एवोकाडो की खेती: भारत में पोषण, बाजार और किसानों की आय बढ़ाने वाली एक उभरती फसल

एवोकाडो (Persea americana) वर्तमान में विश्व की सबसे तेजी से लोकप्रिय होती फल फसलों में शामिल है। इसे विशेषज्ञ “सुपरफूड” […]

एवोकैडो की खेती

एवोकाडो (Persea americana) वर्तमान में विश्व की सबसे तेजी से लोकप्रिय होती फल फसलों में शामिल है। इसे विशेषज्ञ “सुपरफूड” की श्रेणी में रखते हैं। किसान ऑफ इंडिया के लाइव प्रोग्रम में इस बार के मेहमान हैं अहमदाबाद के सुनील कुमार। सुनील कुमार पेड़ों की नर्सरी चलाते हैं। उनका यहां कई तरह की पेड़ों की वैरायटी पाई जाती है।  हम सुनील कुमार से एवोकाडो पेड़ की खेती के बारे में चर्चा करेंगे। किसान साथियों आइए जानते हैं उनका अनुभव इस पेड़ को लेकर कैसा रहा है। सुनील कहते हैं कि यह एक विदेशी पौधा है, लेकिन कुछ वर्षों से इसकी खेती भारत में भी होने लगी है।

एवोकाडो की खेती किन-किन जगहों पर हो सकती है?

एवोकाडो (Persea americana)  मूल रूप से मध्य अमेरिका, विशेषकर मैक्सिको से उत्पन्न यह फल आज अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, चिली, पेरू, केन्या और न्यूजीलैंड जैसे देशों की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है। भारत में भी बदलती जीवनशैली, स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता और होटल-रेस्तरां उद्योग के विस्तार के कारण एवोकाडो की मांग निरंतर बढ़ रही है, जिससे इसकी खेती किसानों के लिए एक नए अवसर के रूप में सामने आई है। कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, सिक्किम, मेघालय, मध्यप्रदेश, गुजरात और हिमाचल प्रदेश के मध्यम ऊँचाई वाले इलाके एवोकाडो उत्पादन के लिए अनुकूल पाए गए हैं।

एवोकाडो की खेती की कैसे करें  शुरुआत?

किसान शुरुआत के तौर पर 100 पेड़ से ट्राई कर सकते हैं। इसके साथ ही किसान इस पेड़ की खेती  भरोसा कर  रहे हैं। दोमट, काली और चिकनी मिट्टी होना चाहिए। इस पौधे की  खेती के लिए रेतीली मिट्टी  का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। जलवायु एवोकाडो की खेती में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह फल उष्णकटिबंधीय से उपोष्णकटिबंधीय जलवायु में अच्छी तरह विकसित होता है। ये पौधा 15 डिग्री से 45 डिग्री के तापमान में आसानी से लग सकता है। इसकी खेती करना आसान होता है।

एवोकाडो की कौनसी किस्म भारतीय किसान के लिए बेहतर?

एवोकाडो की उन्नत किस्मों का चयन उत्पादन और बाजार मूल्य दोनों को प्रभावित करता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ‘हैस’ किस्म सबसे अधिक लोकप्रिय है, क्योंकि इसका स्वाद, आकार और शेल्फ लाइफ बेहतर होती है। इसके अलावा ‘फुएर्ते’, ‘बेकन’, ‘पिंकर्टन’ और ‘रीड’ जैसी किस्में भी अच्छे उत्पादन के लिए जानी जाती हैं। भारतीय परिस्थितियों में ग्रीन एवोकाडो  ग्राफ्टेड पौधों से खेती करने पर जल्दी फलन और अधिक उत्पादन प्राप्त होता है, जिससे किसानों को बेहतर आर्थिक लाभ मिलता है।

एवोकाडो की खेती करते समय किन बातों का ध्यान रखें?

