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उत्तराखंड के पंतनगर में स्थित गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय देश का पहला कृषि विश्वविद्यालय है जिसकी स्थापना 1960 में हुई थी। करीब 11 हजार एकड़ में फैला ये विश्वविद्यालय देश का सबसे बड़ा कृषि विश्वविद्यालय है। इसकी एक खासियत यह भी है कि इसे हरित क्रांति की जननी भी कहा जाता है। वर्तमान में यहां ढेर सारे कृषि से जुड़े कोर्स कराए जा रहे हैं और यहां सबसे ज़्यादा रिसर्च होती है और फसलों की नई-नई किस्में निकलती हैं। वर्तमान में यूनिवर्सिटी के कुलपति डॉ. मनमोहन सिंह चौहान हैं, जिन्होंने किसान ऑफ़ इंडिया को दिए एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में किसानों से जुड़े अहम मुद्दे, संस्थान की चुनौतियां और मौजूदा समय में वहां चल रही रिसर्च पर विस्तार से चर्चा की।
QS world ranking 2025 में 209वां स्थान
पतंनगर का गोविंद वल्लभ पंत कृषि विश्वविद्यालय देश का पहला कृषि विश्वविद्यालय जिसे हरित क्रांति की जननी कहा जाता है। देश को खाद्यान संकट से उबारने वाली हरित क्रांति में इस विश्वविद्यालय की अहम भूमिक रही है। वर्तमान में इसके कुलपति डॉ. मनमोहन सिंह हैं जो एक वैज्ञानिक भी हैं। उनका कहना है कि वो खुद 37 साल से कृषि और कृषि से जुड़े कार्यों में लगे हुए हैं और उनके कार्यकाल में विश्वविद्यालय की रैंकिंग में बहुत सुधार हुआ है। QS world ranking 2025 में यूनिवर्सिटी को 209वां स्थान मिला, जो वाकई देश के लिए गौरव की बात है। डॉ. मनमोहन सिंह कहते हैं कि इस यूनिवर्सिटी की सबसे बड़ी खासियत ये है कि अभी तक इसने खुद को नंबर एक पर मेंटेन करके रखा है।
शोध पर अधिक ध्यान
कृषि क्षेत्र में विकास और किसानों के हालात में सुधार के लिए ज़रूरी है नए-नए रिसर्च किए जाए और ये काम कृषि विश्वविद्यालय की ही करते हैं। पतनंगर कृषि विश्वविद्यालय देश का सबसे बड़ा विश्वविद्यालय है जो 1960 में बना था और तब से लेकर अब तक इसमें दर्जनों कॉलेज बन चुके हैं। डॉ. मनमोहन सिंह बताते हैं कि सबसे पहले कृषि महाविद्यालय बना, उसके बाद पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान महाविद्यालय, प्रौद्योगिकी महाविद्यालय, सामुदायिक विज्ञान महाविद्यालय और फिर विज्ञान एवं मानविकी महाविद्यालय आदि बनें। यूनिवर्सिटी को आगे बढ़ाने में यहां के जितने भी कॉलेज रहे हैं उनका खास योगदान रहा है। मनमोहन सिंह के मुताबिक, करीब 11 हजार एकड़ में फैले इस विश्वविद्यालय में पढ़ाई के साथ ही साथ एक्सपेरिमेंट यानी प्रयोग पर ज़्यादा ध्यान दिया जाता है। यहां छात्रों को 50 प्रतिशत किताबी शिक्षा दी जाती है और 50 प्रतिशत रिसर्च शामिल है। यही वजह है कि यहां सबसे अधिक नए-नए शोध होते हैं।
हरित क्रांति में भूमिका
