घास, एलोवेरा और बांस लगाकर कैसे किया जा सकता है मृदा-जल सरंक्षण, जानिए वैज्ञानिकों की राय

किसानों को जैविक तरीके से मृदा जल सरंक्षण करके खेती के नए मॉडल की जानकारी देने की दिशा में बुंदेलखंड के रानी लक्ष्मीबाई केंद्रीय विश्वविद्यालय के भारतीय मृदा और जल संरक्षण संस्थान के वैज्ञानिक लगातार काम कर रहे हैं।

मृदा-जल सरंक्षण

खेती के लिए सबसे ज़रूरी चीज़ होती है मिट्टी और जल, मगर विडंबना ये है कि आज इन दोनों की इतनी क्षति हो रही है कि भविष्य में खेती बहुत मुश्किल हो सकती है। इसलिए ज़रूरी है कि अभी से किसान इसके सरंक्षण की दिशा में काम करे। किसानों को जैविक तरीके से मृदा जल सरंक्षण करके खेती के नए मॉडल की जानकारी देने की दिशा में बुंदेलखंड के रानी लक्ष्मीबाई केंद्रीय विश्वविद्यालय के भारतीय मृदा और जल संरक्षण संस्थान के वैज्ञानिक लगातार काम कर रहे हैं। वो मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने और पानी के सरंक्षण के लिए घास आधारित उपायों पर ज़ोर देते हैं। वैज्ञानिकों ने मृदा कटाव रोकने, बारिश के पानी को संचित करने, खाद्यान और तिलहन फसलों की सुरक्षा तथा पशुओं से फसल सरंक्षण के व्यावहारिक तरीकों के बारे में विस्तार से चर्चा की किसान ऑफ़ इंडिया के संवाददाता सर्वेश बुंदेली से।

प्रकृति के दो उपहार है मृदा और जल

भारतीय मृदा और जल संरक्षण संस्थान के वैज्ञानिक डॉ. आर. के. पटेल का कहना है कि मिट्टी और जल प्रकृति के दो उपहार हैं, इनके बिना जीवन की परिकल्पना भी नहीं की जा सकती। इसी परिप्रेक्ष्य में भारतीय मृदा और जल संरक्षण संस्थान इन दोनों को संरक्षित करने के लिए काम कर रहा है। किसानों के लिए नई टेक्नोलॉजी विकसित करने के साथ ही संस्थान बुंदेलखंड के किसानों को ये भी बताता है कि कौन सी फसल उनकी आमदनी बढ़ाने के साथ ही मृदा सरंक्षण में भी उपयोगी है। इन फसलों नींबू और मौसंबी शामिल है। इसके अलावा बुंदलेखंड के शुष्क बारानी क्षेत्र के लिए बेर, आंवला, बेल जैसे फसल भी बहुत अच्छे हैं। साथ ही साथ बुंदेलखंड के कुछ स्वदेशी फल हैं जिसमें बेल और कैथा प्रमुख हैं। इन बागवानी फसलों को मृदा सरंक्षण के लिए उपयोगी माना जाता है।

घास, तिलहन और दलहन फसलें हैं उपयोगी

डॉ. पटेल बताते हैं कि मृदा सरंक्षण और उसकी उर्वरता बढ़ाने में खाद्यान और तिलहन फसलों का भी अहम योगदान होता है। मिलेट्स की बात करें तो ज्वार, बाजरा, तिहलन में सरसों और दलहन में मसूर की खेती करना उपयोगी होता है। वो बताते हैं कि उनकी मकसद किसानों को ऐसी फसलों की खेती करने के लिए प्रेरित करना है जिससे मृदा की उत्पादकता को बढ़ाया जा सकते। किसान हरी खाद के रूप में सनई और ढेंचा भी उगा सकते हैं। मृदा के क्षरण को कम करने के लिए गिनी घास, लेमन ग्राम, डीएन हाइब्रिड घास, सिटेरिया घास आदि लगाए जा सकते हैं और जीवंत बाड़ के रूप में बांस को एक उपयोगी फसल के रूप में अपनाया जा सकता है।

