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भारत के गांवों में मिट्टी की सेहत और परिवार का भोजन अक्सर मशीनों, दवाओं या सरकारी कागज़ों से नहीं, बल्कि महिलाओं की रोज़ की मेहनत से सुरक्षित रहता है। गोबर सँभालना, खाद बनाना, रसोई का कचरा मिट्टी में लौटाना, किचन गार्डन लगाना और देसी बीज बचाना — ये सब काम ज़्यादातर महिला किसान (Women Farmers) करती हैं। यह काम काग़ज़ों में नहीं दिखता, लेकिन इसका असर साफ़ दिखता है। मिट्टी ज़िंदा रहती है, फ़सलें अलग-अलग होती हैं और परिवार का खाना संतुलित रहता है।
सरकारी सर्वे और मैदानी रिपोर्ट बताते हैं कि खेती में महिलाओं की हिस्सेदारी लगभग आधी है, खासकर वर्षा आधारित, आदिवासी और छोटे किसानों वाले इलाकों में। लेकिन महिलाओं का काम सिर्फ़ खेत में मजदूरी करना नहीं है। NABARD और NSSO की रिपोर्टों के अनुसार बीज चुनने, कौन-सी फ़सल बोई जाए, कटाई के बाद अनाज सँभालने, भंडारण करने और घर के खाने की योजना बनाने में महिलाओं की अहम भूमिका होती है। यही छोटे-छोटे फैसले तय करते हैं कि मिट्टी में क्या उगेगा और थाली में क्या आएगा।
किसानों के लिए यह समझना ज़रूरी है कि अच्छा पोषण बाज़ार से शुरू नहीं होता। यह मिट्टी से और उसे सँभालने वाले हाथों से शुरू होता है। अगर महिलाओं की भूमिका को नज़रअंदाज़ किया गया, तो खेती कमज़ोर होगी। अगर इसे मज़बूत किया गया, तो मिट्टी, फ़सल और परिवार — तीनों मज़बूत होंगे।
मिट्टी की ताक़त घर से बनती है
अधिकतर गांवों में जैविक खाद का सारा काम महिला किसान (Women Farmers) ही संभालती हैं, लेकिन इसे शायद ही कभी “मिट्टी का काम” कहा जाता है। महिला किसान (Women Farmers) गोबर, फ़सल के डंठल, पत्तियां, रसोई का कचरा और राख इकट्ठा करती हैं और उनसे खाद बनाती हैं। यही खाद मिट्टी में जान डालती है और उसे लंबे समय तक उपजाऊ बनाए रखती है।
महिला किसान (Women Farmers) यह भी तय करती हैं कि खाद कहां डालनी है — किचन गार्डन में, दाल वाली क्यारी में, सब्ज़ी के खेत में या खेत के कमज़ोर हिस्से में। इन फैसलों से मिट्टी में जीवाणु बढ़ते हैं, नमी बनी रहती है और पोषक तत्व ठीक से मिलते हैं। NABARD के अध्ययनों में देखा गया है कि जहां महिला किसान (Women Farmers) खाद का सही इस्तेमाल करती हैं, वहां धीरे-धीरे रासायनिक खाद पर निर्भरता कम हो जाती है, फिर भी फ़सल ठीक रहती है।
वर्षा आधारित इलाकों में महिला किसान (Women Farmers) अक्सर मिट्टी को हाथ से देखकर, नमी समझकर और फ़सल की हालत देखकर खाद डालती हैं। यह अनुभव मिट्टी को सख्त होने और फ़सल को कमज़ोर होने से बचाता है। इससे मिट्टी नरम रहती है, पानी कम बहता है और केंचुए बढ़ते हैं, जो मिट्टी के लिए बहुत ज़रूरी हैं। किसानों के लिए सीधी बात है। मिट्टी की ताक़त सिर्फ़ खरीदी हुई खाद से नहीं आती। यह रोज़ की छोटी-छोटी आदतों से बनती है, और महिलाओं की मेहनत इस काम को लगातार चलाए रखती है।
किचन गार्डन: घर का पोषण कवच
किचन गार्डन मिट्टी और परिवार के पोषण के बीच सबसे मज़बूत कड़ी हैं, और इन्हें ज़्यादातर महिला किसान (Women Farmers) ही संभालती हैं। इन छोटे बागानों में साग, सब्ज़ियां, दालें, जड़ वाली फ़सलें, बेल वाली सब्ज़ियां और औषधीय पौधे उगते हैं। ये चीज़ें बाज़ार में कम मिलती हैं, लेकिन आयरन, कैल्शियम और विटामिन के लिए बहुत ज़रूरी हैं।
महिला किसान (Women Farmers) किचन गार्डन में खाद, गोबर का घोल, राख और घर का बचा हुआ पानी इस्तेमाल करती हैं। इसी वजह से इन बागानों की मिट्टी अक्सर बड़े खेतों से ज़्यादा उपजाऊ होती है। पौधे अच्छे बढ़ते हैं, स्वाद अच्छा होता है और पोषण भी ज़्यादा होता है। FAO के अध्ययनों से पता चलता है कि जिन घरों में किचन गार्डन होते हैं, वहां सब्ज़ियां ज़्यादा खाई जाती हैं और शरीर में पोषण की कमी कम होती है। इससे किसानों को बाज़ार की महंगी और रसायन वाली सब्ज़ियों पर कम निर्भर रहना पड़ता है।
