2.5 एकड़ में बटन मशरूम का उत्पादन करने वाले किसान संजय राजपूत करते हैं समूह में खेती, जानिए इसके फायदे

दिल्ली का नाम सुनते हैं सबसे पहली छवी जो दिमाग में आती है वो है संसद भवन, राष्ट्रपति भवन और […]

बटन मशरूम का उत्पादन

दिल्ली का नाम सुनते हैं सबसे पहली छवी जो दिमाग में आती है वो है संसद भवन, राष्ट्रपति भवन और इंडिया गेट की और हम इसे राजनीति का गढ़ मानते हैं, मगर इसी दिल्ली में क्या आप जानते हैं लाखों एकड़ में खेती भी हो रही है। खास बात ये है कि यहां के बहुत से किसान पारंपरिक खेती से हटकर एक बिज़नेस की तरह खेती को कर रहे हैं और वो समूह बनाकर खेती कर रहे हैं। समूह में खेती करने वाले एक ऐसे ही प्रगतिशील किसान हैं तिगीपुर गांव के संजय राजपूत। जो 1999 से बटन मशरूम का उत्पादन कर रहे हैं। खुद कंपोस्ट बनाकर वो 2.5 एकड़ खेत में झोपड़ी बनाकर बटन मशरूम उगाते हैं। उन्होंने मशरूम उत्पादन की अपनी तकनीक और समूह में खेती के फ़ायदों के बारे में विस्तार से चर्चा की किसान ऑफ़ इंडिया के संवाददात सर्वेश बुंदेली के साथ।

26 सालों से कर रहे हैं मशरूम का उत्पादन

संजय राजपूत बताते हैं कि वैसे तो वो बचपन से ही खेती कर रहे हैं, मगर बीच में 4 साल उन्होंने कंप्यूटर इंजीयनिर की नौकरी भी की, मगर उसमें मन नहीं लगा तो खेती में ही लौट आए। वो अपने खेत में धान, गेहूं, ब्रोकोली, गोभी, मूली जैसी बहुत सी फसलों का उत्पादन करते हैं। जबकि मशरूम का उत्पादन उन्होंने 1999 से शुरू किया। वो सीजन वाले बटन मशरूम का उत्पादन करते हैं। उन्होंने शुरुआत तो एक-दो झोपड़ी बनाकर ही की थी, मगर आज वो 2.5 एकड़ में मशरूम उगा रहे हैं।

सिंतबर से बनने लगती हैं झोपड़ियां

संजय कहते हैं कि दूसरी फसलों की कटाई के बाद सितंबर से ही उनके खेत में मशरूम उत्पादन की तैयारियां होने लगती हैं। इसके लिए झोपड़ी बनाई जाती है और एक तरफ कंपोस्ट बनाने का काम भी शुरू हो जाता है। मशरूम उत्पादन के लिए सबसे पहले कंपोस्ट तैयार करना पड़ता है जिसमें 25 से 28 दिन लगते हैं। आगे वो बताते हैं कि कंपोस्ट तैयार होने के बाद उसे झोपड़ी में तैयार बेड पर डाला जाता है, फिर उस पर स्पॉन (मशरूम के बीज) डालते हैं, स्पॉन डालने के बाद जब इसमें फंगस का विकास होगा तो इस पर केसिंग (मिट्टी की पतली परत) की जाती है। केसिंग करने के करीब 15-20 दिन बाद मशरूम का उत्पादन शुरू हो जाता है।

कैसे बनाएं सही कंपोस्ट?

