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कभी मिथिलांचल के तालाबों तक सीमित रहने वाला मखाना आज दुनिया भर की थालियों में अपनी जगह बना चुका है। जिसे कभी स्थानीय फसल माना जाता था, वही मखाना अब भारत की पहचान बनकर अंतरराष्ट्रीय बाजारों में चमक रहा है। बिहार का यह सफेद सोना अब सिर्फ एक कृषि उत्पाद नहीं, बल्कि परंपरा, मेहनत और आत्मनिर्भर भारत की कहानी बन चुका है। भारत के 77वें गणतंत्र दिवस (Republic Day 2026 ) के अवसर पर 2026 में बिहार की झांकी इस संदेश को देश और दुनिया के सामने रखेगी।
किसानों की मेहनत से बना ब्रांड
इस वर्ष भारत पर्व में बिहार की झांकी का विषय रखा गया है मखाना: लोकल से ग्लोबल की थाली में सुपरफूड। बिहार का मखाना, जिसे प्यार से सफेद सोना भी कहा जाता है, आज केवल मिथिलांचल के तालाबों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पूरी दुनिया में एक सेहतमंद सुपरफूड के रूप में अपनी पहचान बना चुका है। मखाना को फॉक्स नट या कमल बीज भी कहा जाता है। यह मुख्य रूप से मिथिलांचल के तालाबों में पैदा होता है और पारंपरिक मेहनत व कौशल से तैयार किया जाता है। आज यही मखाना स्थानीय किसानों की मेहनत का प्रतीक बनकर अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों तक पहुंच चुका है। आज दुनिया में मखाने की कुल आपूर्ति का सबसे बड़ा हिस्सा भारत से जाता है, जिसमें बिहार की हिस्सेदारी लगभग 85 से 90 प्रतिशत है। साल 2022 में मिथिला मखाना को GI टैग मिलने से इसकी पहचान और मजबूत हुई। इससे न केवल गुणवत्ता को वैश्विक मान्यता मिली, बल्कि किसानों को बेहतर दाम और नए बाजार भी मिलने लगे।
Republic Day 2026 झांकी में क्या है ख़ास?
झांकी की बनावट में मखाना की पूरी यात्रा को दो हिस्सों में दिखाया गया है। पहले हिस्से में कमल के बड़े-बड़े पत्तों के बीच उभरा हुआ सफेद लावा मखाना नजर आता है। इसके साथ ही GI टैग का चिन्ह दिखाया गया है और चारों ओर मिथिला पेंटिंग की सुंदर बॉर्डर सजाई गई है, जो इस क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान को दर्शाती है। दूसरे हिस्से में मखाना तैयार होने की पूरी प्रक्रिया दिखाई गई है। इसमें तालाब से मखाना की कटाई, बीज इकट्ठा करना, छंटाई, भुनाई, फोड़ाई, पैकिंग और गुणवत्ता जांच तक के सभी चरण शामिल हैं। एक तरफ मिट्टी के चूल्हे पर लोहे की कढ़ाही में मखाना भूनती हुई महिला दिखाई गई है, वहीं दूसरी ओर लकड़ी के मूसल से मखाना फोड़ता हुआ पुरुष दिखाया गया है। यह दृश्य पारंपरिक मेहनत, महिलाओं की भागीदारी और स्थानीय कारीगरी को बेहद जीवंत और प्रभावशाली तरीके से सामने रखता है। इस झांकी से दर्शकों को पता लगेगा कि कैसे बिहार का पारंपरिक कृषि उत्पाद आज पोषण से भरपूर सुपरफूड के रुप में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा रहा है।
सरकार की पहल से नई उम्मीद
आपको बताते चलें कि भारत की केंद्र सरकार ने बजट 2025 -26 में मखाना की खेती को बढ़ावा देने के लिए बिहार में राष्ट्रीय मखाना बोर्ड की स्थापना की घोषणा की है। राष्ट्रीय मखाना बोर्ड के लिए लगभग 475 करोड़ रुपए के विकास पैकेज को मंजूरी दी गई है। इससे बीज सुधार, आधुनिक तकनीक, प्रसंस्करण और निर्यात को बढ़ावा मिलेगा।
मखाने की खेती कैसे की जाती है?
मखाने की खेती (Makhana cultivation) एक जलीय कृषि पद्धति है, जो विभिन्न जलाशयों और तालाबों में की जाती है। मखाने के लिए चिकनी दोमट मिट्टी आदर्श मानी जाती है, और जल स्तर 4-6 फीट तक होना चाहिए। मखाने की खेती के कई तरीके हैं, जिनमें तालाब विधि, सीधी बुवाई और रोपाई विधि प्रमुख हैं।
मखाने की उन्नत किस्में?
मखाने की उन्नत किस्में वे होती हैं जिनसे ज़्यादा उत्पादन मिलता है, दाने बड़े और चमकदार होते हैं और किसानों को अच्छा लाभ होता है। बिहार, खासकर मिथिलांचल क्षेत्र में विकसित और प्रचलित प्रमुख उन्नत किस्में इस प्रकार हैं स्वर्ण वैदेही, सुपर सेलेक्शन-1 ,सबौर मखाना-1 आदि। यह किस्म खास तौर पर उच्च उत्पादकता के लिए विकसित की गई है। इसके मखाने आकार में बड़े और वजन में हल्के होते हैं, जिससे बाजार में इनकी मांग अधिक रहती है।
भविष्य की ओर बढ़ता बिहार का मखाना
मखाना अब सिर्फ बिहार की पहचान नहीं, बल्कि भारत का सुपरफूड ब्रांड बन चुका है। बदलती जीवनशैली और स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता ने इसकी मांग को और तेज कर दिया है। गणतंत्र दिवस की झांकी के जरिए बिहार यह संदेश देगा कि स्थानीय मेहनत और पारंपरिक ज्ञान कैसे वैश्विक पहचान बना सकते हैं।तालाब से थाली तक की यह यात्रा सिर्फ मखाने की नहीं, बल्कि उन लाखों किसानों की कहानी है, जिनकी मेहनत ने बिहार के मखाने को दुनिया तक पहुंचाया है।
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