चौलाई की खेती (Amaranth Cultivation): छोटी जोत वाले किसानों के लिए क्यों है फ़ायदेमंद?

चौलाई से मिलने वाले साग (सब्ज़ी) और दाना (अनाज) दोनों ही नकदी फसलें हैं। चौलाई के खेती में ज़्यादा पानी की ज़रूरत नहीं होती। चौलाई की खेती के लिए प्रति एकड़ करीब 200 ग्राम बीज की ज़रूरत पड़ती है। जानिए चौलाई की खेती से जुड़ी ऐसी कई जानकारियां।

चौलाई की खेती (Amaranth Cultivation)

छोटी जोत वाले किसानों के लिए चौलाई या रामदाना या राजगिरी की खेती करना बहुत फ़ायदेमन्द है, क्योंकि छोटे पैमाने पर भी चौलाई की खेती से बढ़िया कमाई हो जाती है। चौलाई से मिलने वाले साग (सब्ज़ी) और दाना (अनाज) दोनों ही नकदी फसलें हैं।

चौलाई की फसल करीब चार महीने में तैयार हो जाती है। इसका पौधा एक से दो मीटर की ऊँचाई तक बढ़ता है और इस पर लाल और पर्पल रंग के फूल खिलते हैं। इस लेख में हम आपको चौलाई की खेती से जुड़ी कई महत्वपूर्ण बातें बताने जा रहे हैं। 

चौलाई की खेती के लिए उपयुक्त जलवायु

इसकी खेती ज़्यादा ठंडे इलाकों को छोड़ पूरे देश में हो सकती है। इसे गर्मी और बरसात में उगाया जा सकता हैं। गर्मी वाली फसल से अपेक्षाकृत बेहतर उपज मिलती है, क्योंकि इसे जलभराव या अधिक सिंचाई नापसन्द है। गर्मियों वाली चौलाई की रोपाई फरवरी के अन्त में करते हैं तो बरसात वाली फसल के लिए अगस्त-सितम्बर का वक़्त उपयुक्त है।

चौलाई की रोपाई का तरीका, किन बातों का रखें ध्यान? 

कार्बनिक तत्वों से भरपूर खेत में चौलाई अच्छी उपज देती है। इसीलिए बुआई के लिए खेत को तैयार करते वक़्त जैविक या गोबर की खाद का इस्तेमाल बहुत लाभकारी साबित होता है। चौलाई के बीजों की रोपाई छिड़काव और ड्रिल, दोनों तरीकों से करते हैं। छिड़काव विधि में तैयार खेत में बीज छिड़कने के बाद कल्टीवेटर में हल्का पाटा बाँधकर एक बार हल्की जुताई की जाती है। ताकि बीज अच्छे से मिट्टी में दब जाएँ। जबकि ड्रिल विधि में कतारों में बीजों की रोपाई की जाती है। कतारों के बीच आधा फीट की दूरी होनी चाहिए। दोनों तरीकों में बीजों को तहत से 2-3 सेंटीमीटर नीचे गाड़ते हैं। छिड़काव विधि में बीच की खपत 60-65 फ़ीसदी ज़्यादा होती है। रोपाई से पहले बीजों को गोमूत्र से उपचारित करना लाभकारी होता है।

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तस्वीर साभार: ICAR

चौलाई की खेती (Amaranth Cultivation): छोटी जोत वाले किसानों के लिए क्यों है फ़ायदेमंद?सिंचाई प्रबंधन और निराई-गुड़ाई का तरीका 

चौलाई के खेती में ज़्यादा पानी की ज़रूरत नहीं होती। इसीलिए खेतों में नमी कम होता दिखने पर ही सिंचाई करनी चाहिए। अलबत्ता, साग के लिए चौलाई की पत्तियों को तोड़ने के बाद फसल को ज़रा ज़्यादा पोषण की ज़रूरत पड़ती है। ऐसे वक़्त पर जैविक या रासायनिक खाद का इस्तेमाल और हल्की सिंचाई फ़ायदेमन्द रहती है। बेहतर उपज पाने के लिए फसल को खरपतवार और कीड़ों से भी सुरक्षित रखना ज़रूरी है। पूरी फसल के दौरान खेत की दो बार गुड़ाई करनी चाहिए। गुड़ाई के वक़्त पौधों की जड़ों पर हल्की मिट्टी भी चढ़ा देनी चाहिए। चौलाई की हरी पत्तियों की कटाई रोपाई के 30 से 40 दिन बाद करनी चाहिए। फसल पकने तक तीन से चार बार पत्तियों की कटाई की जा सकती है।

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तस्वीर साभार: ICAR

चौलाई की खेती (Amaranth Cultivation): छोटी जोत वाले किसानों के लिए क्यों है फ़ायदेमंद?चौलाई की खेती में कितनी लागत और कमाई?

चौलाई की खेती के लिए प्रति एकड़ करीब 200 ग्राम बीज की ज़रूरत पड़ती है। बीज का दाम करीब 75-80 रुपये बैठता है। फसल पकने पर प्रति एकड़ 3 से 4 क्विंटल रामदाना पैदा होता है। बाज़ार में ये 75-80 रुपये प्रति किलो के भाव से बिकता है। यानी प्रति एकड़ 30 हज़ार रुपये की उपज। इसीलिए इसे छोटी जोत वाले किसानों के लिए बेजोड़ माना जाता है। चौलाई की बुआई के करीब महीने भर इसकी पत्तियाँ भी तोड़ी जाती हैं। इसे बेचने से भी आमदनी होती है। इस तरह चौलाई के दोनों प्रमुख उत्पाद नकदी फसल हैं।

इस सीरीज़ के अगले भाग में हम आपको ICAR द्वारा सुझाई गईं चौलाई की उन्नत किस्मों के बारे में बताएंगे, जिनकी पैदावार किसानों को अच्छी आमदनी दे सकती है।

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