Colorful Revolutions और Indian Economy: जानिए, कैसे रंगों ने मिलकर बुनी भारत की आर्थिक ताकत की डोर

इस आर्टिकल में जानिए कैसे रंगीन क्रांतियों (Colorful Revolutions) ने देश की तकदीर बदल दी। ये क्रांतियां केवल प्रोडक्शन बढ़ाने तक सीमित नहीं थीं, बल्कि इन्होंने राष्ट्र की सामाजिक-आर्थिक बुनियाद को हमेशा के लिए बदल कर रख दिया।

Colorful Revolutions और Indian Economy: जानिए, कैसे रंगों ने मिलकर बुनी भारत की आर्थिक ताकत की डोर

भारत की अर्थव्यवस्था की कहानी केवल आंकड़ों और विकास दर की कहानी नहीं है, ये उन अलग-अलग रंगीन क्रांतियों (Colorful Revolutions) की गाथा है जिन्होंने देश की तकदीर बदल दी। ये क्रांतियां केवल प्रोडक्शन बढ़ाने तक सीमित नहीं थीं, बल्कि इन्होंने राष्ट्र की सामाजिक-आर्थिक बुनियाद को हमेशा के लिए बदल कर रख दिया। आइए, इन Colorful Revolutions के सार और उनके आर्थिक प्रभाव को गहराई से समझते हैं।

हरित क्रांति: खाद्य सुरक्षा की नींव (Green Revolution: The Foundation of Food Security)

1960 और 70 के दशक में शुरू हुई हरित क्रांति (Green Revolution) भारत के लिए एक वरदान साबित हुई। इसका मुख्य उद्देश्य उच्च उपज वाले बीजों (HYV), रासायनिक उर्वरकों (chemical fertilizers)और सिंचाई सुविधाओं (irrigation facilities) के इस्तेमाल से फूड प्रोडक्शन, ख़ासकर गेहूं और चावल में phenomenal इज़ाफा करना था।

आर्थिक प्रभाव (Economic Impact)

  • खाद्य संकट से आत्मनिर्भरता तक: भारत एक खाद्यान्न आयातक देश से एक्सपोर्टर बनने की ओर आगे बढ़ा। इससे खाद्य सुरक्षा में बढ़ोतरी हुई और फूड प्रोडक्ट्स की कीमतों में स्थिरता आई।
  • कृषि क्षेत्र में इज़ाफा: कृषि में विकास दर तेज हुई, जिसने सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
  • ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सुधार: किसानों की आमदनी में बढ़ोतरी हुई। जिससे ग्रामीण बाजारों में मांग पैदा हुई और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को तेज़ी मिली।

हालांकि, इसके जल संकट, मृदा अपरदन और क्षेत्रीय असमानता जैसी चुनौतियां भी सामने आईं।

श्वेत क्रांति: दुग्ध उत्पादन में आत्मनिर्भरता (White Revolution: Self-reliance in milk production)

‘Operation Flood’ के नाम से मशहूर श्वेत क्रांति डॉ. वर्गीज कुरियन की देन है, जिसने 1970 के दशक में भारत को दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक देश (The world’s largest milk producing country) बना दिया।

आर्थिक प्रभाव (Economic impact):

  • सहकारिता मॉडल की सफलता: इसने ‘अमूल’ जैसे सहकारी संगठनों के ज़रीये से किसानों को सीधे बाजार से जोड़ा, बिचौलियों को हटाया और किसानों को उचित दाम दिलाया।
  • ग्रामीण रोजगार और आमदनी : इससे पशुपालकों, विशेषकर छोटे और सीमांत किसानों और भूमिहीन मजदूरों की आय में विविधता आई और स्थिरता बढ़ी।
  • पोषण सुरक्षा: देश की बड़ी आबादी को सस्ता और पौष्टिक दूध उपलब्ध हो सका, जिससे कुपोषण दूर करने में मदद मिली।

