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Pest management: भारतीय किसान लंबे समय से सर्दी को प्राकृतिक कीट नियंत्रक मानते आए हैं। ठंडा मौसम कीड़ों की गति धीमी करता है, अंडों को नुकसान पहुंचाता है, लार्वा की संख्या कम करता है और उनके जीवन चक्र को तोड़ देता है। पारंपरिक खेती की कई प्रणालियां इसी मौसमी संतुलन पर आधारित रही हैं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में उत्तर भारत, मध्य भारत और दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों के किसान एक बदलाव देख रहे हैं। सर्दियां छोटी लग रही हैं। रातें पहले जितनी ठंडी नहीं रहीं। पाला कम पड़ रहा है। और जैसे ही नई फसल का मौसम शुरू होता है, कीट पहले से जल्दी, ज्यादा ताकतवर और अधिक संख्या में दिखाई देने लगते हैं।
अब किसान एक सीधा सवाल पूछ रहे हैं:
ठंड कम हुई तो कीट क्यों बढ़े? आधुनिक कीट विज्ञान और जलवायु विज्ञान इसका साफ़ जवाब देते हैं। जब सर्दियां हल्की होती हैं तो ज्यादा कीट जीवित बच जाते हैं, जल्दी प्रजनन करते हैं और फसल पर पहले हमला करते हैं। नुकसान अचानक नहीं होता, बल्कि धीरे-धीरे बढ़ता है। इस बदलाव को समझना आज के किसान के लिए बहुत जरूरी है।
सर्दी: प्रकृति का पारंपरिक कीट नियंत्रण तंत्र
कीट ठंडे खून वाले जीव होते हैं। उनका शरीर और गतिविधियां बाहरी तापमान पर निर्भर करती हैं। जब तापमान गिरता है तो उनका विकास धीमा हो जाता है, खाना कम कर देते हैं और गतिविधि घट जाती है। कई कीट एक विशेष अवस्था में चले जाते हैं जिसे “ओवरविंटरिंग” कहा जाता है।
पहले भारत में खासकर पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में कड़ाके की सर्दी कीटों की संख्या नियंत्रित करती थी। तेज ठंड कमजोर कीटों को मार देती थी। लंबे समय तक पाला पड़ने से अंडे नष्ट हो जाते थे। कम तापमान के कारण प्रजनन कम हो जाता था। इस वजह से हर साल की शुरुआत में कीटों की संख्या सीमित रहती थी। लेकिन जब सर्दी हल्की हो जाती है, तो यह प्राकृतिक नियंत्रण कमजोर पड़ जाता है।
ओवरविंटरिंग क्या है? कीटों के जीवित रहने का विज्ञान
ओवरविंटरिंग वह तरीका है जिससे कीट खराब मौसम को झेलते हैं। अलग-अलग कीट अलग-अलग रूप में सर्दी काटते हैं:
• अंडे के रूप में (जैसे माहू, सफेद मक्खी)।
• लार्वा या प्यूपा के रूप में मिट्टी में छिपकर।
• वयस्क कीट के रूप में फसल अवशेषों में।
• डायपॉज़ नाम की निष्क्रिय अवस्था में।
डायपॉज़ बहुत महत्वपूर्ण है। यह विकास का एक रुकाव है जो तापमान और दिन की लंबाई से नियंत्रित होता है। जब सर्दी पर्याप्त ठंडी होती है तो यह अवस्था बनी रहती है। लेकिन जब सर्दी सामान्य से गर्म हो जाती है तो कीट जल्दी सक्रिय हो जाते हैं।
इससे होता क्या है?
• जल्दी बाहर निकलना
• जल्दी भोजन शुरू करना
• जल्दी प्रजनन
इस तरह कीट कमजोर नहीं, बल्कि मजबूत स्थिति में मौसम की शुरुआत करते हैं।
अंडों का बचना: चुपचाप बढ़ती संख्या
कई कीटों के अंडे अत्यधिक ठंड के प्रति संवेदनशील होते हैं। पाला पड़ने से अंडों की बाहरी परत फट सकती है। बर्फ जमने से अंदर का भ्रूण मर सकता है। पहले सर्दियों में बड़ी संख्या में अंडे नष्ट हो जाते थे। लेकिन जब न्यूनतम तापमान बढ़ता है:
• अंडों की मृत्यु कम होती है।
• ज्यादा लार्वा निकलते हैं।
• पहली पीढ़ी मजबूत बनती है।
उदाहरण के लिए गेहूं और सरसों में माहू तब तेजी से बढ़ता है जब रातें बहुत ठंडी नहीं होतीं। कम ठंड का मतलब ज्यादा अंडे जीवित। अंडों का बचना किसान को दिखाई नहीं देता। असर कुछ हफ्तों बाद दिखता है जब कीट अचानक अधिक संख्या में दिखाई देते हैं।
गर्म रातें क्यों ज्यादा असर डालती हैं?
