Coconut Waste: नारियल का कचरा कैसे बना शहरों में हरित रोज़गार और आय का नया ज़रिया जानिए

नारियल का कचरा (Coconut Waste) अब शहरों की समस्या नहीं, बल्कि हरित आजीविका, जैविक खाद और सर्कुलर इकॉनॉमी का मज़बूत आधार बन चुका है।

Coconut Waste नारियल का कचरा

एक समय था जब बढ़ती आबादी और तेज़ शहरीकरण के साथ कचरा शहरों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनता जा रहा था। ख़ासतौर पर तटीय शहरों में नारियल का कचरा (Coconut Waste) नालियों, लैंडफिल और सार्वजनिक स्थलों पर गंभीर समस्या पैदा करता था। लेकिन स्वच्छ भारत मिशन के तहत अब तस्वीर बदल रही है। आज नारियल का कचरा (Coconut Waste) केवल फेंकने वाली चीज़ नहीं, बल्कि आजीविका, रोज़गार और हरित अर्थव्यवस्था का मज़बूत आधार बन चुका है।

स्वच्छ भारत मिशन के तहत बदली सोच, कचरा बना संसाधन

आवास और शहरी कार्य मंत्रालय (MoHUA) के नेतृत्व में स्वच्छ भारत मिशन–शहरी के अंतर्गत कचरा प्रबंधन को नई दिशा दी गई है। इस पहल ने यह साबित किया है कि सही नीति और तकनीक के साथ नारियल का कचरा (Coconut Waste) और अन्य हरा कचरा शहरों के लिए बोझ नहीं, बल्कि अवसर बन सकते हैं। तटीय इलाकों में नारियल पानी की बढ़ती खपत ने पहले जहां कचरे का अंबार खड़ा किया, वहीं अब वही कचरा सर्कुलर इकॉनॉमी का अहम हिस्सा बन गया है।

तटीय शहरों में नारियल कचरे की समस्या से समाधान तक

समुद्र किनारे घूमने आने वाले पर्यटकों के बीच नारियल पानी हमेशा पसंदीदा पेय रहा है। इससे रोज़ाना बड़ी मात्रा में नारियल का कचरा (Coconut Waste) निकलता है। पहले यह कचरा लैंडफिल में जाता था, लेकिन अब इसे अलग-अलग संग्रह कर रिसाइक्लिंग की जा रही है। नारियल के छिलकों से कोकोपीट, जैविक खाद और कॉयर फाइबर तैयार किए जा रहे हैं। इस प्रक्रिया में हरा कचरा भी खाद निर्माण में उपयोग हो रहा है, जिससे मिट्टी की सेहत सुधर रही है।

Coconut Waste: नारियल का कचरा कैसे बना शहरों में हरित रोज़गार और आय का नया ज़रिया जानिए

छोटे प्रतिशत में दिखने वाला, लेकिन बड़ा प्रभाव डालने वाला कचरा

आंकड़ों के अनुसार, शहरी गीले कचरे में नारियल का कचरा (Coconut Waste) भले ही 3–5 प्रतिशत हो, लेकिन तटीय शहरों में यह हिस्सा 6–8 प्रतिशत तक पहुंच जाता है। रोज़ाना देश में निकलने वाले लाखों टन कचरे के मुकाबले यह मात्रा बड़ी है। कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल जैसे राज्यों में नारियल उत्पादन अधिक होने के कारण यहां कचरे से संपदा की यह प्रक्रिया तेज़ी से आगे बढ़ रही है।

वैश्विक बाज़ार में भारत की मज़बूत पकड़

भारत न केवल नारियल उत्पादन में अग्रणी है, बल्कि इससे बनने वाले उत्पादों के निर्यात में भी आगे है। कॉयर और कोकोपीट जैसे उत्पादों की वैश्विक मांग लगातार बढ़ रही है। नारियल का कचरा (Coconut Waste) अब विदेशी मुद्रा कमाने का भी ज़रिया बन रहा है। यूरोप और अमेरिका में बिना मिट्टी वाली खेती में कोकोपीट की मांग तेज़ी से बढ़ी है, जिससे भारत के निर्यात को मज़बूती मिली है। यह साबित करता है कि हरा कचरा भी अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में मूल्य रखता है।

