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मल्टीलेयर फ़ार्मिंग: खेती में चमकानी है किस्मत तो अपनाएं Multilayer Farming, जानिए इसके बारे में

परम्परागत खेती से 4 गुना कम लागत में पायें 6 से 8 गुना ज़्यादा कमाई

सारी जानकारियाँ जुटाकर ही किसानों को मल्टीलेयर फ़ार्मिंग को अपनाना चाहिए और फिर पूरी निष्ठा से अपने काम को करना चाहिए। आधे-अधूरे मन से या लापरवाही से या औरों के भरोसे खेती करने वालों के लिए मल्टीलेयर फ़ार्मिंग ज़्यादा फ़ायदेमन्द नहीं हो सकता। इस तकनीक की सफलता इसके उम्दा तरीके से लागू होने पर ही निर्भर करती है। मल्टीलेयर फ़ार्मिंग, कोई जादू-टोना या मंत्र-ओझा का काम नहीं है।

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खेती-किसानी में अपनी किस्मत चमकाने की चाहत रखने वाले किसानों के लिए मल्टीलेयर फ़ार्मिंग (Multilayer Farming) या सह-फसली खेती (Co-cropped farming) या मिश्रित खेती (Mixed farming) की तकनीक सबसे बेहतरीन है। छोटी और मझोली जोत वाले किसान यदि मल्टीलेयर फ़ार्मिंग के गुर सीखकर इसमें महारथ हासिल कर लें तो उनकी आर्थिक-सामाजिक स्थिति का चमत्कारिक कायाकल्प हो सकता है।

मल्टीलेयर फ़ार्मिंग के रास्ते पर आगे बढ़ने के इच्छुक किसानों की इसकी बारीकियों को सीखने के लिए प्रशिक्षण ज़रूर लेना चाहिए। ये प्रशिक्षण किसी अनुभवी किसान या कृषि विशेषज्ञ से ही लेना चाहिए, क्योंकि सिर्फ़ ऐसे व्यक्ति ही ये तय कर सकते हैं कि अलग-अलग इलाकों और विभिन्न जलवायु वाले हमारे देश में अलग-अलग किसानों के लिए मल्टीलेयर फार्मिंग के लिहाज़ से क्या, कैसे और कितना सही और उपयुक्त होगा?

मल्टीलेयर फ़ार्मिंग की तकनीक असिंचित इलाकों के लिए भी बहुत कारगर हो सकती है, क्योंकि इसमें कम पानी और खाद की ज़रूरत पड़ती है। इसकी वजह से फसलों की लागत कम रहती है, जबकि मल्टीलेयर फ़ार्मिंग करने वाले किसानों को बाज़ार में उनकी उपज का वैसा ही दाम मिलता है, जैसा अधिक लागत वाले किसान पाते हैं। मल्टीलेयर फ़ार्मिंग को अपनाने से किसानों के खेत की उर्वरा शक्ति में लगातार बेहतर होती चली जाती है।

मल्टीलेयर फ़ार्मिंग (Multilayer Farming)
तस्वीर साभार: timesofindia

क्या है मल्टीलेयर फ़ार्मिंग?

ये खेती की ऐसी तकनीक या विधि है जिसके तहत एक ही खेत से एक ही सीज़न में एक साथ कई फसलें पायी जाती हैं। लेकिन इसे सूझबूझ के साथ ही करना चाहिए, ताकि ऐसा न हो कि कोई एक फसल दूसरे पर ग़लत प्रभाव पैदा कर सके। इसीलिए मल्टीलेयर फार्मिंग की बारीकियों को समझने के लिए समुचित ट्रेनिंग की बहुत अहमियत है।

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मल्टीलेयर फ़ार्मिंग को और आसानी से समझाने के लिए इसकी तुलना किसी ज़मीन पर बने बहुमंज़िला इमारत से कर सकते हैं। जिस तरह यदि ज़मीन पर सिर्फ़ भूतल बनाया जाएगा तो इस्तेमाल के लिए जितनी जगह उपलब्ध होगी, वो उसके ऊपर बनायी जाने वाली हरेक मंज़िल के साथ उतनी ही गुना बढ़ती जाती है। इसी तरह यदि किसी खेत में एक वक़्त में एक फसल की खेती होगी तो जितनी आमदनी होगी, वो उसी ज़मीन पर एक साथ कई फसले उपजाने पर उसी अनुपात में बढ़ जाएगी जिस अनुपात में फसलों की संख्या होगी।

कैसे लाभदायक है मल्टीलेयर फ़ार्मिंग?

मल्टीलेयर फ़ार्मिंग के फ़ायदे को उदाहरण से समझें तो यदि एक खेत में सिर्फ़ अदरक या हल्दी पैदा किया जाएगा तो वहाँ सिर्फ़ अदरक या हल्दी वाली ही आमदनी होगी, लेकिन यदि इसी खेत में अदरक या हल्दी के साथ ही दो-तीन अन्य फसलें भी उपजायें तो आमदनी का बढ़ना स्वाभाविक है। यही खूबी है मल्टीलेयर फ़ार्मिंग की। इसमें ज़मीन के नीचे पैदा होने वाले पहली लेयर या परत होगी हल्दी या अदरक की, क्योंकि ये कन्द हैं और इनकी प्रमुख विकास ज़मीन के नीचे ही होता है।