कीटों के लिए अधिकतम तापमान से ज्यादा न्यूनतम तापमान मायने रखता है। कुछ बहुत ठंडी रातें ही बड़ी संख्या को खत्म कर सकती हैं। जब रातें सामान्य से 2–3 डिग्री ज्यादा गर्म रहती हैं:
• जीवित रहने की दर बढ़ती है।
• तनाव कम होता है।
• मृत्यु घटती है।
गर्म रातें कीटों को सक्रिय रखती हैं। वे सोने की बजाय खाते और बढ़ते रहते हैं। इसलिए समस्या सिर्फ़ दिन का तापमान नहीं है, बल्कि कड़क ठंड का न होना है।
तेज जीवन चक्र: एक मौसम में ज्यादा पीढ़ियां
कीटों का विकास “हीट यूनिट” या ताप इकाई पर निर्भर करता है। जब सर्दियां गर्म होती हैं तो ये इकाइयां जल्दी पूरी होती हैं।
इसका परिणाम:
• पहली पीढ़ी जल्दी।
• एक ही मौसम में ज्यादा पीढ़ियां।
• कुल कीट दबाव अधिक।
कपास में गुलाबी सुंडी और मक्का में फॉल आर्मीवर्म इसका उदाहरण हैं। पहले जो कीट तीन पीढ़ी बनाता था, अब चार या पांच बना सकता है। हर अतिरिक्त पीढ़ी नुकसान बढ़ाती है।
फसल अवशेष: कीटों के सुरक्षित ठिकाने
कई कीट सर्दियों में फसल अवशेषों या खरपतवार में छिपे रहते हैं। पहले ठंड इनको कम कर देती थी। अब गर्म सर्दियां:
• अवशेषों में ज्यादा जीवित रहना।
• लार्वा सुरक्षित रहना।
• वसंत में अधिक कीट निकलना।
जहां संरक्षण खेती में अवशेष खेत में छोड़े जाते हैं, वहां यह असर ज्यादा दिख सकता है अगर ठंड पर्याप्त न हो। इसका मतलब अवशेष गलत नहीं हैं, बल्कि बदलते मौसम में रणनीति बदलनी होगी।
मिट्टी के अंदर रहने वाले कीट
कुछ कीट मिट्टी में रहते हैं जैसे लार्वा, प्यूपा या ग्रब।
जब मिट्टी का तापमान ज्यादा रहता है:
• प्यूपा ज्यादा बचते हैं।
• लार्वा मृत्यु कम होती है।
• जड़ों को खाने वाले कीट ज्यादा निकलते हैं।
इसी कारण मक्का, सब्जियों और दलहनों में शुरुआती नुकसान बढ़ रहा है।
किसानों के अनुभव
देश के अलग-अलग हिस्सों से किसान बता रहे हैं:
• गेहूं और सरसों में माहू ज्यादा।
• कपास में सफे़द मक्खी बनी रहती है।
• थ्रिप्स और जेसिड जल्दी आते हैं।
• फॉल आर्मीवर्म अधिक टिकता है।
• दीमक और ग्रब ज्यादा दिखते हैं।
कीट नए नहीं हैं, लेकिन समय और संख्या बदल रही है। सिर्फ दवा समाधान नहीं है जब कीट बढ़ते हैं तो पहला कदम स्प्रे बढ़ाना होता है। लेकिन यह पूरी कहानी नहीं है।
बार-बार स्प्रे से:
• लाभकारी कीट मरते हैं।
• संतुलन बिगड़ता है।
• प्रतिरोध बढ़ता है।
• लागत बढ़ती है।
गर्म सर्दी में कीट तेजी से बढ़ते हैं, इसलिए सिर्फ़ दवा से समस्या हल नहीं होती।
प्राकृतिक शत्रु और असंतुलन
शिकार करने वाले कीट और परजीवी भी तापमान पर निर्भर करते हैं। लेकिन उनका समय हमेशा कीटों से मेल नहीं खाता। अगर कीट जल्दी सक्रिय हो जाएं और उनके शत्रु बाद में आएं, तो नुकसान ज्यादा होता है। यह असंतुलन बढ़ रहा है।
खरपतवार की भूमिका
गर्म सर्दियों में खरपतवार भी लंबे समय तक जीवित रहते हैं। कई कीट इन्हें बीच मौसम आश्रय के रूप में उपयोग करते हैं।
इससे:
• कीट लगातार जीवित रहते हैं।
• बुवाई से पहले संख्या बढ़ती है।
• फसल में तेजी से फैलते हैं।
इसलिए खरपतवार नियंत्रण और भी जरूरी हो जाता है।
नमी और रोग
गर्म सर्दियां कई बार अधिक नमी के साथ आती हैं। यह कीट और रोग दोनों के लिए अनुकूल होती है। कीट के काटने से बने घावों पर फफूंदी और वायरस जल्दी फैलते हैं। इस तरह कीट और रोग साथ बढ़ते हैं।
किसान को असर क्यों ज्यादा महसूस होता है?