शहरों में बन रहे हैं नारियल कचरा प्रबंधन क्लस्टर

बेंगलुरु, मैसूरु, मंगलुरु, चेन्नई, कोच्चि, तिरुवनंतपुरम, विशाखापत्तनम, सूरत, मुंबई और पुणे जैसे शहरों में अब नारियल का कचरा (Coconut Waste) प्रबंधन के लिए विशेष यूनिट्स विकसित की जा रही हैं। कुछ शहरों ने तो 100 प्रतिशत नारियल कचरे की रिसाइक्लिंग का लक्ष्य हासिल कर लिया है। धार्मिक स्थलों पर निकलने वाला नारियल का कचरा (Coconut Waste) भी अब अलग से प्रोसेस किया जा रहा है, जिससे लैंडफिल पर दबाव कम हुआ है।

सरकारी योजनाओं से मिला आर्थिक सहारा

स्वच्छ भारत मिशन–शहरी 2.0 के तहत कचरा प्रोसेसिंग यूनिट्स को वित्तीय सहायता दी जा रही है। केंद्र सरकार 25 से 50 प्रतिशत तक की सहायता प्रदान कर रही है। इसके साथ ही कॉयर उद्योग से जुड़ी योजनाओं ने छोटे उद्यमियों को आगे बढ़ने का मौका दिया है। नारियल का कचरा (Coconut Waste) अब खाद, कॉयर और बायो-सीएनजी जैसे उत्पादों में बदलकर आय का स्रोत बन रहा है।

महिला स्वयं सहायता समूहों को मिला नया रोज़गार

देशभर में हजारों महिलाएं स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से नारियल का कचरा (Coconut Waste) प्रोसेसिंग से जुड़ी हैं। कॉयर सेक्टर (Coir Sector) में काम करने वाले लोगों में बड़ी संख्या महिलाओं की है। इससे न केवल रोज़गार मिला है, बल्कि सामाजिक सम्मान और आर्थिक आत्मनिर्भरता भी बढ़ी है। हरा कचरा और नारियल के अवशेष अब महिलाओं के लिए नियमित आय का साधन बन चुके हैं।

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भुवनेश्वर से पटना तक सफ़ल मॉडल

भुवनेश्वर में मंदिरों से निकलने वाला नारियल का कचरा (Coconut Waste) अब कॉयर फाइबर और जैविक खाद में बदला जा रहा है। इससे स्थानीय लोगों को स्थायी रोज़गार मिला है। केरल के कुन्नमकुलम में दुर्गंध-मुक्त खाद तैयार की जा रही है, जिससे किसान भी लाभ कमा रहे हैं। चेन्नई, इंदौर और पटना जैसे शहरों में नारियल का कचरा (Coconut Waste) प्रोसेसिंग से लैंडफिल पर जाने वाला कचरा काफ़ी हद तक रोका गया है और हरा कचरा उपयोगी संसाधन बन गया है।

सर्कुलर इकॉनॉमी की ओर बढ़ता भारत

आज नारियल का कचरा (Coconut Waste) भारत के लिए पर्यावरण संरक्षण, रोज़गार सृजन और आय बढ़ाने का माध्यम बन चुका है। यह मॉडल दिखाता है कि जब नीति, तकनीक और समाज मिलकर काम करते हैं, तो कचरा भी समृद्धि की राह खोल सकता है। हरा कचरा और नारियल अवशेषों की यह यात्रा बताती है कि स्वच्छता केवल सफाई नहीं, बल्कि सतत विकास का आधार है।

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