मशरूम उत्पादन के लिए कंपोस्ट बनाना बहुत कठिन काम होता है, क्योंकि कंपोस्ट अगर सही नहीं बना, तो पूरी फसल खराब हो सकती है। संजय बताते हैं कि सही कंपोस्ट बनाने के लिए मुर्गी की खाद, यूरिया, अमोनियम सल्फेट, सिंगल सुपर फॉस्फेट, पोटाश और चोकर का इस्तेमाल किया जाता है। इन सबको भूसे में मिलाने से पहले भूसे को को पहले भिगोया जाता है, फिर 10 बार इसकी पलटी की जाती है। जहां तक बाकी चीज़ों की मात्रा का सवाल है तो संजय बताते हैं कि भूसे में 50 प्रतिशत मुर्गी की खाद, 6-7 प्रतिशत चोकर, 2 प्रतिशत यूरिया, 1.5 प्रतिशत अमोनियम सल्फेट, 1 प्रतिशत सिंगल सुपर फॉस्फेट, 1 प्रतिशत पोटाश मिलाकर परफेक्ट खाद तैयार की जा सकती है। वो बताते हैं कि झोपड़ी तैयार करने से लेकर मशरूम उत्पादन तक में करीब 35 से 40 दिन का समय लगता है। केसिंग के 15 दिन बाद उत्पादन मिलने लगता है।

अच्छा स्पॉन है ज़रूरी

मशरूम उत्पादन की सफ़लता स्पॉन की गुणवत्ता पर निर्भर करती है। संजय राजपूत का कहना है कि किसानों को खुद ही पता लगाना होगा कि अच्छा स्पॉन कहां पर मिलता है। वो खुद अलग-अलग लैब से स्पॉन मंगाते हैं, क्योंकि उनका मानना है कि अगर कभी किसी एक लैब का स्पॉन खऱाब निकला तो दूसरे का तो ठीक होगा। अगर सिर्फ खराब स्पॉन ही इस्तेमाल करें तो पूरी फसल खराब हो जाएगी, लेकिन अलग-अलग स्पॉन इस्तेमाल करके इस नुकसान से बचा जा सकता है। वो बताते हैं कि 1 क्विंटल कंपोस्ट में 1 किलो स्पॉन डाला जाता है।

क्या-क्या सावधानी रखनी चाहिए?

मशरूम की खेती में साफ़-सफ़ाई का बहुत ध्यान रखना पड़ता है, वरना फंगस पूरी फसल को बर्बाद कर सकता है। संजय कहते हैं पहसे से सावधानी रखनी चाहिए और कंपोस्ट तैयार करने और झोपड़ी में भी साफ़-सफ़ाई का खास ध्यान रखने की ज़रूरत है, क्योंकि फंगस से सिर्फ बचाव किया जा सकता है, एक बार फंगस लग गया तो इसका कोई इलाज़ नहीं है, पूरी फसल खराब हो सकती है।

सीधे भेजते हैं फै़क्ट्री

संजय राजपूत के लिए मार्केटिंग की कोई समस्या नहीं है। वो कहते हैं कि एशिया की सबसे बड़ी सब्ज़ी मंडी आज़ादपुर मंडी उनके खेत से सिर्फ 12 किलोमीटर की दूरी पर ही है, मगर पिछले 7-8 सालों से वो अपने उत्पादन मंडी में बेचन की बजाय सीधे फै़क्ट्री में भेजते हैं। इसका फ़ायदा ये होता है कि उन्हें तय कीमत मिलती है, एक तरह से बोल सकते हैं कि वो कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग कर रहे हैं।

समूह में खेती का फ़ायदा

संजय राजपूत मशरूम का उत्पादन अकेले नहीं कर रहे हैं और न ही वो फै़क्ट्री में सिर्फ अपना उत्पादन भेज रहे हैं, बल्कि कुछ किसान समूह बनाकर खेती कर रहे हैं जिससे ये फ़ायदा होता है कि फैक्ट्री को एक साथ बड़ी मात्रा में उत्पादन दे पाते हैं और जितनी ज़्यादा मात्रा में फसल देंगे उतना ही उनका दबदबा रहेगा। अकेले किसान को कोई भी दबा सकता है, मगर जब किसान समूह में काम करते हैं तो उनके हितों की रक्षा होती है और वो अपनी बात सामने वाले से मनवा सकते हैं। संजय कहते हैं कि फै़क्ट्री वाला भी 100 क्विंटल फसल देने वाले किसान की नहीं, बल्कि 1000 क्विंटल देने वाले किसान की बात सुनेगा, इसलिए समूह में खेती करना फायदेमंद होता है। इसके साथ ही अगर कोई एक किसान खाद, बीज लेने बाहर जा रहा है, तो वो बाकियों के लिए भी ले आता है।

