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सोयाबीन किसान परेशान, मक्के की खेती में भी घाटा, नहीं मिल रहा MSP

किसान इस बात को लेकर परेशान हैं कि उनकी फसल तो अच्छी होती है, लेकिन सही दाम नहीं मिल पा रहा। बिचौलियों और व्यापारियों को फसल कम कीमत में बेचने पर मजबूर

सोयाबीन खरीफ़ मौसम की एक प्रमुख फसल और महत्वपूर्ण खाद्य स्रोत है। 2020 के खरीफ सीजन में 120 लाख हेक्टेयर में सोयाबीन की खेती हुई और पैदावार करीब 105 लाख टन रही। अकेले मध्य प्रदेश में सोयाबीन की सबसे ज़्यादा 50 से 55 प्रतिशत तक की फसल होती है।

सोयाबीन मानव पोषण एवं स्वास्थ्य के लिए एक बहुउपयोगी खाद्य पदार्थ है। सोयाबीन में 38-40 प्रतिशत प्रोटीन, 22 प्रतिशत तेल, 21 फ़ीसदी कार्बोहाइड्रेट की मात्रा होती है। प्रोटीन से भरपूर सोयाबीन से दूध, आटा, टोफू, सोया तेल, सोया सॉस, सोया चाप और सोयाबीन बड़ी समेत कई खाद्य उत्पाद तैयार किए जाते हैं।

कोरोना काल में प्रोटीनयुक्त खाद्य उत्पादों में सोयाबीन से बने उत्पादों की मांग में इज़ाफ़ा भी हुआ। इन उत्पादों की बाज़ार में कीमत भी काफ़ी अच्छी है। बाज़ार में जहां सोयाबीन के तेल की कीमत 150 से 200 रुपये प्रति किलो है, वहीं सोया मिल्क के एक लिटर दूध की बाज़ार में कीमत करीबन 150 रुपये है। उधर सोयाबीन से बने आटे की कीमत करीबन 150 से 350 रुपये प्रति किलो पड़ती है। लेकिन इन कीमतों का फायदा देश के किसानों को नहीं मिलता।

सोयाबीन की खेती पर मौसम की मार, घटता जा रहा मुनाफ़ा

भोपाल ज़िले के खजूरी सड़क गांव के किसान राकेश मेवाड़ा कई सालों से सोयाबीन की खेती कर रहे हैं। लेकिन पिछले चार-पांच साल से कभी मौसम की मार तो कभी कीटों के प्रकोप का सामना उन्हें करना पड़ रहा है। इस साल भी बारिश की अनियमितता के कारण फसल बर्बाद होने की नौबत आ गई है।

किसान ऑफ़ इंडिया से खास बातचीत में राकेश मेवाड़ा ने बताया कि लागत और आमदनी का फर्क बिल्कुल सिमट गया है। बता दें कि मौसम की मार के कारण भोपाल और आसपास के इलाकों में सोयाबीन की फसल 50 से 60 फ़ीसदी तक खराब हो चुकी है। यही हाल अन्य इलाकों का भी है।

किसान सह रहा सिस्टम की मार 

सोयाबीन की खेती में हो रहे लगातार नुकसान को देखते हुए राकेश मेवाड़ा ने मक्के की खेती करना भी शुरू कर दिया। अभी वो चार एकड़ की ज़मीन पर मक्के की खेती करते हैं। राकेश ने बताया कि मक्के की फसल काफी अच्छी आई है, लेकिन इस फसल से भी उन्हें वाजिब दाम नहीं मिलेंगे क्योंकि इसकी खरीद न्यूनतम समर्थन मूल्य पर होती ही नहीं। इस तरह से प्राकृतिक आपदा और प्रशासन के लचीलेपन की मार आखिरकार किसानों को ही झेलनी पड़ रही है।

किसान इस बात को लेकर परेशान है उसकी फसल तो अच्छी हुई, लेकिन उसे सही दाम नहीं मिल पा रहा। मंडी में सरकार मक्के की फसल को नहीं खरीद रही है। ऐसे में  किसान अपनी फसल बिचौलियों और व्यापारियों को कम कीमत में बेचने पर मजबूर है। सरकार ने मक्के की फसल का समर्थन मूल्य 1850 रुपये तय किया है, लेकिन रजिस्ट्रेशन ना होने की वजह से मंडियों में प्रशासन द्वारा मक्के की फसल की खरीद नहीं की जा रही है और किसान आधी कीमतों पर ही मक्के की फसल बेचने को मजबूर है।

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