नीली क्रांति: समुद्री संसाधनों का दोहन (Blue Revolution: Utilize Marine Resources)

नीली क्रांति का टारगेट मत्स्य पालन और जल कृषि क्षेत्र का विकास करना था। इसके तहत आधुनिक मछली पकड़ने के जहाज, रेफ्रिजरेशन फैसिलिटी और प्रोसेसिंग यूनिट्स स्थापित की गईं।

आर्थिक प्रभाव (Economic impact):

  • निर्यात में बढ़ोतरी: भारत विश्व के प्रमुख मत्स्य निर्यातक देशों में शामिल हो गया, जिससे विदेशी मुद्रा मिली। 
  • तटीय अर्थव्यवस्था को बल: इसने तटीय क्षेत्रों में लाखों लोगों को रोजगार दिया और समुद्री उत्पादों से जुड़े उद्योगों को बढ़ावा मिला।

पीली क्रांति: तिलहन उत्पादन में क्रांति (Yellow Revolution: Revolution in Oilseed Production)

1980-90 के दशक में तिलहन उत्पादन में आत्मनिर्भरता (self sufficiency) हासिल करने के लिए पीली क्रांति (Yellow Revolution) शुरू की गई। ‘तिलहन प्रौद्योगिकी मिशन’ (‘Oilseeds Technology Mission’) इसका प्रमुख हिस्सा था।

आर्थिक प्रभाव (Economic impact):

  • विदेशी मुद्रा की बचत: इससे पहले भारत खाद्य तेलों का एक बड़ा आयातक था। पीली क्रांति ने आयात पर निर्भरता कम करके कीमती विदेशी मुद्रा की बचत की।
  • किसानों के लिए वैकल्पिक फसल: किसानों को गेहूं और धान के अलावा एक लाभकारी फसल का विकल्प मिला, जिससे फसल विविधीकरण को बढ़ावा मिला।

 एक सतत यात्रा (A Continuous Journey)

इन रंगीन क्रांतियों (Colorful Revolutions) ने मिलकर भारतीय अर्थव्यवस्था को एक नई दिशा दी है। इन्होंने न केवल उत्पादन बढ़ाया बल्कि ग्रामीण गरीबी उन्मूलन, रोजगार को बढ़ावा और एक्सपोर्ट  को बढ़ावा देने में अहम भूमिका निभाई। 

 

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1 thought on “Colorful Revolutions और Indian Economy: जानिए, कैसे रंगों ने मिलकर बुनी भारत की आर्थिक ताकत की डोर”

  1. मुलताई में कुछ बैंक, कुछ शॉपिंग कॉम्प्लेक्स बिना पार्किंग के संचालित हो रहे हैं, तथा कुछ लोगों ने पार्किंग के लिए जगह बहुत कम दी है। जो वाहन पार्किंग के लिए पर्याप्त नहीं है। इससे ग्राहको को वाहन खड़े करने में बहुत परेशानी होती है। आखिर बिना पार्किंग के बैंक कैसे संचालित हो रहे हैं। ये तो नियमों का उल्लघंन हो रहा है। सड़क किनारे वाहन खड़े करने से यातायात व्यवस्था प्रभावित होती है। कई बार दुर्घटना तक हो जाती है। सरकारी जमीन पर वाहन खड़े हो रहे हैं । जबकि जिस भवन मे बैंक संचालित होती है उसकी स्वयं की पार्किंग होना जरूरी है। मुलताई में संचालित सभी बैंकों की पार्किंग व्यवस्था की जांच होना चाहिए।
    कुछ बेसमेंट बिना अनुमति के बने हैं। कुछ व्यावसायिक भवनों के नक्शे बिना पार्किंग दिए पास हुए हैं। कुछ लोगों ने सरकारी जमीन पर पक्का अतिक्रमण कर लिया है। जांच होना चाहिए।
    नाम – रवि खवसे
    शहर – मुलताई
    जिला – बैतूल
    राज्य – मध्यप्रदेश

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