पशु के नवजात बछड़ों (Dairy Cattles) को भी शुरुआती 6 महीने तक ख़ास देखभाल की ज़रूरत होती है। बछड़े/बछड़ियां ही आगे चलकर डेयरी उद्योग में काम आएंगे। इसलिए उनके स्वास्थ्य का ध्यान रखना ज़रूरी है। दरअसल, कम उम्र में बछड़े तथा बछड़ियों की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होती है। इसलिए वो कई बीमारियों का शिकार हो सकते हैं। इनसे उनकी मृत्यु भी हो सकती है। इसलिए ज़रूरी है कि पशुपालकों को नवजात बछड़े व बछड़ियों को होने वाले रोगों और उसके उपचार की जानकारी हो।
नवजात बछड़े तथा बछड़ियों को होने वाले रोग दो प्रकार के होते हैं। एक जिनका पता जन्म के समय ही चल जाता है और दूसरे रोग जिनके बाद में होने का खतरा रहता है।
जन्म के समय ही पता चलने वाले रोग
थेलेरियोसिस (Theileriosis)
आमतौर पर ये रोग संकर नस्ल के बछड़े और बछड़ियों में देखा जाता है। इस रोग से पीड़ित होने पर पशुओं को बुखार आता है और आंखें बड़ी दिखती है। ऐसा लगता है कि वो बाहर निकल रही हैं। आंखों की पलके बंद नहीं हो पाती, जिससे आंखें सूख जाती है और लंबे समय तक इस स्थिति में रहने पर आंखों में कीड़े भी लग सकते हैं। इससे आंखें खराब हो सकती हैं।
इसलिए ज़रूरी है कि पशुपालक सतर्क रहें और शुरुआती लक्षण दिखने पर ही डॉक्टर से संपर्क करें, क्योंकि इस अवस्था में दवा से रोग ठीक हो जाता है।
एट्रेसीया एनाई (Atresia Ani)
ये एक बहुत ही गंभीर बीमारी है, क्योंकि इसमें नवजात बछड़े का मलद्वार बंद हो जाता है। इसलिए ज़रूरी है कि तुरंत डॉक्टर से संपर्क किया जाए। सर्जरी के ज़रिए डॉक्टर गोबर निकलने का रास्ता बनाते हैं।

फ्री मारटीन (Freemartinism)
एक गाय जब एक साथ दो बच्चों को जन्म दें और उसमें से एक नर और एक मादा हो तो मादा इस रोग से पीड़ित हो सकती है। दरअसल, इस बीमारी का कारण है कि गर्भ में नर शिशु की ओर से स्रावित अधिक हार्मोन की वजह से मादा शिशु के जननांगों का विकास नहीं होता। इस स्थिति में बछड़ी बड़े होकर भी गर्भधान में असमर्थ रहती है, जबकि नर बछड़े की प्रजनन क्षमता पर कोई असर नहीं पड़ता।
जन्म के बाद होने वाले रोग
दस्त (Diarrhea)
नवजात शिशुओं में ये समस्या एक महीने की उम्र तक ज़्यादा देखी जाती है। दस्त कई कारणों से हो सकता है जैसे ज़्यादा दूध पी लेने से, पेट में संक्रमण या कीड़े की वजह से भी दस्त हो सकते हैं। कई बार बच्चा खूंटे से खुद ही खुलकर ज़्यादा दूध पी लेता है और फिर उसे दस्त हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में डॉक्टर की सलाह पर बछड़े को एंटीबायोटिक्स (Antibiotics) या दूसरी कोई दवा दी जा सकती है। दस्त होने पर शरीर का पानी जल्दी निकलने लगता है। ऐसे में पानी की कमी की समस्या से बचने के लिए बछड़े को ओ.आर.एस. (ORS) का घोल या इंजेक्शन से डेक्ट्रोज-सलाइन दिया जा सकता है।
पेट में कीड़े होना (worms in stomach)
अक्सर देखा गया है कि गाय या भैंस के बच्चों के पेट में कीड़े हो जाते हैं, जिसकी वजह से वो बहुत कमज़ोर हो जाते हैं। इस रोग से बचने के लिए गाय व भैंस को उनके गर्भावस्था के अंतिम दिनों में कीड़े मारने की दवा देनी चाहिए। इसके साथ ही नवजात के 6 महीने तक का होने तक हर डेढ़ या दो महीने पर कीड़े मारने की दवा पिलानी चाहिए।

निमोनिया (Pneumonia)
ये भी नवजात बछड़ों में होने वाली आम बीमारी है। इसमें बुखार आने के साथ ही बछड़े/बछड़ियों के नाक-आंख से पानी निकलने लगता है। नाक से गाढ़ा स्राव भी होता है। ऐसे में वो दूध पीना बंद कर देता है। अगर समय पर इलाज न करवाया जाए तो शिशु की मृत्यु भी हो सकती है। इसलिए तुरंत डॉक्टर की सलाह लें, एंटीबायोटिक या दूसरी दवाएं देकर बीमारी से राहत मिल सकती है।
टायफाइड (Typhoid)
नवजात बछड़ों को होने वाला ये एक बहुत ही गंभीर रोग है और एक से दूसरे को भी फैल सकता है। इसलिए बीमार बच्चे को अलग रखें और उसके आस-पास की जगह को साफ-सुथरा रखें। इस बीमारी का समय पर इलाज न करने से शिशु की मौत भी हो सकती है। इसका इलाज एंटीबायोटिक और दूसरी दवाओं से किया जा सकता है।
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