किचन गार्डन सीखने की जगह भी होते हैं। महिला किसान (Women Farmers) यहां नई फ़सलें आज़माती हैं, बीज बचाती हैं और देसी तरीके से कीट नियंत्रण करती हैं। धीरे-धीरे यही सीख बड़े खेतों में भी काम आती है। सूखे या बाज़ार बंद होने के समय किचन गार्डन परिवार के लिए सुरक्षा बन जाते हैं।
बीज बचाना और फ़सल की विविधता
भारत में देसी बीजों को बचाने का काम ज़्यादातर महिला किसान (Women Farmers) करती हैं। ओडिशा, बिहार, राजस्थान, महाराष्ट्र और उत्तर-पूर्व के राज्यों में महिला किसान (Women Farmers) सब्ज़ियों, बाजरों, दालों और साग के बीज सँभालकर रखती हैं, जो उसी इलाके की मिट्टी और मौसम के हिसाब से बने होते हैं। ये बीज कम खाद-पानी में भी ठीक चलते हैं, स्थानीय कीटों से लड़ लेते हैं और खराब मौसम में भी टिक जाते हैं। कई किस्में होने से पूरी फ़सल खराब होने का खतरा कम हो जाता है। अलग-अलग जड़ों वाली फ़सलें मिट्टी को भी मज़बूत बनाती हैं।
NABARD से जुड़े स्वयं सहायता समूहों ने बताया है कि महिला-नेतृत्व वाले बीज बैंक बाहर से बीज खरीदने की ज़रूरत कम करते हैं और स्वाद, पोषण और टिकाऊपन वाली किस्में बचाए रखते हैं। इससे किसानों का ख़र्च कम होता है और फ़सल पर उनका नियंत्रण बढ़ता है। फ़सल की विविधता मिट्टी को भी बचाती है। एक ही फ़सल बार-बार बोने से मिट्टी थक जाती है, जबकि अलग-अलग फ़सलें मिट्टी को संतुलन में रखती हैं। इस तरह महिलाओं का बीज बचाने का काम सीधे मिट्टी की सेहत से जुड़ा है।
संगठन और पैसे तक पहुंच
स्वयं सहायता समूहों, संयुक्त देयता समूहों और महिला किसान उत्पादक संगठनों के ज़रिये महिला किसान (Women Farmers) अब बड़े स्तर पर खेती से जुड़े फैसलों को प्रभावित कर रही हैं। NABARD के कार्यक्रम बताते हैं कि जब महिलाओं के हाथ में बचत और कर्ज़ का फैसला होता है, तो पैसा खाद गड्ढे, वर्मी कम्पोस्ट, किचन गार्डन और अलग-अलग फ़सलों पर ख़र्च होता है। इन समूहों से प्रशिक्षण भी आसान होता है। महिला किसान (Women Farmers) खाद बनाना, देसी जैविक घोल तैयार करना, बीज सँभालना और नमी बचाने के तरीके सीखती हैं। इससे खेती की लागत कम होती है और मिट्टी धीरे-धीरे सुधरती है।
महिला-नेतृत्व वाले एफपीओ अक्सर बाजरा, दाल, सब्ज़ी और देसी फ़सलों पर ध्यान देते हैं, जो मिट्टी और सेहत दोनों के लिए अच्छी हैं। ऐसे समूहों से जुड़ने पर किसानों को योजनाओं की जानकारी, बेहतर दाम और एक-दूसरे से सीखने का मौक़ा मिलता है।
पहचान क्यों ज़रूरी है?
इतना काम करने के बाद भी कई महिलाओं के नाम ज़मीन नहीं होती और उन्हें किसान के रूप में मान्यता नहीं मिलती। इससे वे मृदा स्वास्थ्य कार्ड, सलाह सेवाएँ, फ़सल बीमा और कर्ज़ जैसी सुविधाओं से दूर रह जाती हैं। FAO की रिपोर्टें साफ़ कहती हैं कि जब महिलाओं को बराबर साधन मिलते हैं, तो खेती और पर्यावरण दोनों बेहतर होते हैं।
महिलाओं को किसान मानने से मिट्टी का काम बेहतर होता है, क्योंकि महिला किसान (Women Farmers) जल्दी फ़ायदा देखने के बजाय लंबे समय की सेहत पर ध्यान देती हैं। उनके फैसले फ़सल, भोजन और भविष्य — तीनों को संतुलित रखते हैं। महिला किसान सिर्फ़ मदद करने वाली नहीं हैं। वे मिट्टी, बीज और पोषण की असली रखवाली करने वाली हैं। खाद बनाकर, बीज बचाकर, किचन गार्डन लगाकर और समूह बनाकर वे गांव का पोषण बचाए रखती हैं।
अगर भारतीय खेती को मज़बूत बनाना है, तो नीतियों और योजनाओं में महिलाओं की इस भूमिका को पहचानना और सहारा देना होगा। स्वस्थ मिट्टी, अच्छा भोजन और मज़बूत गांव उन छोटे-छोटे फैसलों पर टिके हैं, जो महिला किसान (Women Farmers) हर दिन खेत और घर में लेती हैं।
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