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धान की खेती में ज़रूरी है रोग और कीटों का उन्नत प्रबंधन, जानिए इसका सही तरीका

धान की फसल में समय रहते रोग-कीटों का प्रबंधन करना ज़रूरी है

चावल की खपत सिर्फ़ भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में बहुत अधिक है। ऐसे में वैश्विक आबादी की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए पैदावार बढ़ाना ज़रूरी है, मगर कीट और रोग धान की खेती में बहुत नुकसान पहुंचाते हैं।

धान हमारे देश की एक महत्वपूर्ण खरीफ़ फसल है। धान से ही चावल निकाला जाता है। देश के 36.95 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र में धान की खेती की जाती है, जिसकी वजह से भारत धान का सबसे बड़ा उत्पादक देश है। पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, पंजाब, ओडिशा, बिहार और छत्तीसगढ़ में बड़े पैमाने पर धान की खेती होती है।

धान की खेती किसानों की आमदनी का सबसे अहम स्रोत है, लेकिन कई बार कीटों और बीमारियों के कारण फसल को बहुत नुकसान पहुंचता है, जिसकी वजह से किसानों को मुनाफे की बजाय नुकसान उठाना पड़ जाता है। ऐसे में धान की फसल में सही कीट प्रबंधन बहुत ज़रूरी है। इसके लिए किसानों को धान में लगने वाले रोग और कीटों की जानकारी होनी चाहिए, साथ ही साथ उसे नियंत्रित करने का तरीका भी पता होना चाहिए। आइए, जानते हैं धान में लगने वाले प्रमुख रोग व कीट के नियंत्रण के तरीके।

धान की खेती में लगने वाले रोग और प्रबंधन

खैरा रोग: ये रोग मिट्टी में ज़िंक की कमी की वजह से होता है, जिससे पत्तियों पर हल्के पीले धब्बे बन जाते हैं, जो बाद में कत्थई रंग में बदल जाते हैं।

प्रबंधन: जिंक सल्फेट और बुझा हुआ चूना (100 ग्राम और 50 ग्राम) प्रति नाली के हिसाब से 15-20 लीटर पानी में घोलकर छिड़कें।

झोंका (ब्लास्ट)
इस रोग का असर जुलाई से सितंबर के बीच बहुत ज़्यादा होता है। इस रोग से पीड़ित पौधों की पत्तियों, तने, गांठों, फूलों के गुच्छों और बालियों पर लक्षण दिखने लगते हैं। इस बीमारी के कारण पत्तियों पर आंख जैसी आकृति या सर्पिलाकार धब्बे उभरने लगते हैं। तने और फूलों के गुच्छों का कुछ हिस्सा या पूरा भाग ही काला पड़ जाता है और तने सिकुड़कर नीचे गिर जाते हैं।

प्रबंधन: रोग के नियंत्रण के लिए प्रति किलो बीज को 2 ग्राम ट्राइसाइक्लेजोल से उपचारित करें और अगर ज़रूरत पड़ें तो फूल निकलने वाली अवस्था में एक प्रतिशत कार्बेन्डाजिम का छिड़काव करें।

भूरी चित्ती रोग
ये रोग कम उपजाऊ इलाकों में ज्यादा होता है। इस बीमारी में पत्तियों पर छोटे-छोटे भूरे रंग के धब्बे दिखाई देते हैं। जब संक्रमण ज़्यादा हो जाता है तब ये धब्बे मिलकर पत्तियों को सूखा देते हैं और बालियां पूरी तरह से बाहर नहीं निकल पाती हैं।

प्रबंधन: रोग की रोकथाम के लिए प्रति किलो बीज को 5 ग्राम थीरम से उपचारित करने के बाद ही बुवाई करें। अगर रोग के लक्षण दिख रहे हैं, तो 25 फीसदी मैंकोजेब का छिड़काव करें। नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश उर्वरकों का संतुलित मात्रा में इस्तेमाल करें।

आभासी कंड रोग
इस रोग का ज़्यादा असर अगस्त-सितंबर में नज़र आने लगता है। बालियां निकलने के बाद ही रोग के लक्षण साफतौर पर दिखते हैं। रोगग्रस्त दाने पीले या नारंगी रंग के हो जाते हैं और बाद में ये काले रंग के गोले बन जाते हैं।

प्रबंधन: रोग से संक्रमित पौधों को बहुत सावधानी से निकालकर जला दें। रोगग्रस्त इलाके में फूल निकलने के दौरान 3 प्रतिशत कॉपर ऑक्सीक्लोराइड और 50 प्रतिशत एसपी का छिड़काव करें।

धान की खेती paddy farming 2

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धान में लगने वाले प्रमुख कीट और प्रबंधन

