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खेती में यूरिया, डीएपी और नैनो यूरिया/डीएपी की बहुत अहम भूमिका होती है और भारतीय किसानों को इसकी आपूर्ति करता है भारतीय किसान उर्वरक सहकारी लिमिटेड (IFFCO), जो दुनिया की सबसे बड़ी उर्वरक सहकारी संस्थाओं में से एक है। किसान ऑफ़ इंडिया से खास बातचीत में IFFCO के मार्केटिंग डायरेक्टर डॉ. योगेंद्र कुमार ने कृषि में नैनो यूरिया/डीएपी की अहमियत बता ने के साथ ही ये भी बताया की क्यों किसानों को इसका पूरा फ़ायदा नहीं मिल पाता है। उनका मानना है कि नैनो तकनीक बदलते समय की खेती की ज़रूरत है।
किसानों की ज़रूरत को प्राथमिकता
भारतीय किसान उर्वरक सहकारी लिमिटेड (IFFCO), जो दुनिया की सबसे बड़ी उर्वरक सहकारी संस्थाओं में से एक है और इसका मुख्य उद्देश्य है किसानों को ज़रूरत के हिसाब से सही समय पर उर्वरक उपलब्ध कराना। IFFCO के मार्केटिंग डायरेक्टर डॉ. योगेंद्र कुमार बताते हैं कि IFFCO अपनी मार्केटिंग अप्रोच डिसाइड करने में किसानों की प्राथमिकताओं, आवश्यकताओं और उत्पाद की उपयोगिता का विश्लेषण करता है। वो 91 लाख टन उर्वरक बनाता है और करीब 1 करोड़ 38 लाख टन की बिक्री होती है। IFFCO यह सुनिश्चित करता है कि कैसे किसानों को सही समय पर सही तरीके से उर्वरक उपलब्ध कराया जाए। इसके लिए उसके पास सहकारिता का एक विशाल नेटवर्क है, जिसके ज़रिए किसानो को उर्वरक की आपूर्ति करी जाती है। वो बताते हैं कि सही समय पर, सही दर पर और सही मात्रा में किसानों को उर्वरक उपलब्ध कराने की प्राथमिकता को ध्यान में रखकर ही IFFCO अपनी रणनीति बनाता है। यही नहीं उन्हें पता होता है कि देश में कब कहां बुवाई होती है, तो उस हिसाब से उस समय किसानों को आवश्यक उर्वरक उपलब्ध कराया जाता है, फिर टॉप ड्रेसिंग के लिए खाद उपलब्ध कराए जाते हैं, साथ ही इस बात का ध्यान रखा जाता है कि रसायनिक उर्वरको के इस्तेमाल को सीमित किया जाए। क्योंकि वर्तमान में हमारी ज़मीन की जो हालत है वो बहुत ज़्यादा रासायनिक खाद को अवशोषित नहीं कर पाएगी, मिट्टी में ऑर्गेनिक कार्बन की मात्रा बहुत घट चुकी है।
रसायन से मिट्टी की सेहत हुई है खराब
उपज बढ़ाने के लिए रसायनों के अंधाधुंध इस्तेमाल ने मिट्टी की सेहत और उर्वरा शक्ति को बहुत नुकसान पहुंचाया है। डॉ. योगेंद्र कुमार कहते हैं कि रसायनिक खेती से धरती का स्वास्थ्य खराब हुआ है और साथ में हमारा भी। केमिकल वाली फसल, फल और सब्ज़ियों के इस्तेमाल से ही नई-नई बीमारियां जन्म ले रही है। उनका कहना है कि रसायनों का इस्तेमाल कम करने के लिए बायोफर्टिलाइज़र का उपयोग बढ़ाना होगा। इस दिशा में बायोडिकंपोजर भी एक अच्छा उत्पाद है, जिसे ICAR ने बनाया है। इसके इस्तेमाल से फसल के अवशेष सड़कर मिट्टी में मिल जाते है जिससे मिट्टी के पोषक तत्व बढ़ते हैं।
खेती में नैनो यूरिया का इस्तेमाल
डॉ. योगेंद्र कुमार बताते हैं कि व्यापारिक रूप से किसानों को 2021 में नैनो यूरिया तरल रूप में सबसे पहले उपलब्ध कराया गया था। उनका कहना है कि नैनो यूरिया के इस्तेमाल से पारपंरिक यूरिया की खपत आधी हो जाती है, मगर बड़े पैमाने पर इसका इस्तेमाल अभी नहीं हो पा रहा है, इसमें थोड़ा और समय लगेगा, क्योंकि किसानों को अभी इसकी सही मात्रा और तकनीक के बारे में नहीं पता है। नैनो यूरिया के साथ ही वो Nano DAP, Nano Zinc, Nano Copper के इस्तेमाल की भी सलाह देते हैं। उनका कहना है कि नैनो आधारित उत्पादों की विशेषता ये है कि एक तो ये प्रदूषण मुक्त होते हैं और दूसरा ये कि पौधे इसे 95 प्रतिशत तक अवशोषित कर लेते हैं। आगे वो बताते हैं कि रसायनिक खाद को अचनाक से बंद करने की बजाय धीरे-धीरे उसकी मात्रा कम करनी चाहिए, पहले 25 फ़ीसदी फिर 50, 75 और फिर 100 फ़ीसदी कम किया जा सकता है। जहां तक नैनो तकनीक का सवाल है कि तो अभी ये नई है, किसी भी नई चीज़ को अपनाने में समय लगता है, आने वाले 2 सालों में इस तकनीक का इस्तेमाल बढ़ेगा और किसानो को इसका लाभ दिखने लगेगा। आने वाले समय में ज़मीन में डालने वाली खाद की जगह छिड़काव वाली खाद लेंगी, जिससे मिट्टी की सेहत खराब नहीं होगी।
स्वस्थ पौधे, पौष्टिक फसल
डॉ. योगेंद्र कुमार बताते हैं कि नैनो तकनीक से पैदा होने वाली फसलों में पोषक तत्व पर्याप्त मात्रा में रहते हैं और इसके उपयोग से मिट्टी भी धीरे-धीरे अपने प्राकृतिक रूप में लौटने लगती है, क्योंकि मिट्टी में सीधे कोई रसायन नहीं जाता है। वो कहते हैं कि जहां-जहां इस तकनीक का इस्तेमाल हुआ है, वहां अच्छी फसल देखने को मिली है। उदाहरण के लिए सरसों में नैनो तकनीक के इस्तेमाल से सरसों में तेल की मात्रा बढ़ी है। प्याज़ में इसे डालने पर प्याज़ की गुणवत्ता और उत्पादन बढ़ा है, जिससे किसानों को फसल की अच्छी कीमत मिलती है। जिन सब्ज़ियों में इसका इस्तेमाल होता है वो न सिर्फ़ देखने में अच्छी होती है, बल्कि खाने में भी स्वादिष्ट होती हैं। नैनो उर्वरक के इस्तेमाल से पौधे स्वस्थ रहते हैं जिससे बीमारी और कीटों का प्रकोप कम होता है। एक बार नैनो यूरिया, डीएपी का छिड़काव करने पर 25 दिनों तक इसके पोषक तत्व मौजूद रहते हैं।
नैनो यूरिया पारंपरिक यूरिया से कैसे बेहतर है?