डॉ. मनमोहन सिंह बताते हैं कि आज़ादी के बाद देश के पर्याप्त अनाज नहीं था, मगर 1966 से 72 के बीच हरित क्रांति हुई है और देश के अन्न का भंडार भर गया। इस क्रांति में पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय, इंडियन एग्रीकल्चर रिसर्च इंस्टीट्यूट, पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी, लुधियाना आदि ने मिलकर काम किया। पंतनगर यूनिवर्सिटी की इसमें सबसे अहम भूमिका रही, क्योंकि इसके पास ज़मीन ज़्यादा थी। हरित क्रांति के 3 साल बाद देश में अनाज का इतना भंडार हो गया कि पूरी आबादी का पेट भरने के बाद भी अनाज का स्टॉक हमारे पास था। आगे वो बताते हैं कि विश्वविद्यालय ने गेहूं, धान, दलहन में नई-नई वैरायटी निकाली जिससे उत्पादन बढ़ा। आज देश में 357 मिलियन टन अनाज का उत्पादन हो रहा है। ये बहुत बड़ा अचीवमेंट है। इसके अलावा यूनिवर्सिटी का एक और बड़ा योगदान ये हैं कि जो छात्र यहां से पढ़कर गए हैं वो पूरे विश्व में अलग-अलग जगहों पर बहुत अच्छी पोस्ट पर कार्यरत हैं।
ह्यूमन रिसोर्स में अहम भूमिका
डॉ. मनमोहन सिंह कहते हैं कि ह्यूमन रिसोर्स में यूनिवर्सिटी का खास योगदान रहा है। 47 हजार से ज़्यादा छात्र यहां से पासआउट हुए हैं, जो देश-विदेश में कृषि से जुड़े विभिन्न क्षेत्रों में ऊंचे पदो पर काम कर रहे हैं। वो बताते हैं कि विश्वविद्यालय हर क्षेत्र में विकास कर रहा है, चाहे वो कृषि विज्ञान केंद्र हो या ह्यूमन रिसोर्स। या फिर नई-नई टेक्नोलॉजी की बात करें या इंजीनियरिंग की। आगे वो कहते हैं कि यही यूनिवर्सिटी है जहां कॉलेज ऑफ़ इंजीनियरिंग है, यहां एग्रीकल्चर इंजीनियरिंग के अलावा बेसिक इंजीनियरिंग भी सिखाई जाती है।
पूरे साल देते हैं प्रशिक्षण
किसानों को नई तकनीक सिखाने के लिए प्रशिक्षण देना सबसे ज़रूरी होता है और ये काम विश्विद्यालय बखूबी कर रहा है। डॉ. मनमोहन सिंह बताते हैं कि पिछले साल सबसे ज़्यादा पब्लिकेशन विश्वविद्यालय ने ही दिए थे और उनके 9 कृषि विज्ञान केंद्र हैं जहां हमेशा कुछ न कुछ ट्रेनिंग चलती रहती है। वो बताते हैं कि 365 में 310 दिन ट्रेनिंग देने वाला पंतनगर अकेला विश्वविद्यालय है। प्रशिक्षण के दौरान किसानों को बताया जाता है कि धान, गेहूं या किसी भी फसल में कीटनाशकों का कितना और कैसे इस्तेमाल करना है, फर्टिलाइज़र कितना डालना है आदि। इसके अलावा मशरूम उत्पादन, मधुमक्खी पालन, मछली पालन, मुर्गी पालन आदि का भी प्रशिक्षण दिया जाता है। साथ ही छोटे स्तर पर महिलाएं कैसे रोज़ागर सृजन कर सकती हैं, दूध का उत्पादन कैसे कर सकते हैं, दूध से कौन-कौन से उत्पाद बनाए जा सकते हैं आदि के बारे में भी बताया जाता है ताकि किसानों को अधिक फायदा हो सके। वो कहते हैं कि विश्वविद्यालय का मकसद है कि जो भी टेक्नोलॉजी विकसित की जा रही है, उसे ज़मीन पर कैसे पहुंचाए ताकि किसान उसका ज़्यादा से ज़्यादा लाभ उठा सके।
नई किस्म विकसित करने में लगता है लंबा समय
जब भी कोई नई किस्म लॉन्च होती है तो उसके पीछे वैज्ञानिकों की सालों की मेहनत होती है। डॉ. सिंह बताते हैं कि रिसर्च के लिए स्टेप बाय स्टेप काम होता है, कोई भी नई वैरायटी निकलती है तो लैब निकलने के बाद फील्ड में काम करके प्रजनन बीज तैयार करना होता है, उसके बाद किसानों के खेत में जाकर सर्टीफाइड सीड के रूप में उसे विकसित किया जाता है। एक किस्म विकसित करने में 10 से 12 साल का समय लग जाता है। कई बार किसान ज़्यादा फर्टिलाइज़र डालकर कुछ समय के लिए तो ज़्यादा उत्पादन ले लेते हैं, मगर इससे खेत को नुकसान होता है। इसलिए उन्हें इसकी बजाय उन्नत और गुणवत्ता पूर्ण बीज का इस्तेमाल करना चाहिए। विश्वविद्यालय किसान मेला के जरिए उनक तक बीज पहुंचाती है या फिर अपने एटिक सेंटर के द्वारा। वो सीधे भी बीज सप्लाई करती है, इसके अलावा टीडीसी के द्वारा भी किसानों तक बीज पहुंचाया जाता है। ICAR ने भी कई संस्थान बनाए हैं जो बीज की सप्लाई किसानों को करते हैं।