खेती में मुनाफ़ा सीमित होता है। कीटों में थोड़ी भी वृद्धि सीधे पैदावार पर असर डालती है। अगर कीट शुरुआती अवस्था में हमला करें तो:
• अंकुरण प्रभावित
• टिलर कम
• फूल गिरना
• दाना कम भरना
इसलिए किसान को कीट ज्यादा “ताकतवर” लगते हैं।
जलवायु आंकड़े क्या बताते हैं?
कई राज्यों के आंकड़े बताते हैं:
• पाले के दिन कम हुए।
• न्यूनतम तापमान बढ़ा।
• ठंडी लहरें छोटी हुईं।
ये छोटे बदलाव मिलकर कीट पारिस्थितिकी बदल रहे हैं। जलवायु परिवर्तन हमेशा गर्मी नहीं, बल्कि हल्की सर्दी भी होता है।
किसान क्या करें?
तापमान नियंत्रित नहीं किया जा सकता, लेकिन रणनीति बदली जा सकती है:
• जल्दी निगरानी शुरू करें।
• बुवाई समय पर करें।
• सहनशील किस्में अपनाएं।
• खेत साफ़ रखें।
• जरूरत हो तो अवशेष प्रबंधन करें।
• जैव नियंत्रण बढ़ाएं।
शुरुआती निगरानी बहुत जरूरी है।
बदलती सर्दियों में एकीकृत कीट प्रबंधन
आईपीएम अब और महत्वपूर्ण हो गया है।
मुख्य कदम:
• नियमित निरीक्षण
• सीमा के आधार पर स्प्रे
• जैविक एजेंट
• फसल चक्र
• संतुलित पोषण
स्वस्थ फसल कीटों को बेहतर सहन करती है। आर्थिक असर गर्म सर्दियों से:
• स्प्रे लागत बढ़ती है।
• मजदूरी बढ़ती है।
• जोखिम बढ़ता है।
• लाभ घटता है।
कारण समझने से अनावश्यक खर्च बचता है।
बदलती धारणा
पहले किसान मानते थे कि सर्दी कीट खत्म कर देगी। अब यह भरोसा कमजोर हो रहा है। मौसम को हल्के में नहीं लिया जा सकता।
वैज्ञानिक निष्कर्ष
गर्म सर्दी में कीट इसलिए बढ़ते हैं क्योंकि:
• ज्यादा अंडे बचते हैं।
• ज्यादा लार्वा बचते हैं ।
• जीवन चक्र तेज।
• ज्यादा पीढ़ियां।
• प्राकृतिक मृत्यु कम।
यह जैविक गुणन है।
हर हल्की सर्दी अगली फसल के लिए कीट संख्या बढ़ा देती है।
अगर कीट ज्यादा लग रहे हैं तो यह हमेशा आपकी गलती नहीं है।
अब सवाल सिर्फ यह नहीं है:
“कितनी दवा डाली?”
बल्कि यह भी है:
“सर्दी कितनी पड़ी?”
जो किसान यह समझता है, वह बदलते मौसम में एक कदम आगे रहता है।
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