डॉ. योगेंद्र कुमार कहते हैं कि पौधों की सरंचना को बेहतर बनाने का काम यूरिया या नैनो यूरिया करता है। इन दोनों में अंतर ये है कि अगगर खेत में 100 किलो यूरिया डाला जाता है तो सिर्फ़ 30 प्रतिशत ही पौधे अवशोषित करते हैं बाकि 70 फ़ीसदी बर्बाद हो जाता है। यही नहीं ये ज़मीन के अंदर जाकर मिट्टी और पेय जल को प्रदूषित करता है। जबकि नैनो यूरिया में यूरिया की थोड़ी-सी मात्रा ली जाती है और उसमें ऊपर से एक जैवकि कवच बना दिया जाता है। इससे पौधों को जितनी मात्रा में ज़रूरत होती है उतना ले लेती है। नैनो यूरिया को सीधे ज़मीन में नहीं डाला जाता है, जिससे मिट्टी प्रदूषित नहीं होती है। वो बताते हैं कि नैनो यूरिया के छिड़काव के लिए IFFCO ने देश में 2000 ड्रोन दिए हैं ताकि नैनो यूरिया का इस्तेमाल बढ़ें। उनका कहना है कि प्रदूषण और बीमारियों से बचाव के लिए नैनो यूरिया का इस्तेमाल ज़रूरी है। नैनो ज़िंक, नैनो कॉपर, नैनो डीएपी सब अपने पारंपरिक रूप से बेहतर हैं। नैनो यूरिया/डीएपी डालने पर पौधे का विकास अच्छा होता है और अगर रोग-कीट लग भी जाते हैं, तो उनका नियंत्रण आसान होता है। साथ ही वो ये भी बताते हैं कि किसान इसके इस्तेमाल में क्या गलती कर रहे हैं। उनका कहना है कि किसानों को सही विधि, मात्रा और समय का ज्ञान नहीं है। बस वो दुकान से खरीदकर अपने हिसाब से डाल देते हैं, जिससे उचित परिणाम नहीं मिलता है।
किसानों को नैनो यूरिया के सही इस्तेमाल के लिए कैसे प्रेरित कर रहे हैं?
किसी भी तकनीक का पूरा फ़ायदा उठाने के लिए उसे सही तरीके से इस्तेमाल करना ज़रूरी है। नैनो उर्वरक के सही इस्तेमाल के लिए IFFCO किसानों को कैसे प्रेरित कर रहा है इस बारे में डॉ. योगेंद्र कुमार कहते हैं किसान सभी, किसान दिवस, डेमोनस्ट्रेशन आदि के ज़रिए किसानों को व्यवहारिक रूप से बताया जाता है कि कैसे इनका इस्तेमाल करना है। इसके अलावा राज्य और क्षेत्र स्तरीय गोष्ठी आयोजित की जाती है और किसानों का व्हाट्सअप ग्रुप बनाया जाता है जिस पर उन्हें जानकारी दी जाती है। बहुत सी सहकारी संस्थाएं भी IFFCO की मदद करती है। पूरे देश में 2000 से ज़्यादा रिसर्च के ट्रायल किए गए हैं, साथ ही विदेशों में भी ट्रायल कर रहे हैं। साल 2005 में IFFCO ने 5 लाख नैनो उर्वरक बोतलों का निर्यात किया था। खेती के लिए नैनो तकनीक कितनी फ़ायदेमंद है इस बारे में डॉ. योगेंद्र का कहना है कि नैनो डीएपी से शोधित बीज, कंद और पौध की फसल बहुत अच्छी होती है।
सम्पर्क सूत्र: किसान साथी यदि खेती-किसानी से जुड़ी जानकारी या अनुभव हमारे साथ साझा करना चाहें तो हमें फ़ोन नम्बर 9599273766 पर कॉल करके या kisanofindia.mail@gmail.com पर ईमेल लिखकर या फिर अपनी बात को रिकॉर्ड करके हमें भेज सकते हैं। किसान ऑफ़ इंडिया के ज़रिये हम आपकी बात लोगों तक पहुँचाएँगे, क्योंकि हम मानते हैं कि किसान उन्नत तो देश ख़ुशहाल।

