जैविक खेती के गुर सीखा रहे उत्तराखंड के पूर्व फौजी हर्ष सिंह डंगवाल, खोली खेती की जैविक पाठशाला

उत्तराखंड के नैनीताल ज़िले के हर्ष सिंह डंगवाल को जैविक खेती में उनके कार्यों और प्रयोगों के लिए पूसा कृषि विज्ञान मेला 2022 में ‘इनोवेटिव फार्मर’ केअवॉर्ड से सम्मानित किया गया।

जैविक खेती उत्तराखंड हर्ष सिंह डंगवाल organic farming uttarakhand

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI) की ओर से दिल्ली में 9 से 11 मार्च के बीच पूसा कृषि विज्ञान मेले (Pusa Krishi Vigyan Mela 2022) का आयोजन हुआ। इस बार की थीम ‘तकनीकी ज्ञान से आत्मनिर्भर किसान’ का फोकस टेक्नोलॉजी पर रहा। मेले में देश के कोने-कोने से कई प्रगतिशील किसानों, महिला किसानों और एग्री स्टार्टअप्स का जमावड़ा लगा। मेले में कई प्रगतिशील किसानों को ‘इनोवेटीव फार्मर’ के अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। इन्हीं में से एक है उत्तराखंड के नैनीताल ज़िले के हर्ष सिंह डंगवाल। जैविक खेती के क्षेत्र में उनके कार्यों और प्रयोगों को सराहते हुए उन्हें इस अवॉर्ड से नवाज़ा गया। किसान ऑफ़ इंडिया से ख़ास बातचीत में हर्ष सिंह डंगवाल ने अपने अनुभवों के बारे में बताया। 

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बंजर ज़मीन को बनाया उपजाऊ

हर्ष सिंह डंगवाल ने अपनी ज़िंदगी के करीब 40 साल मातृभूमि की रक्षा को समर्पित किए। सेना से रिटायर होने के बाद उन्होंने अपनी बंजर पड़ी ज़मीन में हरियाली के बीज बोने का ज़िम्मा उठाया। हर्ष सिंह कहते हैं कि उन्होंने सेना में एक जवान रहते हए मातृभूमि के प्रति अपना कर्तव्य निभाया। अब बारी देश की मिट्टी की सेवा करने की थी। बंजर पड़ी ज़मीन को फिर से उपजाऊ बनाने की चुनौती उन्होंने स्वीकार की।

नैनीताल के सुनकिया गाँव के रहने वाले हर्ष सिंह डंगवाल के क्षेत्र में पानी की उपलब्धता नहीं थी। सबसे पहले उन्होंने वर्षा जल सरंक्षण की उन्नत तकनीकों पर काम किया। अपने वहां 8 छोटे-बड़े पॉलीथिन युक्त तालाबों का‌ निर्माण किया। इनमें से पांच तालाबों में मछली पालन का कार्य शुरू किया। बंजर ज़मीन में जीतने भी कांटे और खरपतवार थे, उनको जलाने के बजाय ज़मीन में गाड़कर जैविक उर्वरक तैयार किए। साथ ही जैविक कंपोस्ट भी तैयार किया। 

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जैविक खेती अपनाई

हर्ष सिंह डंगवाल कहते हैं कि पहाड़ में जहां पहले लोगों को शुगर और ब्लड प्रेशर जैसी बीमारियां नहीं हुआ करती थीं, अब ये बीमारियां बढ़ रही हैं। रासायनिक उर्वरकों का अंधाधुंध प्रयोग इसका मुख्य कारण है। फसलों पर पड़ने वाले केमिकल बाज़ार से होकर इंसान की थाली तक आ पहुंचे हैं। ऐसे में जैविक खेती की भूमिका काफ़ी बढ़ जाती है। उन्होंने इन सब परेशानियों को देखते हुए संकल्प लिया कि वो जैविक खेती को न सिर्फ़ खुद अपनाएंगे, बल्कि बड़े स्तर पर देश के भावी किसानों को इसके लिए प्रेरित भी करेंगे। 

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कीवी के नर पौधे से किया फल का उत्पादन

हर्ष सिंह डंगवाल ने अपने खेत में सेब, आड़ू, पुलम, खुमानी, नासपाती, कीवी के पेड़ लगाए हुए हैं। जब उन्होंने कीवी के पौधे अपने खेत में लगाए तो  देखा कि कीवी की नर प्रजाति तोमरी सिर्फ़ परागण का काम करता है। इसमें फल नहीं आते। उन्होंने ऐसी तकनीक विकसित की, जिससे तोमरी के नर पौधे से भी फल उत्पादन लिया जा सके। उन्होंने बताया कि आज की तारीख में उनके खेत में लगा तोमरी का नर पौधा भी फल देता है। यकीनन, उनका ये प्रयोग कृषि जगत के लिए एक बड़ी उपलब्धि है। 

