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कश्मीर (Kashmir), जिसे धरती का स्वर्ग कहा जाता है, आज एक ऐसे गंभीर संकट से जूझ रहा है जो उसकी खूबसूरती के नीचे छिपे जहर को उजागर कर रहा है। यहां के लहलहाते सेब के बाग अब धीमे जहर के सोर्स बनते जा रहे हैं। कीटनाशकों (Pesticides) के अंधाधुंध इस्तेमाल और कैंसर के बढ़ते मामलों (Increasing cases of cancer) के बीच प्रशासन ने अब कार्रवाई का रास्ता अपनाया है।
सरकारी आंकड़े चौंकाने वाले हैं। जम्मू-कश्मीर विधानसभा में स्वास्थ्य मंत्री सकीना इतू (Sakina Itu, Minister of Health in Jammu and Kashmir Assembly) ने बताया कि साल 2018 से अब तक केंद्र शासित प्रदेश में 64,000 से ज़्यादा कैंसर के मामले (More than 64,000 cancer cases in Union Territory) दर्ज किए गए हैं। इनमें से सिर्फ घाटी में ही 50,551 मामले हैं। ये आंकड़ा इस गंभीर समस्या की भयावहता को बयां करने के लिए काफी है।
चौंकाने वाला शोध: 90 फीसदी ब्रेन ट्यूमर मरीजों का कीटनाशकों से संबंध
इस संकट का प्रूफ़ एक हैरान कर देने वाले शोध से होता है। Indian Journal of Medical and Pediatric Oncology (IJMPO) में 2010 में छपे एक स्टडी में पाया गया कि 2005 से 2008 के बीच कश्मीर में Primary malignant brain tumor (ब्रेन कैंसर) के पाए गए 432 मरीजों में से 90 फीसदी (389 मरीज) या तो खुद बागानों में काम करने वाले मजदूर थे, या फिर बागानों के आस-पास रहने वाले लोग थे, या वे बच्चे थे जो अक्सर इन बागानों में खेलते थे।
Sher-e-Kashmir Institute of Medical Sciences (SKIMS) में भर्ती मरीजों के डेटा की स्टडी पर आधारित इस शोध ने 10 से 20 साल तक लंबे वक्त तक इन कीटनाशकों के कॉन्टेक्ट में रहने और ब्रेन ट्यूमर के विकास के बीच मजबूत संबंध स्थापित किया है।
कीटनाशकों पर बढ़ती निर्भरता: चौथे नंबर पर कश्मीर
एक्सपर्ट मानते हैं कि कश्मीर में कीटनाशकों पर निर्भरता चिंताजनक स्तर पर पहुंच चुकी है। जम्मू-कश्मीर में हर साल इस्तेमाल होने वाली 4,080 मीट्रिक टन कीटनाशकों में से 90 प्रतिशत से अधिक सिर्फ सेब के बागानों में कीट और बीमारियों पर कंट्रोल के लिए छिड़काव की जाती है। ये क्षेत्र देश भर में कुल कीटनाशक खपत में चौथे स्थान पर है और प्रति हेक्टेयर के हिसाब से इसका इस्तेमाल सबसे ज़्यादा है। किसान उत्पादन लागत का लगभग 55 प्रतिशत हिस्सा सिर्फ फसल सुरक्षा (कीटनाशकों) पर खर्च कर देते हैं।
सरकार की पहल: 75,000 हेक्टेयर ज़मीन होगी ऑर्गेनिक
इन चिंताओं के बीच प्रशासन ने केमिकल यूज़ को कम करने के लिए ठोस कदम उठाए हैं। कृषि मंत्री जावेद अहमद दार ने हाल ही में श्रीनगर में आयोजित ‘फूड सेफ्टी एंड हेल्थ कॉन्क्लेव 2025’ में घोषणा की कि सरकार ने Holistic Agriculture Development Programme (HADP) के तहत 75,000 हेक्टेयर जमीन को जैविक खेती (ऑर्गेनिक फार्मिंग) के लिए सेलेक्ट किया है। HADP जम्मू-कश्मीर के कृषि और इससे जुड़े क्षेत्रों के बदलाव के लिए शुरू की गई पांच साल की एक पहल है।
मंत्री ने ये भी बताया कि मौजूदा 20,000 हेक्टेयर के बागानों को पर्यावरण-अनुकूल और कम-प्रभाव वाली खेती के तरीकों में बदला जा रहा है ताकि जैव विविधता और खाद्य सुरक्षा (Biodiversity and food security) को बढ़ावा दिया जा सके। दार ने कहा, “हमारा टार्गेट मानव स्वास्थ्य की रक्षा करना और टिकाऊ कृषि का विकास करना है।
ऑर्गेनिक खेती की चुनौतियां
हालांकि, इस रास्ते में चुनौतियां भी हैं। शेर-ए-कश्मीर यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज एंड टेक्नोलॉजी, कश्मीर के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. तारिक रसूल के मुताबिक, ‘ऑर्गेनिक सेब की खेती में बीमारियों और कीटों का प्रबंधन सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ है। हालांकि कॉपर, सल्फर और बाइकार्बोनेट लवण जैसे कुछ यौगिकों को दुनिया भर में बीमारी कंट्रोल के लिए अनुमति है, लेकिन जैविक तरीके से उगाए गए सेब की पैदावार और दिखावट अभी भी पारंपरिक तरीकों से उत्पादित सेब से कम है।’
ये साफ है कि कश्मीर के सामने एक लंबी लड़ाई है। एक तरफ जहां लोगों का स्वास्थ्य खतरे में है, वहीं दूसरी तरफ किसानों की आजीविका और अर्थव्यवस्था का सवाल है। सरकार की ये पहल एक सही दिशा में उठाया गया कदम है
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