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भारत में हर तीन में से एक गोवंश पालक (cattle breeder) के लिए दूध बेचना (Selling milk) मुख्य लक्ष्य नहीं है। वे गाय-भैंसों को गोबर, खेत की शक्ति और सामाजिक सुरक्षा के लिए पालते हैं। ये चौंकाने वाला फैक्ट सामने आया है Council on Energy, Environment and Water (CEEW Study) के एक नए स्टडी में। इस स्टडी में देश के 15 राज्यों के 7,300 से ज़्यादा पशुपालक परिवारों का सर्वे किया गया, जो देश की कुल गोवंश आबादी (गाय, भैंस, बैल, बैलों) का 91 फीसदी की नुमाइंदगी करते हैं।
दूध नहीं, इन चीजों के लिए पालते हैं पशु
CEEW की रिपोर्ट ‘Cattle and Community in a Changing Climate’ के अनुसार, 7 फीसदी पालक केवल गैर-दुग्ध उद्देश्यों जैसे गोबर, खेत में काम करवाने या जानवर बेचने के लिए पशु रखते हैं। पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में यह आंकड़ा 15 प्रतिशत तक पहुंच जाता है। लगभग 74 फीसदी पालक गोबर को खाद, ईंधन या बिक्री के लिए अहमियत देते हैं। झारखंड, पश्चिम बंगाल और हिमाचल प्रदेश में तो आधे से अधिक पालक दूध बेचने से ज्यादा घरेलू उपभोग और गोबर के उपयोग को प्राथमिकता देते हैं।
नीतियों और ज़मीनी हकीकत का अंतर
CEEW के फेलो और निदेशक अभिषेक जैन कहते हैं, ‘भारत की डेयरी नीतियां खास तौर से मिल्क प्रोडक्शन पर बेस्ड हैं, जबकि ज़मीन पर पशुपालन एक व्यापक जीविका प्रणाली (Comprehensive livelihood system) है। हर राज्य और किसान के Reference, चुनौतियां और प्रेरणाएं अलग हैं। सार्वजनिक निवेश को इस डायवर्सिटी के अनुरूप ढालने के लिए एकसमान रणनीतियों से हटकर, Differentiated policies बनानी होंगी।
सबसे बड़ी चुनौती: चारे की कमी
स्टडी में सामने आया कि चारे और घास की कमी सबसे व्यापक समस्या है। चार पालकों में से तीन इससे जूझ रहे हैं। चरागाहों का सिकुड़ना और चारा उगाने की सीमित ज़मीन इस समस्या को और गहरा रही है। हैरानी की बात ये है कि 80 फीसदी पशु पालक सिलेज बनाने और संतुलित राशन (Silage making and balanced rations) जैसी सरकारी योजनाओं से अनजान हैं और केवल 5 फीसदी ने इन्हें अपनाया है।
जलवायु परिवर्तन का बढ़ता दबाव
जलवायु परिवर्तन (Climate change) ने संकट और बढ़ा दिया है। 54 फीसदी भैंस पालक, 50 फीसदी संकर नस्ल पालक और 41प्रतिशत देसी नस्ल पालक ने जलवायु से जुड़े प्रभावों की सूचना दी। इनमें पशुओं में बीमारियों की बढ़ती घटनाएं, मृत्यु दर और गर्मी से तनाव शामिल हैं। हालांकि देसी नस्ल के पशु जलवायु परिवर्तन (Animal climate change) के प्रति सबसे ज्यादा सहनशील हैं, लेकिन कई पालक अधिक उपज वाली संकर नस्लों की तरफ बढ़ रहे हैं, जो भविष्य में जोखिम बढ़ा सकता है।
छोटे पालक, बड़ी भूमिका
देश के आधे ग्रामीण पशुपालकों के पास सिर्फ एक या दो पशु हैं। ये छोटे झुंड पहाड़ी, मध्य और पूर्वी क्षेत्रों में केंद्रित (Small herds are concentrated in the hilly, central and eastern regions) हैं। हालांकि ये आधे पालक हैं, लेकिन कुल दूध उत्पादन में इनका हिस्सा केवल 29 फीसदी और दूध की बिक्री में 22 प्रतिशत है। बाज़ार के लिए अतिरिक्त दूध का उत्पादन मीडियम और बड़े झुंडों से ही होता है।
भविष्य की राह: जलवायु अनुकूलन के लिए, ब्रीडिंग और टीकाकरण
CEEW की प्रोग्राम एसोसिएट रुचिरा गोयल का कहना है, ‘चारे की कमी की समस्या हर जगह है। इसे मज़बूत विस्तार सेवाओं और बेहतर चारा आपूर्ति श्रृंखलाओं (Fodder supply chains) के ज़रिए हल किया जा सकता है। जलवायु अनुकूलन के लिए, ब्रीडिंग और टीकाकरण के बजट को लोकल लेवल पर चारा समाधानों के लिए भी बढ़ाना होगा।
CEEW सिफारिश करता है कि राष्ट्रीय पशुधन मिशन (National Livestock Mission) जैसी स्कीम को पालकों के प्रकार और क्षेत्रीय संदर्भ के अनुरूप ढाला जाए। अंतिम छोर (dead ends) तक पशु चिकित्सा सेवाएं पहुंचाना, गोबर-आधारित ऊर्जा (Cow dung-based energy) और खाद जैसे गैर-दुग्ध मूल्य श्रृंखलाओं (Non-dairy value chains) को बढ़ावा देना और जलवायु जोखिमों को पशु आवास और प्रजनन विकल्पों (Animal housing and breeding options) में शामिल करना फ्यूचर के लिए ज़रूरी कदम हैं।
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