30 लोगों को दिया है रोज़गार

संजय राजपूत खेती को एक बिज़नेस की तरह चला रहे हैं तभी तो उन्होंने 25-30 लोगों को रोज़गार भी दिया हुआ है। उनके खेत में सितंबर से अप्रैल तक मशरूम की खेती होती है। उसके बाद झोपड़ी हटाकर दूसरी फसलों का उत्पादन करते हैं।

किन समस्याओं का कर रहे हैं सामना?

संजय राजपूत कहते हैं कि दिल्ली में खेती करने में उन्हें सबसे बड़ी दिक्कत ये है कि उन्हें वहां खाद, बीज, दवाईयां कुछ नहीं मिलती है। किसी भी चीज़ के लिए हरियाणा जाना पड़ता है। यही नहीं दिल्ली में ट्रैक्टर की कोई एजेंसी भी नहीं है। अगर किसी किसान को ट्रैक्टर लेना हो तो हरियाणा जाना होगा और वहां रहने वाले अपने किसी रिश्तेदार के नाम से ट्रैक्टर लेना होता है। वो कहते है कि ये समस्या इसलिए है, क्योंकि सरकार ये मानती ही नहीं है कि दिल्ली में भी किसान हैं, जबकि यहां लाखों एकड़ में खेती हो रही है।

बिना जानकारी के न करें मशरूम की खेती

मशरूम की खेती में लागत बहुत अधिक आती है। इसलिए संजय राजपूत का कहना है कि जो कोई भी मशरूम की खेती करना चाहता है, पहले इसकी पूरी जानकारी जुटा ले, उसके बाद ही शुरू करे, क्योंकि इसमें लागत बहुत अधिक आती है, तो ज़रा सी भी चूक होने पर खर्चा भी नहीं निकल पाएगा। एक एकड़ में खेती करने में कम से कम 30 लाख की लागत आती है। साथ ही उनका कहना है कि पहले छोटे पैमाने पर ही शुरुआत करनी चाहिए, उन्होंने खुद 1-2 झोपड़ी से ही शुरुआत की थी। वो किसानों को सलाह देते हैं कि खेती से मुनाफ़ा कमाना है तो इसे बिज़नेस की तरह करो, क्योंकि पारंपरिक खेती में कोई फायदा नहीं है। उन्हें खुद धान की खेती में नुकसान हो रहा है।

कैसे बढ़ती है मशरूम की सेल्फ़ लाइफ़?

मशरूम की खेती करने वाले किसानों के सामने एक समस्या इसे जल्दी बेचने की भी होती है, क्योंकि इसकी सेल्फ़ लाइफ़ 2-3 दिन होती है, मगर संजय राजपूत के सामने ये समस्या नहीं है। वो बताते हैं कि वो मशरूम फैक्ट्री में देते हैं जहां उसे कैन में पैक किया जाता है, जिससे वो साल भर तक खराब नहीं होते हैं।

सम्पर्क सूत्र: किसान साथी यदि खेती-किसानी से जुड़ी जानकारी या अनुभव हमारे साथ साझा करना चाहें तो हमें फ़ोन नम्बर 9599273766 पर कॉल करके या kisanofindia.mail@gmail.com पर ईमेल लिखकर या फिर अपनी बात को रिकॉर्ड करके हमें भेज सकते हैं। किसान ऑफ़ इंडिया के ज़रिये हम आपकी बात लोगों तक पहुँचाएँगे, क्योंकि हम मानते हैं कि किसान उन्नत तो देश ख़ुशहाल।

इसे भी पढ़िए: Climate Crisis: भारत का किसान प्रकृति के प्रकोप के सामने क्यों हार रहा? बाढ़, सूखा और बादल फटना बना नई ख़तरनाक ‘सामान्य’ स्थिति

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top