Fisheries Revolution: भारतीय मछली को मिली डिजिटल पहचान, अब सागर से थाली तक, हर मछली का चलेगा पूरा हिसाब!

'राष्ट्रीय मत्स्य पालन एवं एक्वाकल्चर ट्रेसबिलिटी फ्रेमवर्क 2025' (National Fisheries and Aquaculture Traceability Framework 2025) लॉन्च किया गया। अब भारत की मत्स्य पालन क्रांति (Fisheries revolution) नये मुकाम पर आ चुकी है।

Fisheries Revolution: भारतीय मछली को मिली डिजिटल पहचान, अब सागर से थाली तक, हर मछली का चलेगा पूरा हिसाब!

भारत की मत्स्य पालन क्रांति (Fisheries revolution) अब एक नए मुकाम पर पहुंच चुकी है। पिछले एक दशक में देश में मछली उत्पादन और निर्यात (Fish production and export) दोनों ही दोगुने से ज़्यादा हो गए हैं। अब सरकार का टारगेट है कि इस बढ़ते उत्पादन की क्वालिटी, ट्रांसपेरेंट और ग्लोबल भरोसा के साथ जोड़ा जाए। इसी कड़ी में ‘राष्ट्रीय मत्स्य पालन एवं एक्वाकल्चर ट्रेसबिलिटी फ्रेमवर्क 2025’ (National Fisheries and Aquaculture Traceability Framework 2025) लॉन्च किया गया।

क्या है ये फ्रेमवर्क?

सीधे शब्दों में कहें, तो ये एक डिजिटल निगरानी प्रणाली (Digital surveillance system) है। अब हर मछली, चाहे वह समुद्र से पकड़ी गई हो या तालाब में पाली गई हो, की एक डिजिटल डायरी तैयार होगी। इस डायरी में ये पूरा रिकॉर्ड रहेगा कि मछली कहां पैदा हुई, कैसे पाली गई, किस रास्ते से होती हुई बाजार तक पहुंची और लास्ट में किसके प्लेट में आई। यानी, ‘कैच टू कंज्यूमर’ (Catch to Consumer) का पूरा सफ़र दर्ज होगा।

इसकी ज़रूरत क्यों पड़ी?

भारत का मत्स्य उत्पादन (India’s fish production) 2013-14 के 95.79 लाख टन से बढ़कर 2024-25 में 195 लाख टन (अनुमानित) हो गया है। वहीं, Seafood exports 2014-15 के 30,213 करोड़ रुपये से बढ़कर 62,408 करोड़ रुपये पर पहुंच गया है। लेकिन ग्लोबल मार्केट में अब क्वालिटी और Traceability  (उत्पाद का स्रोत पता होना) सबसे बड़ी मांग बन गई है। यूरोप, अमेरिका जैसे बड़े बाजार चाहते हैं कि उनके बाजार में आने वाली हर मछली की ‘लाइफ हिस्ट्री’ पता हो। इस फ्रेमवर्क के जरिए भारत इसी वैश्विक मांग को पूरा करेगा।

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छोटे मछुआरों को क्या फ़ायदा?

ये फ्रेमवर्क केवल बड़े निर्यातकों के लिए नहीं है। इसका सबसे बड़ा उद्देश्य Small and marginal fishermen और  किसानों को सीधे बाज़ार से जोड़ना है। अक्सर बिचौलिए इन्हें उचित दाम नहीं दे पाते। लेकिन जब उनकी मछली की गुणवत्ता और सोर्स का डिजिटल सर्टिफिकेट होगा, तो वे सीधे बेहतर कीमत पर देश-विदेश के खरीदारों से डील कर सकेंगे। साथ ही, बीमारी की स्थिति में तुरंत पता चल जाएगा कि समस्या कहां से शुरू हुई, जिससे बाकी के उत्पादन को बचाया जा सकेगा।

कैसे काम करेगा ये सिस्टम?

इसके लिए एक राष्ट्रीय स्तरीय शासन समिति (NLGC) बनाई गई है, जो पूरी रणनीति की निगरानी करेगी। एक अपॉप्शन कमेटी यह सिफारिश करेगी कि मछुआरे, किसान और अन्य हितधारक इस डिजिटल प्रणाली को कैसे अपनाएं। सबसे अहम बात, छोटे ऑपरेटरों को इसके लिए विशेष प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण का समर्थन दिया जाएगा, ताकि तकनीकी बाधा कोई रुकावट न बने।

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PMMSY ने कैसे बनाई बुनियाद?

इस फ्रेमवर्क की नींव प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY) ने पिछले पांच साल में मज़बूत कर दी है। इस योजना के तहत 21,000 करोड़ रुपये से अधिक के प्रस्ताव मंजूर किए गए हैं। आधुनिक मत्स्य बंदरगाह, कोल्ड चेन, प्रोसेसिंग इकाइयां बनाई जा रही हैं। ट्रेसबिलिटी फ्रेमवर्क इन सभी इंफ्रास्ट्रक्चर पर एक ‘स्मार्ट लेयर’ चढ़ाएगा, जो पूरी वैल्यू चेन को डिजिटल और ट्रांसपेरेंसी बना देगा।

सम्पर्क सूत्र: किसान साथी यदि खेती-किसानी से जुड़ी जानकारी या अनुभव हमारे साथ साझा करना चाहें तो हमें फ़ोन नम्बर 9599273766 पर कॉल करके या kisanofindia.mail@gmail.com पर ईमेल लिखकर या फिर अपनी बात को रिकॉर्ड करके हमें भेज सकते हैं। किसान ऑफ़ इंडिया के ज़रिये हम आपकी बात लोगों तक पहुँचाएँगे, क्योंकि हम मानते हैं कि किसान उन्नत तो देश ख़ुशहाल।

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