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हिमाचली सेब का लुढ़का दाम, जानिए क्या हैं कारण?

सेब के बागवान हताश, नहीं मिल रहा लागत का भी पैसा

मंडियों में गिरते सेब के भाव से किसानों पर तो मार पड़ ही रही है साथ ही प्रदेश की अर्थव्यवस्था को भी नुकसान का अनुमान है।

हिमाचली सेब: सेब का नाम सुनते ही ज़ेहन में कश्मीर और हिमाचल प्रदेश के बागों की तस्वीर आने लगती है। यहां के सेब अपने स्वाद और पौष्टिकता के लिए दुनिया भर में मशहूर हैं। जहां जम्मू-कश्मीर में सबसे ज़्यादा 70 फ़ीसदी सेब का उत्पादन होता है, वहीं हिमाचल सेब उत्पादन के मामले में दूसरे नंबर पर है।

सेब के उत्पादन में हिमाचल प्रदेश की हिस्सेदारी 21.5 से 25 फ़ीसदी तक है। इसके बावजूद यहां के सेब बागवानों की हालत खराब है। उन्हें अपनी सेब की फसल का वाजिब दाम नहीं मिल रहा है। हिमाचल में सालाना करीबन 10 लाख मीट्रिक टन सेब का उत्पादन होता है। हिमाचली सेब राज्य की सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में मुख्य भूमिका निभाता है।

हिमाचल की GDP में सेब की हिस्सेदारी सात फ़ीसदी से ज़्यादा है। राज्य में एक लाख से अधिक परिवार सीधे तौर पर सेब की बागवानी से जुडे़ हैं। ऐसे में मंडियों में गिरते सेब के भाव से किसानों पर तो मार पड़ ही रही है साथ ही प्रदेश की अर्थव्यवस्था को भी नुकसान होने का अनुमान है।

सेब का बंपर उत्पादन फिर भी दाम कौड़ियों के भाव 

इस साल प्रदेश में सेब की फसल का उत्पादन तो अच्छा हुआ, बिक्री भी हो रही है, लेकिन मंडियों में दाम लुढ़क गया है। किसानों को अपनी लागत तक का भी पैसा नहीं मिल पा रहा। मंडियों में सेब किसानों को 28 से 30 किलो की सेब पेटी का दाम 1500 से 1800 रुपये मिल रहा है। इसी पेटी का दाम पहले 2000 से 3200 रुपये तक हुआ करता था।

वहीं 8 से 10 किलो सेब पेटी का दाम 800 से 1200 रुपये हो गया है। सिक्स लेयर की पेटी पर 450 रुपये खर्च कर रहे किसान को मंडी में 550 रुपये ही मिल रहे है। सेब की पेटी को बगीचे से मंडी तक पहुंचाने में खाली पेटी के 100 रुपये, पैकिंग के 50 रुपये, ढोने का 80 रुपये, खाद और सालाना रखरखाव में 100 रुपये का खर्च आ जाता है।

इस तरह से एक पेटी पर बस 100 रुपये की बचत हो रही है। किसानों की शिकायत है कि हर साल सेब उत्पादन का खर्च बढ़ रहा है लेकिन दाम घटते जा रहे हैं।

himachal apple farmers

सेब के दाम क्यों घटे

हिमाचल में सेब की 51 लाख पेटियां देश की विभिन्न मंडियों में पहुंच चुकी हैं। जबकि बीते साल अगस्त तक केवल 31 लाख सेब की पेटियां ही बाज़ार में पहुंची थी। प्रदेश में इस बार सेब का बंपर उत्पादन रहा, जिस वजह से एक साथ बाज़ार में अधिक सप्लाई होने के कारण इसे अच्छा भाव नहीं मिल पा रहा है। वहीं हिमाचल के कई इलाकों में हुई ओलावृष्टि से भी इसके दाम पर असर पड़ा है।

बाज़ार में सेब के दाम उसकी गुणवत्ता के आधार पर तय हो रहे हैं। ओलावृष्टि के कारण हल्के दाग वाला सेब बाज़ार में 400 रुपये से लेकर एक हजार रुपये तक की कीमत में बिक रहा है। ऐसे में कम दाम पर सेब मिलने के कारण अच्छे सेब पर भी इसका असर देखने को मिल रहा है।

सेब के घटते दाम पर गरमाई राजनीति

अब इस मसले को लेकर प्रदेश में सियासत भी गरमा गई है। भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत ने कहा कि सेब के दामों में आई गिरावट की वजह सेब की स्टोरेज है। टिकैत ने आरोप लगाया कि बागवानों से सस्ते सेब खरीद कर स्टोर करके दोगुने रेट पर आगे बेचे जाएंगे।

उधर सेब के गिरते दामों के खिलाफ़ प्रदर्शन के दौरान हिमाचल कांग्रेस अध्यक्ष कुलदीप सिंह राठौड़ ने कहा निजी क्षेत्र पर आरोप लगाया है कि उच्च क्वालिटी के सेबों के दाम 72 रुपए प्रति किलो तय किए हैं। इससे सेब बाज़ार को नुकसान पहुंचा है।

वहीं शहरी विकास मंत्री सुरेश भारद्वाज ने सेब कारोबार से जुड़े सभी महकमों की आपात बैठक बुलाकर अफ़सरों को फ़ील्ड में उतरने के निर्देश भी दिए हैं। साथ ही दाम गिरने की मुख्य वजह पर जांच करवाकर रिपोर्ट देने को कहा है।

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