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महाराष्ट्र के वर्षा-छाया क्षेत्रों से लेकर राजस्थान के शुष्क जिलों और अन्य अर्ध-शुष्क इलाकों तक, किसान आसमान की ओर देखते हैं और बारिश की उम्मीद करते हैं। पिछले कुछ वर्षों में एक हाई-टेक उपाय सामने आया है —Cloud seeding, यानी कृत्रिम रूप से बारिश करवाने की कोशिश।
लेकिन भारत के कृषि क्षेत्र (India’s agricultural sector) के लिए असली सवाल यह है — क्या यह सूखा राहत (Drought relief) का कारगर तरीका है, या एक महँगा भ्रम?
क्लाउड सीडिंग क्या है और कैसे काम करती है?
क्लाउड सीडिंग (Cloud seeding) एक मौसम-परिवर्तन तकनीक है जिसमें बहुत छोटे-छोटे कण (जैसे सिल्वर आयोडाइड, सोडियम क्लोराइड) उपयुक्त बादलों में छोड़े जाते हैं। ये कण संघनन या बर्फ-क्रिस्टल नाभिक का काम करते हैं। इन्हीं पर जल-बूंदें या बर्फ-कण जमा होकर बड़े होते हैं और फिर बारिश या बर्फबारी के रूप में गिरते हैं।
भारतीय अध्ययनों में, जैसे IITM पुणे द्वारा सोलापुर में चलाया गया CAIPEEX (Cloud Aerosol Interaction and Precipitation Enhancement Experiment), पाया गया कि केवल वे बादल जिनमें ऊर्ध्वाधर मोटाई 1 किमी से अधिक और पर्याप्त लिक्विड-वॉटर कंटेंट हो, वही सीडिंग पर प्रतिक्रिया देते हैं।
IITM की 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, सोलापुर में बीजे गए बादलों में लगभग 18% अधिक वर्षा दर्ज की गई — जो लगभग 867 मिलियन लीटर पानी के बराबर थी।
भारत में हुए फील्ड प्रयोग: कहां और क्या परिणाम मिले?
महाराष्ट्र (2018–19)
CAIPEEX अध्ययन में 276 बादलों को टारगेट किया गया (150 बीजे गए, 122 बिना बीज वाले) और अनुकूल परिस्थितियों में बारिश में स्पष्ट वृद्धि दर्ज हुई।
राजस्थान
जवा-रामगढ़ डैम क्षेत्र में ड्रोन-आधारित क्लाउड सीडिंग को DGCA की मंजूरी मिली — 10,000 फीट तक की उड़ान के लिए। इसका उद्देश्य इलाके व लागत के अनुसार तकनीक को ढालना था।
दिल्ली
यहां प्रदूषण कम करने के लिए क्लाउड सीडिंग की कोशिश हुई, पर कम नमी (लगभग 10–20%) के कारण लगभग कोई सफलता नहीं मिली।
कब काम करती है — और कब नहीं?
सफल होने की स्थितियां
• पर्याप्त नमी और गहराई वाले बादल
• सही समय — बादल के विकास चरण में सीडिंग
• मजबूत अपड्राफ्ट
विफलता की स्थितियां
• कम नमी वाले बादल (दिल्ली, राजस्थान में आम)
• सीमित प्रभाव — क्षेत्र छोटा
• लागत अधिक, लाभ अनिश्चित
भारतीय कृषि के लिए क्लाउड सीडिंग का असली अर्थ
किसानों के लिए बारिश सिर्फ मौसम नहीं — नुकसान और बचाव का अंतर है।
क्लाउड सीडिंग खेती को केवल “बारिश कराने” से कहीं अधिक जटिल तरीकों से प्रभावित करती है। इसका वास्तविक असर फसल प्रणाली, मिट्टी की नमी, सिंचाई पैटर्न और जोखिम प्रबंधन पर पड़ता है।
1. बुवाई के फैसलों पर प्रभाव
मराठवाड़ा और उत्तरी कर्नाटक जैसे अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में सबसे बड़ा जोखिम होता है — कब बोया जाए। एक गलत बारिश-खिड़की पूरी फसल बिगाड़ सकती है। अगर प्री-मानसूनी चरण में थोड़ी भी कृत्रिम वर्षा हो जाए तो किसान सोयाबीन, ज्वार, बाजरा और कपास जैसी फसलों की बुवाई समय पर कर पाते हैं। आरंभिक हल्की बारिश अंकुरण बेहतर करती है और दोबारा बुवाई की लागत बचाती है।
2. वर्षा-आधारित खेती में मिट्टी की नमी बढ़ाना
भारत की लगभग 52% कृषि भूमि वर्षा-आधारित है।
क्लाउड सीडिंग से :
• ऊपरी मिट्टी की नमी भरती है
• पौधों की सूखावट घटती है
• सूक्ष्मजीव सक्रिय होते हैं
