जब खड़ी फसल गिर जाती है हर सीजन भारत में कहीं न कहीं किसान खेत में जाते हैं और देखते हैं कि उनकी खड़ी फसल जमीन पर पड़ी है। जो गेहूं कल तक सीधा खड़ा था, वह झुक गया है। धान हवा के बाद गिर गया है। मक्का एक तरफ़ झुक गया है। अब पैदावार पर चिंता बढ़ जाती है। तुरंत दिमाग में कुछ वजहें आती हैं — “हवा तेज थी”, “बारिश ज्यादा हो गई”, “किस्म कमजोर थी”, “खाद ज्यादा पड़ गई।” ये कारण गलत नहीं हैं, लेकिन ये सिर्फ ऊपर से दिखने वाली बातें हैं। असली कारण तने के अंदर पहले से बन रहा होता है। जब तने की अंदरूनी मजबूती बाहरी दबाव को सहन नहीं कर पाती, तब फसल गिरती है।
लॉजिंग क्या है और यह क्यों नुकसान करती है ?
जब पौधे का तना मुड़ जाता है, टूट जाता है या जड़ से झुक जाता है और पूरी फसल लेट जाती है, तो इसे लॉजिंग कहते हैं। यह आंशिक भी हो सकती है और पूरी भी। कभी तना नीचे से मुड़ता है, कभी बीच से टूटता है, और कभी जड़ कमजोर पड़ जाती है। इसका असर सीधा पैदावार पर पड़ता है। दाना ठीक से नहीं भरता। कटाई मुश्किल हो जाती है। दाने की गुणवत्ता घटती है। रोग बढ़ जाते हैं। 10 प्रतिशत से लेकर 80 प्रतिशत तक उत्पादन कम हो सकता है। गेहूं और धान में दाना भरते समय गिरना बहुत ज्यादा नुकसान करता है। मक्का और ज्वार में तना टूटना सीधा उत्पादन घटा देता है।
तना: एक जीवित सहारा
फसल का तना कोई साधारण डंडी नहीं है। यह एक जीवित ढांचा है जो पौधे को सीधा खड़ा रखता है और पानी व भोजन का परिवहन करता है। तना पत्तियों, फूलों और दानों को ऊपर संभालता है। जड़ों से पानी ऊपर ले जाता है और पत्तियों से बना भोजन नीचे पहुंचाता है। तने की मजबूती कई बातों पर निर्भर करती है — तने की मोटाई, अंदर की रचना, लिग्निन की मात्रा, पोषक तत्वों का संतुलन और सही विकास। इनमें से कोई भी चीज कमजोर हो जाए तो तना गिर सकता है।
लिग्निन: तने की असली ताकत
लिग्निन एक प्राकृतिक पदार्थ है जो तने की कोशिकाओं को सख्त बनाता है। इसे ऐसे समझिए जैसे सीमेंट ईंटों को मजबूती देता है।शुरुआत में तना लंबा होता है। उसके बाद उसमें सख्ती आती है। अगर सख्ती पूरी न बने तो तना मुलायम और कमजोर रह जाता है। आज की ज्यादा उत्पादन देने वाली किस्में तेजी से बढ़ती हैं। अगर तेजी से बढ़ने के साथ-साथ मजबूती न बने तो तना अंदर से कमजोर रह जाता है, भले ही खेत ऊपर से हरा-भरा दिखे।
नाइट्रोजन: फायदा भी और खतरा भी
नाइट्रोजन फसल के लिए जरूरी है। इससे पत्तियां बड़ी होती हैं, टिलर बढ़ते हैं और हरियाली आती है। लेकिन अगर नाइट्रोजन बहुत ज्यादा या एक साथ दे दी जाए तो पौधा तेजी से लंबा हो जाता है। तना पतला रह सकता है और लिग्निन कम बन सकता है। ज्यादा नाइट्रोजन से फसल ऊपर से भारी हो जाती है। जब हवा या बारिश आती है तो ऐसी फसल आसानी से गिर सकती है। नाइट्रोजन सीधे फसल नहीं गिराता, लेकिन गलत समय और ज्यादा मात्रा जोखिम बढ़ा देती है।
नाइट्रोजन देने का सही समय
