‘खाद आत्मनिर्भरता’ में बड़ी छलांग, नागपुर में देश पहला Indigenous Water-Soluble Fertilizer Pilot Plant लॉन्च हुआ

ये कोई सामान्य खाद प्लांट (Indigenous Water-Soluble Fertilizer Pilot Plant) नहीं है। ये भारतीय खदानों से निकलने वाले 'लो-टू-मीडियम ग्रेड' फॉस्फेट चट्टान (Rock Phosphate) से दुनिया की पहली इंटिग्रेटेड प्रोसेस का सफल प्रदर्शन है, जिसका टारगेट हर साल लगभग 120 मिलियन अमेरिकी डॉलर (करीब 1000 करोड़ रुपये) के खाद के आयात पर अंकुश लगाना है।

'खाद आत्मनिर्भरता' में बड़ी छलांग, नागपुर में देश पहला Indigenous Water-Soluble Fertilizer Pilot Plant लॉन्च हुआ

भारत की ‘आत्मनिर्भर खाद योजना’ ने एक ऐतिहासिक मोड़ ले लिया है। JNARDDC (Jawaharlal Nehru Aluminium Research Development and Design Centre) की टीम ने नागपुर (Nagpur) के बुटीबोरी में इशिता इंटरनेशनल के फेज-1 पायलट प्लांट (Ishita International’s Phase-1 pilot plant) का उद्घाटन किया, जो देश के लिए एक बड़ी तकनीकी और पर्यावरणीय जीत है। इस प्लांट (Indigenous Water-Soluble Fertilizer Pilot Plant) को जेएनएआरडीडीसी के निदेशक डॉ. अनुपम अग्निहोत्री ने हरी झंडी दिखाई।

ये कोई सामान्य खाद प्लांट (Indigenous Water-Soluble Fertilizer Pilot Plant) नहीं है। ये भारतीय खदानों से निकलने वाले ‘लो-टू-मीडियम ग्रेड’ फॉस्फेट चट्टान (Rock Phosphate) से दुनिया की पहली इंटिग्रेटेड प्रोसेस का सफल प्रदर्शन है, जिसका टारगेट हर साल लगभग 120 मिलियन अमेरिकी डॉलर (करीब 1000 करोड़ रुपये) के खाद के आयात पर अंकुश लगाना है।

क्या है इस परियोजना की ख़ास बात?  

1.100 फीसदी पानी में घुलनशील हाई क्वालिटी वाली खाद: अब तक भारत की फॉस्फेट चट्टानें इतनी उच्च गुणवत्ता की नहीं मानी जाती थीं कि उनसे सीधे कैल्शियम नाइट्रेट, फॉस्फोरिक एसिड, एमएपी (मोनो-अमोनियम फॉस्फेट) और एमकेपी (मोनो-पोटैशियम फॉस्फेट) जैसी शुद्ध और पूरी तरह से घुलनशील (Pure and completely soluble) खादें बनाई जा सकें। इस तकनीक ने ये असंभव काम संभव कर दिखाया है।

2.’हरित क्रांति’ की नई परिभाषा: दुनिया भर में फॉस्फोरिक एसिड बनाने की पारंपरिक ‘Wet process’ method में एक भारी समस्या है-  ‘फॉस्फो-जिप्सम’ नामक खतरनाक अपशिष्ट (A hazardous waste called ‘phospho-gypsum’)। ये Radioactive elements से युक्त होता है और पर्यावरण के लिए बड़ा ख़तरा है। भारत की इस नई टेक्नोलॉजी ने इस फॉस्फो-जिप्सम को लगभग पूरी तरह खत्म कर दिया है। ये अपने आप में एक ग्लोबल  सफलता है।

3.कचरे से सोना: इस प्रोसेस की सबसे बड़ी खूबी ये है कि इसमें बचने वाले पदार्थों (Process residue) को कचरा नहीं, बल्कि वैल्यू-एडेड इंडस्ट्रियल डेरिवेटिव (Valuable industrial products) में बदल दिया जाता है। यानी Valuable industrial products।

4.कार्बन उत्सर्जन में भारी कमी: इस Integrated mineral processing route से न सिर्फ कचरा कम हुआ है, बल्कि CO₂ उत्सर्जन भी परंपरागत तरीकों के मुकाबले काफी कम हुआ है। ये भारत के जलवायु लक्ष्यों में भी योगदान देगा।

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आगे का रोडमैप

अगले स्टेप में इस टेक्नोलॉजी को Commercial scale पर उतारा जाएगा। इससे भारत फॉस्फेट-आधारित खादों के मामले में विदेशों पर निर्भरता कम करेगा, हजारों नौकरियां डेवलप होंगी और किसानों को उच्च गुणवत्ता वाली सस्ती खाद मिलेगी।

 नागपुर का ये पायलट प्लांट सिर्फ एक प्लांट नहीं, बल्कि ‘मेक इन इंडिया’, ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘हरित भारत’ (‘Make in India’, ‘Self-Reliant India’ and ‘Green India’) का जीता-जागता मॉडल है। ये दर्शाता है कि गहन शोध, सही नीति और उद्योग के सहयोग से भारत दुनिया को पर्यावरण-अनुकूल तकनीक दे सकता है और अपने संसाधनों से अधिकतम मूल्य निकाल सकता है। ये देश के कृषि और खनन क्षेत्र के लिए एक नए युग की शुरुआत है।

सम्पर्क सूत्र: किसान साथी यदि खेती-किसानी से जुड़ी जानकारी या अनुभव हमारे साथ साझा करना चाहें तो हमें फ़ोन नम्बर 9599273766 पर कॉल करके या kisanofindia.mail@gmail.com पर ईमेल लिखकर या फिर अपनी बात को रिकॉर्ड करके हमें भेज सकते हैं। किसान ऑफ़ इंडिया के ज़रिये हम आपकी बात लोगों तक पहुँचाएँगे, क्योंकि हम मानते हैं कि किसान उन्नत तो देश ख़ुशहाल।

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