• अंकुरण और शुरुआती विकास समर्थित होता है
लंबे सूखे अंतराल में इसका लाभ अधिक होता है।
3. सुरक्षा सिंचाई पर निर्भरता कम करना
20–30 मिनट की कृत्रिम बारिश भी सिंचाई की जरूरत को एक सप्ताह तक टाल सकती है।
किसान बचाते हैं:
• डीज़ल/बिजली
• बोरवेल का दबाव
• श्रम लागत
कपास, मूंगफली, गन्ना और सब्जियों में सबसे अधिक फायदा दिखता है।
4. चारे और पशुधन पर प्रभाव
थोड़ी अतिरिक्त वर्षा से:
• चरागाह फिर से उगते हैं
• ज्वार और मक्का का हरा चारा बढ़ता है
• पशु पोषण सुधरता है
यह बीड़, जलना, जालोर और चित्रदुर्ग जैसे जिलों में महत्वपूर्ण है।
5. भू-जल पर प्रभाव
कृत्रिम वर्षा गहरे जलभंडार नहीं भरती, लेकिन:
•उथले जल भंडार
•फार्मपोंड
•जल-संरचनाओंमेंरिसाव
•मिट्टीकीजल-धारणक्षमता
में सुधार कर सकती है।
6. गर्मी से फसल रक्षा
हीटवेव के दौरान थोड़ी बारिश से:
• पत्तियों का तापमान घटता है
• वाष्पोत्सर्जन कम होता है
• कपास, धान, मक्का व सोयाबीन की कोमल अवस्था सुरक्षित रहती है
7. जोखिम भी मौजूद हैं
• गलत समय पर बारिश से दवा/खाद कार्यक्रम बिगड़ सकते हैं
• दाल/सब्जियां खराब हो सकती हैं
• फसल पकने पर बारिश से दाने काले पड़ सकते हैं
• उम्मीदें वास्तविकता से अधिक हो सकती हैं
8. भविष्य की खेती में इसका स्थान
क्लाउड सीडिंग को जोखिम घटाने वाला उपकरण समझना चाहिए, जादू की छड़ी नहीं।
यह काम करेगी जब इसके साथ शामिल हों:
•सूखा–रोधी बीज
• माइक्रो-इरीगेशन
• मिट्टी नमी संरक्षण
• फसल विविधीकरण
• जिला एग्रोमेट सलाह
भारत की भविष्य की खेती आकाश + मिट्टी + डेटा — तीनों का मेल होगी।
कृषि पर प्रभाव: वादा भी, सीमा भी
सूखे क्षेत्रों में क्लाउड सीडिंग सहायक हो सकती है:
• फसल बचाने में
• भू-जल सुधारने में
• सिंचाई निर्भरता घटाने में
लेकिन यह आंशिक समाधान है।
यह जलसंरक्षण, सूक्ष्म सिंचाई, मल्चिंग या नीतिगत उपायों की जगह नहीं ले सकती।
महाराष्ट्र, कर्नाटक, राजस्थान जैसे राज्य इसे जलवायु-समर्थ खेती का एक हिस्सा मान सकते हैं—बस वास्तविक उम्मीदों के साथ।
विवाद और वैज्ञानिक चिंताएं
1.पर्यावरणीय जोखिम: सिल्वर आयोडाइड के दीर्घकालिक प्रभाव अभी पूरी तरह ज्ञात नहीं।
2.न्याय का मुद्दा: एक क्षेत्र में बढ़ी बारिश से नीचे की ओर वर्षा कम हो सकती है।
3.डेटा की कमी: कई प्रयोगों में नियंत्रण बादल नहीं थे, इसलिए नतीजे निश्चित नहीं माने जा सकते।
संतुलित दृष्टिकोण: उम्मीद भी, सावधानी भी
IITM और CAIPEEX के वैज्ञानिक अध्ययनों से पता चलता है कि क्लाउड सीडिंग उपयुक्त परिस्थितियों में उपयोगी है, लेकिन बड़े पैमाने पर, दोहराने योग्य, किफायती समाधान अभी नहीं है।
खेती के लिए संदेश साफ़ है:
• बादल अच्छे हों तो मदद मिलेगी
• हालत खराब हों तो कितना भी खर्च कर लें, परिणाम नहीं मिलेंगे
इसे एक उपकरण समझें, पूरा समाधान नहीं।
चमत्कारी बारिश मशीन नहीं, पर एक उपयोगी मदद
भारत में क्लाउड सीडिंग पायलट से आगे बढ़कर अब संचालन स्तर तक पहुँच रही है। लेकिन किसानों को समझदारी से कदम बढ़ाना होगा:
आसमान सहारा दे सकता है—बचाव नहीं।
कृषि के लिए समझदारी भरा तरीका यह है:
1. पहले मौसम विभाग से बादल की स्थिति देखें
2. मापदंड पूरे हों तो ही सीडिंग करें
3. बाकी कृषि प्रबंधन वैसे ही जारी रखें
अगर यह संतुलन बना रहे, तो क्लाउड सीडिंग सच में सूखे खेतों को “कुछ अतिरिक्त बूंदें” दे सकती है। अगर नहीं, तो यह महँगा प्रयोग बनकर रह जाएगा—और फसल को खास फायदा नहीं मिलेगा।
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