हरा फुदका और भूरा फुदका: हरा फुदका कीट शिशु और व्यस्क दोनों ही अवस्था में पत्तियों से रस चूसकर उसे नुकसान पहुंचाते हैं। इस कीट से ग्रसित होने पर पत्तियां पहले पीली और बाद में कत्थई रंग में बदल जाती हैं, इसके बाद नोंक से नीचे की तरफ सूखने लगती हैं। भूरा फुदका कीट भी शिशु और व्यस्क दोनों ही अवस्था में पत्तियों और कलियों के बीच से रस चूसकर पौधों को क्षति पहुंचाते हैं। इस कीट के असर से शुरुआत में पौधे गोलाई में काले होकर सूखने लगते हैं जिसे ‘हॉपर बर्न’ कहते हैं

प्रबंधन: इन कीटों को नियंत्रित करने के लिए नीचे बताए गए किसी भी केमिकल का छिड़काव किया जा सकता है।
– एसिटामिप्रिड 20 प्रतिशत एस.पी 50-60 ग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से।
– कार्बोफ्यूरान 3 जी 20 किलो 3-5 सें.मी. स्थिर पानी में प्रति हेक्टेयर के हिसाब से।
– फिप्रोनिल 0.3 जी 20 किलो 3-5 सें.मी. स्थिर पानी में प्रति हेक्टेयर के हिसाब से।
– इमिडाक्लोप्रिड 17.8 प्रतिशत एस.एल. 125 मि.ली. प्रति हेक्टेयर की दर से।
– मोनोक्रोटोफोस 36 प्रतिशत एस.एल 750 मि.ली. प्रति हेक्टेयर की दर से।

तनाछेदक और गुलाब तनाबेधक: इस कीट की सूंडी अवस्था बहुत खतरनाक होती है। इसमें सूंडिया या कटवर्म पत्तियों को छेदकर अंदर घुस जाती हैं और अंदर ही अंदर तने को खाती हुई गांठ तक पहुंच जाती हैं। इस कीट का असर अगर पौधों के विकास की अवस्था में होता है तो फसल में बालियां नहीं निकल पाती हैं और बाली निकलने के बाद इसके असर से वो सूखकर सफेद पड़ जाती हैं और दाने नहीं बन पाते।

प्रबंधन:
– रोपाई के समय पौधे के ऊपरी भाग को थोड़ा सा काटकर कहा दें, जिससे इसमें मौजूद तनाछेदक के अंडे खत्म हो जाएं।
– जिंक सल्फेट और बुझा हुआ चूना (100 ग्राम और 50 ग्राम) प्रति नाली के हिसाब से 15-20 लीटर पानी में घोलकर छिड़कें, अगर बुझा हुआ चूना न मिले तो उसकी जगह 2 प्रतिशत यूरिया का घोल इस्तेमाल करें।
– अंडा परजीवी ट्राइकार्ड (ट्राइकोग्राम जपोनिकम) 2000 अंडे प्रति नाली का इस्तेमाल कीट का प्रकोप शुरू होने पर तकरीबन 6 बार इस्तेमाल करें।
– 5 फीसदी सूखी बालियां दिखने पर केल्डान 4 जी या पडान 4 जी दवा को 400 ग्राम प्रति नाली के हिसाब से इस्तेमाल करें।

कुरमुला कीट
ये कीट धान के पौधों की जड़ों को खा जाते हैं, जिससे पौधे पीले पड़कर बाद में सूख जाते हैं। संक्रमित पौधों को पकड़कर खींचने पर वो आसानी से उखड़ जाते हैं। इस कीट के प्रकोप  का सबसे ज्यादा जुलाई-अगस्त में दिखाई पड़ता है।

प्रबंधन:
– खेतों में सड़ी हुई गोबर की खाद का इस्तेमाल करें।
– फसल काटने के बाद खेतों की गहरी जुताई करके छोड़ दें।
– खड़ी फसल में क्लोरपायरीफॉस 20 ई.सी. की 80 मिली लीटर मात्रा को एक किलो सूखी बालू प्रति राख में मिलाकर मिट्टी के ऊपर छिड़क दें।

धान की अच्छी फसल के लिए विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि हमेशा बीजों को उपचारित करने के बाद ही बुवाई करें, इससे फसल में कीटों और बीमारियों की संभावना कम हो जाती है, इसके  साथ ही मिट्टी की गुणवत्ता के मुताबिक ही अच्छे और उन्नत किस्म के बीजों का चुनाव करना चाहिए। धान नर्सरी में बुवाई के करीब 10-15 दिन के अंतराल पर कीटनाशक और फफूंदीनाशक का छिड़काव करें। इसकी जगह किसान नीम की पत्तियों का घोल बनाकर भी फसल पर छिड़काव कर सकते हैं।

ये भी पढ़ें: धान की खेती में नुकसान उठा रहे किसानों के लिए क्या हैं उन्नत विकल्प? जानिए ICAR-ATARI डायरेक्टर डॉ. यूएस गौतम से

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