Padma Shri Awards 2026: गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर घोषित पद्म पुरस्कारों ने एक बार फिर उन व्यक्तित्वों को राष्ट्रीय मंच पर सम्मानित किया है, जिनका योगदान सुर्खियों से दूर रहकर देश की नींव मजबूत करता रहा। इस वर्ष कृषि अनुसंधान और विज्ञान के क्षेत्र से जुड़े जिन नामों को सम्मान मिला है, उन्होंने प्रयोगशालाओं, खेतों और शोध संस्थानों में दशकों तक काम कर भारत की खाद्य सुरक्षा, जैव विविधता, किसान आय और पशुपालन व्यवस्था को नई दिशा दी। धान की जीनोम-संपादित किस्मों से लेकर पारंपरिक बीज संरक्षण, नकदी फसलों के विस्तार और पशु चिकित्सा में नवाचार तक—इन वैज्ञानिकों का कार्य भारतीय कृषि और स्वास्थ्य व्यवस्था में दीर्घकालिक बदलाव की कहानी कहता है। इस बार 5 कृषि वैज्ञानिकों को पद्म श्री सम्मान से सम्मानित किया गया।
पद्म श्री से सम्मानित होने वाले वैज्ञानिकों की कहानियां
अशोक कुमार सिंह (उत्तर प्रदेश)
भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI), पूसा के पूर्व निदेशक रहे डॉ. अशोक कुमार सिंह का योगदान भारतीय कृषि इतिहास में मील का पत्थर माना जाता है। उनके नेतृत्व और शोध के परिणामस्वरूप 25 से अधिक उच्च उपज वाली धान की किस्में विकसित हुईं, जिनसे किसानों की उत्पादकता और आय में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि भारत की पहली जीनोम-संपादित चावल किस्म के सह-विकास से जुड़ी है, जो बदलते जलवायु परिदृश्य में खाद्य सुरक्षा को मजबूत करती है। इसके साथ ही, उन्होंने धान की खेती से होने वाले मीथेन उत्सर्जन को कम करने वाली तकनीकों को बढ़ावा देकर कृषि को पर्यावरण के अनुकूल बनाने में भी अहम भूमिका निभाई। देश में बासमती धान अनुसंधान को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाने वाले कृषि वैज्ञानिक डॉ. अशोक कुमार सिंह को इस वर्ष पद्मश्री सम्मान के लिए चयनित किया गया है। उन्हें यह प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान कृषि विज्ञान के क्षेत्र में, विशेष रूप से बासमती धान की उन्नत किस्मों के विकास के माध्यम से किसानों की आय बढ़ाने और भारत की निर्यात क्षमता को सशक्त करने के लिए प्रदान किया जा रहा है।
डॉ. पी. एल. गौतम (हिमाचल प्रदेश)
भारत की जैविक विरासत के संरक्षण में डॉ. पी. एल. गौतम का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। उन्होंने नेशनल जीन बैंक को सशक्त और प्रभावी बनाते हुए देश में प्लांट जर्मप्लाज्म रजिस्ट्रेशन सिस्टम( Plant germplasm registration system) की नींव रखी। उनके प्रयासों से भारत की पारंपरिक और दुर्लभ फसल किस्मों का एक संगठित और सुरक्षित डेटाबेस तैयार हो सका। यह व्यवस्था न केवल जैव विविधता संरक्षण की दिशा में बड़ा कदम है, बल्कि भविष्य की पीढ़ियों के लिए बीज संपदा को सुरक्षित रखने का मजबूत आधार भी प्रदान करती है। बिलासपुर के बरठीं क्षेत्र के कंडयाना गांव के कृषि वैज्ञानिक प्रो. प्रेमलाल गौतम को देश के प्रतिष्ठित पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया जाएगा। कृषि विज्ञान के क्षेत्र में उनके दशकों लंबे नवाचारी और उल्लेखनीय योगदान के लिए केंद्र सरकार ने यह सम्मान देने की घोषणा की है। प्रो. गौतम ने फसलों की नई किस्मों के विकास, कृषि अनुसंधान, शिक्षा और संस्थागत निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उनके शोध कार्यों से देशभर के किसानों को प्रत्यक्ष लाभ मिला है। प्रो. गौतम ने पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय, सोलन कृषि विश्वविद्यालय, आईसीएआर तथा राष्ट्रीय स्तर के कई महत्वपूर्ण पदों पर रहते हुए कृषि अनुसंधान कार्यों को नई दिशा दी। वर्तमान में वह बिहार के समस्तीपुर स्थित सेंट्रल एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी, पूसा के चांसलर हैं।
डॉ. गोपाल जी त्रिवेदी (बिहार)
मुजफ्फरपुर के बंदरा प्रखंड के मतलुपुर गांव के एक मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मे डॉ. गोपालजी त्रिवेदी की जीवन यात्रा संघर्ष और असाधारण उपलब्धियों की एक अनूठी मिसाल है। उन्हें कृषि विज्ञान में उनके क्रांतिकारी योगदान के लिए पद्मश्री सम्मान से नवाजा जाना बिहार के लिए गौरव की बात है। राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय (RPCAU) के पूर्व कुलपति डॉ. गोपाल जी त्रिवेदी ने बिहार की कृषि को पारंपरिक सीमाओं से बाहर निकालकर आधुनिक सोच से जोड़ा। उन्होंने लीची के पुराने और कम उत्पादक बगीचों को ‘कैनोपी मैनेजमेंट’ तकनीक के माध्यम से फिर से लाभकारी बनाया। इसके अलावा, उन्होंने किसानों को धान-गेहूं की एकरूप खेती से हटाकर मखाना, सिंघाड़ा और शीतकालीन मक्का जैसी नकदी और वैकल्पिक फसलों की ओर प्रेरित किया, जिससे किसानों की आय में विविधता और स्थिरता आई।
डॉ. एन. पुन्नियमूर्ति (तमिलनाडु)
पशु चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में डॉ. एन. पुन्नियमूर्ति ने एंटीबायोटिक प्रतिरोध जैसी गंभीर वैश्विक चुनौती के समाधान की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य किया। उन्होंने थनैला (मैस्टाइटिस) और खुरपका-मुंहपका (FMD) जैसे सामान्य लेकिन नुकसानदेह पशु रोगों के लिए पारंपरिक और हर्बल उपचार पद्धतियाँ विकसित कीं। अब तक आठ लाख से अधिक गायों का उपचार उनके विकसित फॉर्मूलों से किया जा चुका है, जिससे न केवल पशुओं का स्वास्थ्य बेहतर हुआ, बल्कि दूध में एंटीबायोटिक अवशेषों की समस्या भी काफी हद तक कम हुई है।
डॉ. के. रामासामी पलानीस्वामी (तमिलनाडु)
जाने-माने कृषि वैज्ञानिक डॉ. के. रामासामी पलानीस्वामी जो प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देते हैं। उन्होंने कृषि बायोटेक्नोलॉजी, फर्टि-इरिगेशन और बायोगैस डेवलपमेंट की राष्ट्रीय नीति योजना में योगदान दिया और 30 से ज़्यादा रिसर्च प्रोजेक्ट्स का नेतृत्व किया।
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