मृदा और जल सरंक्षण का जैविक तरीका है बेस्ट

बुंदेलखंड के रानी लक्ष्मीबाई केंद्रीय विश्वविद्यालय के भारतीय मृदा और जल संरक्षण संस्थान के वैज्ञानिक डॉ. के राजन कहते हैं कि मृदा और जल दोनों ही खेती के लिए बहुत ज़रूरी है। वो बताते हैं कि एक इंच मिट्टी की परत को बनने में हजारों साल लग जाते हैं, मगर हम उसके सरंक्षण के बारे में नहीं सोचते है। अगर इसका सही तरीके से सरंक्षण किया जाए तो किसानों को अच्छी फसल मिल सकती है। मृदा के साथ ही जल सरंक्षण भी बहुत ज़रूरी है। बिना पानी के हम कुछ नहीं कर सकते हैं। पानी और मिट्टी को सरंक्षित करने के लिए संस्थान के वैज्ञानिक हर तरह के उपाय बताते हैं, जिसमें से ही एक है जैविक तरीका। किसानों को ये बात समझ नहीं आती है, इसलिए उन्हें यह समझाना बहुत ज़रूरी है कि किस तरह से वो कुछ घास और फसलों को लगाकर मिट्टी की उर्वरता बढ़ा सकते हैं, उसका क्षरण कम कर सकते हैं। मेड़ पर घास लगाने से मेड़ जल्दी टूटेगी नहीं और ये पानी को भी रोकने का काम करेगी। इस तरह से ये मिट्टी और पानी दोनों को बचाने में मददगार है।

लेमन ग्रास और एलोवेरा

डॉ. राजन बताते हैं कि किसान भाई लेमेन ग्रास और एलोवेरा को अपने खेतों में या मेड़ पर लगाकर न सिर्फ़ मृदा के क्षरण को कम कर सकते हैं, बल्कि इससे अतिरिक्त कमाई भी कर सकते हैं। लेमन ग्रास से तेल निकलता है, तो वो उसे तेल बनाने वाली कंपनियों को बेच सकते हैं। जबकि एलोवेरा का इस्तेमाल आयुर्वेदिक दवाओं में किया जाता है। उनका मानना है कि मृदा और जल सरंक्षण का जैविक तरीका किसानों के लिए बहुत फ़ायदेमंद है। इसके अलावा मकैनेकिल तरीके में मेड़ बनाना और गड्ढ़ा खोदना शामिल है, जिसे अपनाकर भी किसान मिट्टी और पानी का बचाव कर सकते हैं, मगर इसे बनाने में खर्च होता है। तो जो किसान खर्च वहन नहीं कर सकतें उनके लिए जैविक तरीका ही सबसे अधिक कारगर है। आगे डॉ. राजन बताते हैं कि मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने में जुताई करने का तरीका भी मायने रखता है, साथ ही इसमें गोबर की खाद डालना भी बहुत फ़ायदेमंद होता है।

किसानों को सलाह

डॉ. आर. के पटेल बुंदेलखंड के किसानों को आवरा पशुओं से बचाव का कारगर उपाय बताते हैं। उनका कहना हैं कि इस क्षेत्र में आवार पशु, नीलगाय और सूअर फसलों को नुकसान पहुंचाते हैं, इसे बचाने के लिए किसान दिन रात फसलों की रखवाली तो करते हैं फिर भी नुकसान हो ही जाता है। वैज्ञानिकों ने अपनी रिसर्च में पाया कि किसान अगर खेत में एक मीटर चौड़ाई में बांस के सजीव बाड़ लगा दे तो 3-4 साल में किसानों को इन पशुओं से छुटकारा मिल सकता है।

बारिश के पानी को एकत्र करना

डॉ. राजन का कहना है कि क्योंकि बुंदेलखंड शुष्क इलाका है, मगर यहां बारिश अच्छी होती है। हालांकि एक समस्या ये है कि यहां कि मिट्टी हल्की है जो पानी को ज़्यादा अवशोषित नहीं कर पाती है। ऐसे में बारिश का पानी ज़मीन के अंदर ज़्यादा गहराई तक नहीं जा पाता है। ऐसे में डॉ. राजन सलाह देते हैं कि बारिश के मौसम में जो पानी आता है उसे तालाब में जमा किया जाए, जो पुराने तालाब हैं उसकी गहराई बढ़ाए जाए। इसका फ़ायदा ये होगा कि इस संरक्षित पानी को बाद में इस्तेमाल किया जा सकता है।

मिट्टी के सरंक्षण के अन्य जैविक तरीके

  • मुख्य फसलों के बीच के खाली समय यानी जब खेत खाली हो तो राई और दलहनी फसलों को लगाना चाहिए। ये मिट्टी को ढके रखती हैं और कटाव को रोककर मिट्टी को पोषण देती है।
  • खेत में लगातार एक ही फसल लगाने की बजाए फसल चक्र को अपनाना चाहिए। यानी अलग-अलग मौसम में अलग-अलग फसलें बारी-बारी से लगानी चाहिए, इससे मिट्टी के पोषक तत्व बने रहते हैं और बीमारियां कम होती हैं।
  • मिट्टी की सतह को जैविक पदार्थों जैसे सूखी पत्तियां, घास या पुआल से ढंक देना चाहिए, जिससे नमी बनी रहती है और मिट्टी का कटाव कम होता है।
  • मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने के लिए रसायनिक खाद की बजाय वर्मीकंपोस्ट और जैविक खाद का उपयोग करना चाहिए।

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