पुशपालन के लिए वरदान बन सकती है एनीमल क्लोनिंग
कृषि के साथ ही विश्वविद्यालय कृषि से जुड़े सभी क्षेत्रों को बेतरन बनाने की दिशा में काम कर रहा है ताकि किसानों की आमदनी बढ़े। इस दिशा में एनीमल क्लोनिंग का भी काम किया जा रहा है। कुलपित डॉ. सिंह बताते हैं कि उनका एनीमल क्लोनिंग का बैकग्राउंड रहा है, करनाल में उन्होंने 27 भैंसे क्लोन से बनाई हैं, जो 16 लीटर दूध देती हैं। एक सांड भी बनाया है जिसके सीमेन का इस्तेमाल करके दुधारू पशु बनाए जाएंगे। उन्होंने गिर गाय का भी क्लोन बनाया है। साथ ही उत्तराखंड की बद्री गाय का क्लोन बनाने का काम चल रहा है। क्लोनिंग से तैयार नस्ल अधिक दूध देती है जिससे किसानों को लाभ होगा। बद्री गाय की खासियत के बारे में वो बताते हैं कि इसमें मौजूद कजुगेटेड लिनोलिक एसिड (CLA) हमारी सेहत के लिए बहुत अच्छा होता है। इस गाय के दूध से बना घी भी बहुत मंहगा मिलता है, दिल्ली में ये 4500 से 5000 रूपए प्रति किलो तक मिलता है। आगे वो बताते हैं कि यूनिवर्सिटी ने इस सिलसिले में सेंट पीटर्सबर्ग यूनिवर्सिटी, रूस के साथ (MOU) किया है।
जौ, मक्का और मिलेट्स पर ज़ोर
बदलते वक़्त में मिलेट्स की मांग बढ़ रही है जिसे देखते हुए कृषि विश्वविद्यालय किसानों को पारंपरिक गेहूं और धान की खेती की बजाय जौ, मक्का और मिलेट्स की खेती के लिए प्रेरित कर रहे हैं। इस कड़ी में यूनिवर्सिटी ने जौ की नई किस्म 1106 विकसित की है और उम्मीद है कि इससे जौ क्रांति लाने में मदद मिलेगी। डॉ. मनमोहन सिंह का कहना है कि जौ की ये वैरायटी पहाड़ों के लिए बहुत उपयोगी है। वो बताते हैं कि मिलेट्स के प्रति लोगों में रुझान बढ़ा है, इसलिए धान और गेहूं की बजाय पूरे देश में मक्का, जौ और मिलेट्स पर ज़्यादा फ़ोकस कर रहे हैं। वो किसानों को नकदी और बागवानी फसल लगाने की सलाह देते हैं क्योंकि इससे आमदनी अच्छी होती है। बागवानी फसलों को बढ़ावा देने के मकसद से ही उत्तराखंड सरकार ड्रैगन फ्रूट की खेती पर 80 फ़ीसदी सब्सिडी दे रही है। उनका कहना है कि फिलाहल ड्रैगन फ्रूट की दो वैरायटी है एक अंदर से सफे़द और एक अंदर से लाल/बैंगनी रंग की है। जबकि विश्वविद्यालय एक नई वैरायटी पर काम कर रहा है जो स्वाद में इन दोनों से अधिक मीठा होगा। ड्रैगन फ्रूट की खासियत ये है कि इसकी खेती के लिए पानी कम लगता है और खुरदरी ज़मीन में भी ये आसानी से उग जाता है। इसके अलावा उन्होंने बताया कि कीवी, सेब और नींबू की भी नई किस्मों पर का चल रहा है।
डॉ. सिंह बताते हैं कि पंतनगर में साल में दो किसान मेले का आयोजन किया जाता है जहां किसानों को नई-नई तकनीक के बारे में जानकारी दी जाती है, विभिन्न किस्म के बीज उपलब्ध कराए जाते हैं और उन्हे एक अच्छा बाज़ार उपलब्ध कराया जाता है।
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