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जैविक खेती के गुर सीखा रहे उत्तराखंड के पूर्व फौजी हर्ष सिंह डंगवाल, खोली खेती की जैविक पाठशालाकिसानों में भी वितरित करते हैं पौधे

इसके अलावा, ट्री टोमैटो जिसे टमरैलो भी कहा जाता है, इसके पौधे तैयार करते हैं और उन्हें किसानों में वितरित करते हैं। हर्ष सिंह डंगवाल ने बताया कि वो हल्द्वानी स्थित अपनी एक और कृषि ज़मीन में ड्रैगन फ्रूट की खेती भी करते हैं। हर्ष सिंह डंगवाल टमाटर, आलू, प्याज, लहसुन, गोभी, सोयाबीन, राजमा, रोजमेरी, स्ट्रॉबेरी, तेज पत्ता जैसी फल-सब्जियों और अनाज की खेती भी कर रहे हैं। 

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गाँव में खोली जैविक पाठशाला

उन्होंने अपने क्षेत्र में जैविक पाठशाला भी खोली हुई है। जहां वो किसानों को जैविक खेती के गुर सिखाते हैं। अब तक वो लगभग 800 किसानों को ट्रेनिंग दे चुके हैं। उनका उद्देश्य अपने गाँव को पूरी तरह से जैविक खेती की ओर ले जाना है। हर्ष सिंह डंगवाल ने महिलाओं का एक समूह भी बना रखा है, जो धूप,मोमबत्ती, खिलौने और बैग बनाने का काम करती हैं। 

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बाज़ार की उपलब्धता 

हर्ष सिंह डंगवाल कहते हैं कि बाज़ार की समस्या के समाधान के लिए किसान कृषि मेलों का दौरा करें। उनमें भाग लें। वो खुद पंत नगर कृषि मेला, विवेकानंद कृषि मेला में भाग लेते हैं। वहां अपने उत्पादों की प्रदर्शनी लगाते हैं। साथ ही महिलाओं के समूह के ज़रिए भी उत्पादों को ग्राहकों तक पहुंचाते हैं। इस तरह से उन्होंने अपने जैविक उत्पादों का बाज़ार खड़ा किया है। हर्ष सिंह डंगवाल बताते हैं कि आज की तारीख में वो अच्छा मुनाफ़ा अर्जित कर रहे हैं। 

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जैविक खेती के गुर सीखा रहे उत्तराखंड के पूर्व फौजी हर्ष सिंह डंगवाल, खोली खेती की जैविक पाठशालाक्या है आगे का लक्ष्य? 

हर्ष सिंह डंगवाल कहते हैं कि उनकी असल उपलब्धि और सफलता तब है जब उनके साथी किसानों को भी उनकी उपज का सही दाम मिले। उन्हें दर-दर की ठोकरे न खानी पड़े। अगर वो इसमें असफल रहते हैं, तो उनका कार्य शून्य है। अपने इसी संकल्प के साथ हर्ष सिंह डंगवाल आगे बढ़ रहे हैं। उनका उद्देश्य किसान साथियों को साथ लेकर उनका विकास करना है। उन्होंने किसान ऑफ़ इंडिया के मंच से अपने किसान साथियों से निवेदन किया कि आप खेती की नई-नई तकनीकों को सीखें और एक से दूसरे किसान तक उन्हें पहुंचाए। इससे किसान वर्ग कदम से कदम मिलाकर उन्नति की ओर अग्रसर होगा। 

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पर्वतीय किसानों को समर्पित किया अपना अवॉर्ड

IVRI से सम्मानित होने को लेकर हर्ष सिंह डंगवाल ने कहा कि ये सम्मान उनके अकेले का नहीं है। ये सम्मान उन सभी पर्वतीय किसानों का है, जो जैविक खेती को बढ़ावा दे रहे हैं और इसका प्रचार-प्रसार कर रहे हैं। उन्होंने उत्तराखंड स्थित ICAR-विवेकानंद पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान का भी आभार व्यक्त किया, जो पर्वतीय किसानों को आगे बढ़ाने के लिए नए-नए शोध, बीज और फसल पर काम कर किसानों तक पहुंचा रहे हैं। 

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सम्पर्क सूत्र: किसान साथी यदि खेती-किसानी से जुड़ी जानकारी या अनुभव हमारे साथ साझा करना चाहें तो हमें फ़ोन नम्बर 9599273766 पर कॉल करके या [email protected] पर ईमेल लिखकर या फिर अपनी बात को रिकॉर्ड करके हमें भेज सकते हैं। किसान ऑफ़ इंडिया के ज़रिये हम आपकी बात लोगों तक पहुँचाएँगे, क्योंकि हम मानते हैं कि किसान उन्नत तो देश ख़ुशहाल।

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