले दिनों में शेष कपास की आवक के साथ यह आंकड़ा और बढ़ सकता है।
कुल मिलाकर, इस वर्ष की कपास की खरीद व्यवस्था ने यह संकेत दिया है कि यदि उत्पादन और विपणन के बीच समन्वय बेहतर हो तो किसानों को समय पर भुगतान और बाज़ार की सुविधा मिल सकती है। इससे कपास की खेती करने वाले किसानों का भरोसा मज़बूत होगा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी सहारा मिलेगा।
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