हर फसल को अलग-अलग समय पर नाइट्रोजन की जरूरत होती है। शुरुआती अवस्था में टिलर और पत्तियां बनाने के लिए इसकी जरूरत होती है। लेकिन तना बढ़ने के समय अगर ज्यादा नाइट्रोजन दे दी जाए तो गिरने का खतरा बढ़ जाता है।नाइट्रोजन को किस्तों में देना बेहतर है। आखिरी समय पर भारी मात्रा देने से पत्तियां तो हरी होंगी, लेकिन तना जरूरी नहीं कि मजबूत बने। सही समय पर और संतुलित मात्रा में खाद देना ही समझदारी है।
पोटाश: मजबूती देने वाला पोषक तत्व
पोटाश तने को मजबूत बनाता है। यह कोशिकाओं को सख्त करता है, पानी का संतुलन बनाए रखता है और पौधे को मजबूती देता है। अगर पोटाश की कमी हो तो तना कमजोर और भंगुर हो जाता है। कई खेतों में बार-बार नाइट्रोजन दी जाती है, लेकिन पोटाश कम दिया जाता है। इससे फसल हरी तो दिखती है, लेकिन मजबूत नहीं बनती। नाइट्रोजन शरीर बढ़ाता है, पोटाश उसे सहारा देता है।
जड़ों की पकड़: नीचे से मजबूती
मजबूत तना ही काफ़ी नहीं है। जड़ों की पकड़ भी मजबूत होनी चाहिए। अगर जड़ें उथली हों, मिट्टी सख्त हो, पानी भरा हो या शुरुआती समय में जड़ों को नुकसान हुआ हो तो पौधा आसानी से झुक सकता है। अक्सर गिरने का कारण शुरुआत में ही तय हो जाता है, जब जड़ें बन रही होती हैं।
पानी और तने का गिरना
तेज बारिश से पत्तियां और बालियां भारी हो जाती हैं। गीली मिट्टी में जड़ों की पकड़ कम हो जाती है। लेकिन पानी अकेला कारण नहीं है। अगर तना पहले से कमजोर है तो ही फसल गिरती है। ज्यादा सिंचाई से मिट्टी में हवा कम हो जाती है और जड़ें कमजोर होती हैं। इससे तना पूरी तरह मजबूत नहीं बन पाता।
पौधे की लंबाई और संतुलन
लंबे पौधों का वजन ऊपर ज्यादा होता है। इससे हवा का दबाव ज्यादा लगता है। छोटी किस्में आम तौर पर कम गिरती हैं।लेकिन किसान लंबे पौधे इसलिए पसंद करते हैं क्योंकि भूसा ज्यादा मिलता है। लंबाई और मजबूती के बीच संतुलन जरूरी है। मौसम सिर्फ़ कारण दिखाता है। एक ही तूफ़ान में दो खेतों में से एक गिर सकता है और दूसरा खड़ा रह सकता है। फ़र्क अंदर की मजबूती का होता है। मौसम कमजोरी को सामने लाता है।
रोग और तने की कमजोरी
कुछ रोग तने को अंदर से कमजोर कर देते हैं। बाहर से फसल ठीक दिख सकती है, लेकिन अंदर से सड़न हो सकती है। रोग नियंत्रण भी तने की मजबूती से जुड़ा है।
गिरने के बाद नुकसान
जब फसल गिरती है तो पत्तियां धूप कम ले पाती हैं। दाना ठीक से नहीं भरता। रोग बढ़ते हैं। कटाई मुश्किल हो जाती है।नुकसान सिर्फ़ गिरने से नहीं, बल्कि उसके बाद की स्थिति से भी होता है।
किसान क्या करें?
संतुलित नाइट्रोजन दें। पोटाश जरूर दें। नाइट्रोजन किस्तों में दें। आखिरी समय पर ज्यादा मात्रा से बचें। मिट्टी भुरभुरी रखें। ज्यादा सिंचाई से बचें। मजबूत किस्में चुनें और सही दूरी रखें। ये कदम मौसम आने से पहले फसल को मजबूत बनाते हैं। जब फसल गिरे तो सिर्फ़ हवा या बारिश को दोष न दें। अपने आप से पूछें — नाइट्रोजन ज्यादा तो नहीं थी? पोटाश कम तो नहीं था? जड़ें कमजोर तो नहीं थीं?
हवा ने सिर्फ़ कमजोरी दिखाई।
अगली बार सवाल यह हो: “तना कितना मजबूत था?”
मजबूत फसल किस्मत से नहीं बनती।
वह सही समय पर सही विज्ञान से बनती है।
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