अत्यधिक ठंड, पाला या बहुत अधिक गर्मी पौधों और फलन को नुकसान पहुँचा सकती है। पर्याप्त वर्षा या नियंत्रित सिंचाई आवश्यक होती है, जबकि तेज़ हवाओं से बचाव के लिए विंड ब्रेक का उपयोग लाभकारी रहता है। मिट्टी की गुणवत्ता एवोकाडो की खेती की सफलता का एक प्रमुख कारक है। यह फसल अच्छी जल निकासी वाली दोमट या बलुई दोमट मिट्टी में बेहतर उत्पादन देती है। मिट्टी का pH मान 5.5 से 7.0 के बीच होना चाहिए। जलभराव वाली भूमि में इसकी खेती नहीं करनी चाहिए, क्योंकि इससे जड़ सड़न जैसी गंभीर समस्या उत्पन्न हो सकती है। विशेषज्ञों के अनुसार खेत में उचित ड्रेनेज व्यवस्था और ऊँची क्यारियों का निर्माण पौधों को स्वस्थ रखने में सहायक होता है। रोपण के लिए मानसून का समय सबसे उपयुक्त माना जाता है, क्योंकि इस दौरान मिट्टी में पर्याप्त नमी रहती है। एक हेक्टेयर क्षेत्र में लगभग 200 से 300  पौधे लगाए जा सकते हैं। रोपण से पहले गड्ढों में गोबर की सड़ी खाद और उपजाऊ मिट्टी मिलाने से पौधों की प्रारंभिक वृद्धि बेहतर होती है। वैज्ञानिक सलाह के अनुसार संतुलित पोषण प्रबंधन से पौधों की वृद्धि और फलन में उल्लेखनीय सुधार देखा गया है।

कैसे करें सिंचाई किन योजनाओं के लिए मिलेगा लाभ?

सिंचाई  एवोकाडो की खेती का एक महत्वपूर्ण  हिस्सा है। अत्यधिक सिंचाई से जड़ सड़न की समस्या उत्पन्न हो सकती है, जबकि कम पानी से पौधों की वृद्धि रुक जाती है। इस कारण ड्रिप सिंचाई प्रणाली को सबसे उपयुक्त माना जाता है, जिससे पानी की बचत के साथ-साथ नमी का संतुलन बना रहता है। गर्मियों में 7 से 10 दिन के अंतराल पर सिंचाई पर्याप्त मानी जाती है।

कीटऔर रोग प्रबंधन कैसे करें?

कीट एवं रोग प्रबंधन के लिए एकीकृत कीट प्रबंधन प्रणाली अपनाना आवश्यक है। जड़ सड़न, थ्रिप्स और फंगल रोग एवोकाडो की प्रमुख समस्याएँ हैं। रोग-मुक्त पौध सामग्री का चयन, अच्छी जल निकासी, जैविक फफूंदनाशकों का उपयोग और समय-समय पर निगरानी से इन समस्याओं को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। किसान भाई जीवामृत का भी इस्तेमाल कर सकते हैं।

कितने दिन में किसान को मिलने लगती है फसल?

एवोकाडो के पौधे सामान्यतः 3 से 4 वर्ष में फल देना शुरू कर देते हैं, जबकि 6 से 7 वर्ष में पूर्ण उत्पादन प्राप्त होता है। एक हेक्टेयर क्षेत्र से औसतन 8 से 12 टन फल का उत्पादन संभव है। वर्तमान बाजार दरों के अनुसार एवोकैडो का थोक मूल्य 200 से 400 रुपये प्रति किलो तक रहता है। इस आधार पर किसान एक हेक्टेयर से सालाना 8 से 12 लाख रुपये तक की आय अर्जित कर सकते हैं, जो पारंपरिक फसलों की तुलना में कहीं अधिक है। इसकी खेती में लगभग डेढ़ से दो लाख रुपए तक खर्चा आ जाता है। एक प्लांट 550 रुपए का आता है। 1000 से 1200 रुपए प्रति किलो की दर से इसका रेट मिल जाता है। ये 30 से 40  साल तक की लंबी अवधी की फसल है।

स्वास्थ्य के लिए कितना लाभकारी?

एवोकाडो का सेवन पोषण के दृष्टिकोण से एवोकाडो एक अत्यंत समृद्ध फल है। इसमें पाए जाने वाले मोनोअनसेचुरेटेड फैटी एसिड हृदय स्वास्थ्य के लिए लाभकारी माने जाते हैं और खराब कोलेस्ट्रॉल को कम करने में सहायक होते हैं एवोकाडो का सेवन मधुमेह, मोटापा, उच्च रक्तचाप और त्वचा संबंधी समस्याओं में सहायक होता है। यही कारण है कि शहरी उपभोक्ताओं, फिटनेस प्रेमियों और हेल्थ इंडस्ट्री में इसकी मांग लगातार बढ़ रही है।

सम्पर्क सूत्र: किसान साथी यदि खेती-किसानी से जुड़ी जानकारी या अनुभव हमारे साथ साझा करना चाहें तो हमें फ़ोन नम्बर 9599273766 पर कॉल करके या kisanofindia.mail@gmail.com पर ईमेल लिखकर या फिर अपनी बात को रिकॉर्ड करके हमें भेज सकते हैं। किसान ऑफ़ इंडिया के ज़रिये हम आपकी बात लोगों तक पहुँचाएँगे, क्योंकि हम मानते हैं कि किसान उन्नत तो देश ख़ुशहाल।

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