Mission Aatmanirbharta in Pulses: दालों में क्रांति लाएंगी 15 जीनोम-एडिटेड किस्में, कम वक्त में ज़्यादा होगी पैदावार !

‘मिशन आत्मनिर्भरता इन पल्सेज’ (Mission Aatmanirbharta in Pulses) के तहत अगले 6 सालों में तीन प्रमुख दालों – तूर (अरहर), उड़द और मसूर की 15 जीनोम-एडिटेड किस्में (15 genome-edited varieties) विकसित और जारी की जाएंगी।

भारत की थाली का अहम हिस्सा दालें (pulses),अब विज्ञान की नई टेक्नोलॉजी से तैयार होने वाली हैं। केंद्र सरकार ने देश को दालों के मामले में आत्मनिर्भर बनाने के लिए एक महत्वाकांक्षी ‘मिशन आत्मनिर्भरता इन पल्सेज’ (Mission Aatmanirbharta in Pulses) की नींव रखी है, जिसके तहत अगले 6 सालों में तीन प्रमुख दालों – तूर (अरहर), उड़द और मसूर की 15 जीनोम-एडिटेड किस्में (15 genome-edited varieties) विकसित और जारी की जाएंगी।
कृषि मंत्रालय (Ministry of Agriculture)  की ओर से 18 अक्टूबर को जारी ऑपरेशनल गाइडलाइंस में इस टारगेट को बताया  गया है। ये कदम न सिर्फ हमारे दाल उत्पादन (Pulse production) को बढ़ाने, बल्कि जलवायु परिवर्तन और नए कीटों के खतरों (Threats from climate change and new pests) से निपटने में भी एक बड़ा हथियार साबित हो सकता है।

क्या है पूरी योजना? गाइडलाइंस में क्या है ख़ास?

गाइडलाइंस में साफ तौर पर कहा गया है कि मिशन का प्रमुख फोकस ज़्यादा प्रोडक्शन देने वाली, कम अवधि में पकने वाली, हाइब्रिड, जीनोम-एडिटेड, जलवायु सहनशील और कीट-प्रतिरोधी किस्मों (Hybrid, genome-edited, climate-tolerant and pest-resistant varieties) का विकास करना है। इसका मतलब है कि हमारे किसानों को ऐसी फसलें मिलेंगी जो कम वक्त में ज़्यादा पैदावार देंगी और मौसम की मार झेलने में सक्षम होंगी।

ख़ासतौर पर तूर (अरहर) की कम अवधि वाली और संकर (Hybrid) किस्मों पर जोर दिया जाएगा, ताकि एक ही सीजन में दो फसलें लेने या फसल चक्र में आसानी हो सके। नई चुनौतियों जैसे कि बदलता मौसम और नए कीटों के प्रकोप से निपटने के लिए जलवायु-सहनशील और कीट-प्रतिरोधी (Climate-tolerant and pest-resistant) किस्मों के विकास पर भी ख़ास फोकस दिया जाएगा।

2028 से 2031 तक का रोडमैप

मंत्रालय ने इस मिशन के लिए एक क्लियर और रोडमैप तैयार किया है- 

  • 2028 और 2029: इन दो सालों में तीनों दालों (तूर, उड़द, मसूर) की कुल 6 जीनोम-एडिटेड किस्में (6 genome-edited varieties) विकसित की जाएंगी, यानी हर दाल की दो-दो किस्में।
  • 2030 और 2031: इस फेज़ में और ज़्यादा तेजी लाते हुए कुल 9 नई जीनोम-एडिटेड किस्में (हर दाल की तीन-तीन) तैयार की जाएंगी।

इस तरह, 2028 से 2031 के बीच कुल 15 उन्नत किस्में किसानों तक पहुंचाने का टारगेट है।

आर्थिक मदद और रिसर्च पर जोर

इस महत्वाकांक्षी योजना (Ambitious plan) को ज़मीन पर उतारने के लिए सरकार ने वित्तीय मदद का भी मैनेजमेंट किया है। मिशन के कुल बजट में से नई किस्मों के विकास के लिए एक Special amount तय किया गया है। कृषि मंत्रालय आईसीएआर (ICAR) और अन्य अनुसंधान संस्थानों को Genome-editing research के लिए आर्थिक सहायता मुहैया कराएगा। साथ ही, इन किस्मों को बड़े पैमाने पर अपनाने के लिए प्रमुख दाल उत्पादक राज्यों में व्यापक स्तर पर फील्ड ट्रायल भी किए जाएंगे।

क्यों जरूरी है ये मिशन?

भारत दुनिया का सबसे बड़ा दाल उत्पादक और उपभोक्ता है, लेकिन फिर भी हमें अपनी जरूरत का एक बड़ा हिस्सा आयात करना पड़ता है। जीनोम एडिटिंग एक ऐसी अत्याधुनिक तकनीक (cutting-edge technologies) है जो conventional gene-enhancing (GM) से अलग है। इसमें फसल के अपने ही जीनोम में बिना किसी बाहरी जीन डाले, सटीक संशोधन करके उसे बेहतर बनाया जाता है। इससे ऐसी फसलें तैयार होती हैं जिनकी उत्पादकता ज़्यादा है, पोषण स्तर बेहतर है और वे adverse conditions में भी ख़राब नहीं होतीं।

 

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1 thought on “Mission Aatmanirbharta in Pulses: दालों में क्रांति लाएंगी 15 जीनोम-एडिटेड किस्में, कम वक्त में ज़्यादा होगी पैदावार !”

  1. Kaafi insightful post hai Mission Aatmanirbharta in Pulses par Genetically improved cropsvarieties aur pulses production increase ka approach future ke liye kaafi strong lag raha hai isse farmers ko direct benefit milega.
    India ka focus ab clearly import kam karke self-reliance par hai, jo agriculture sector ke liye ek positive step hai

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