मल्टीलेयर फ़ार्मिंग की दूसरी लेयर के रूप में ऐसी फसलों का चुनाव किया जाता है जिनका मुख्य विकास ज़मीन की सतह के ऊपर होता है। जैसे साग-सब्ज़ी वग़ैरह। तीसरी लेयर के लिए इसी ज़मीन पर सूझबूझ के साथ फलदार या इमारती लकड़ियाँ देने वाले पेड़ों को लगाया जाता है। इस क्षेणी में पपीता बेहद लोकप्रिय है क्योंकि इसका पेड़ बहुत बड़ा नहीं होता, ज़्यादा धूप भी नहीं रोकता, इसमें फल भी जल्दी लगते हैं और बाज़ार में दाम भी आसानी से मिल जाता है।

मल्टीलेयर फ़ार्मिंग (Multilayer Farming)

 

चौथी लेयर के रूप में ऐसी फसलें चुनी जाती हैं तो खेत से पोषण तो लें लेकिन जिनका विस्तार बेल या लतर के रूप में उन ढाँचों या मचान वग़ैरह पर फैले जिसे बाँस वग़ैरह से बनाया जाता है। कोई न कोई लतर वाली फसल हर मौसम में होती है। किसानों को बस मौसम के अनुकूल फसल का चयन करके उसे मेड़ों के आसपास या ऐसी जगह पर लगाना पड़ता है, जहाँ से अन्य फसलों पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़े।

इस तरह किसान जब मल्टीलेयर फ़ार्मिंग के लिए अपना खेत तैयार करते हैं, तभी उसमें बाक़ी फसलों के अनुरूप खाद वग़ैरह का इन्तज़ाम करते हैं। किसी एक फसल के लिए की जाने वाली सिंचाई से ही अन्य फसलों की भी पानी की ज़रूरतें पूरी हो जाती हैं। यही विशेषताएँ किसानों को मल्टीलेयर फ़ार्मिंग की ओर आकर्षित करती हैं।

जैविक खेती में आदर्श है मल्टीलेयर फ़ार्मिंग

यदि जैविक खेती की विधियों के साथ मल्टीलेयर फ़ार्मिंग की जाए तो नतीज़े ‘सोने पर सुहागा’ जैसे मिलते हैं। दोनों तकनीक को मिलाकर मल्टीलेयर फ़ार्मिंग करने वाले देश के अनेक किसान ढाई एकड़ की छोटी जोत से भी सालाना 15 लाख रुपये तक की आमदनी कर लेते हैं।

मल्टीलेयर फ़ार्मिंग का एक फसल चक्र चार माह का होता है। इसमें मौसमी सब्ज़ियों जैसे अदरक, हल्दी, लहसुन, प्याज, मूली वग़ैरह के साथ पालक, मेथी, धनिया जैसी पत्तेदार सब्जियाँ उगाई जाती हैं। तीसरी परत के तहत शेड बनाकर लतर वाली फसलें जैसे लौकी, तरोई, करेला, खीरा वग़ैरह लगाते हैं। पॉलीहाउस में खेती करने वालों के लिए तो मल्टीलेयर फ़ार्मिंग का फ़ायदा और बढ़ जाता है।

मल्टीलेयर फ़ार्मिंग और जैविक खेती को यदि गाय-भैंस पालन और ड्रिप इरीगेशन सिस्टम से भी जोड़ लिया जाए तो किसान की कमाई और बेहतर हो सकती है, क्योंकि पशुपालन की बदौलत आसानी से जैविक खाद बना जाएगी और ड्रिप सिस्टम से पानी और ईंधन की बचत होगी। विशेषज्ञों ने हिसाब लगाया है कि यदि किसान इन आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल करके खेती करें तो परम्परागत खेती की तुलना में उनकी कुल लागत जहाँ चार गुना तक कम हो सकती है, वहीं आमदनी 6 से 8 गुना तक बढ़ जाएगी।

मल्टीलेयर फ़ार्मिंग (Multilayer Farming)
तस्वीर साभार: indianmasterminds

मल्टीलेयर फ़ार्मिंग की ट्रेनिंग

मल्टीलेयर फ़ार्मिंग के इच्छुक किसानों को अपने ज़िले के कृषि विज्ञान केन्द्र के विशेषज्ञों से मशविरा लेकर सबसे पहले तो ये समझना चाहिए कि उनके इलाके में इस तकनीक को अपनाने की कितनी गुंज़ाइश है? इसके बाद ये तय करना चाहिए कि उन्हें उचित प्रशिक्षण कैसे और कहाँ से मिलेगा? सारी जानकारियाँ जुटाकर ही किसानों को मल्टीलेयर फ़ार्मिंग को अपनाना चाहिए और फिर पूरी निष्ठा से अपने काम को करना चाहिए। आधे-अधूरे मन से या लापरवाही से या औरों के भरोसे खेती करने वालों के लिए मल्टीलेयर फ़ार्मिंग ज़्यादा फ़ायदेमन्द नहीं हो सकता। इस तकनीक की सफलता इसके उम्दा तरीके से लागू करने में ही है। मल्टीलेयर फ़ार्मिंग, कोई जादू-टोना या मंत्र-ओझा का काम नहीं है।

मल्टीलेयर फ़ार्मिंग के क्षेत्र में बड़ा नाम कमा चुके मध्य प्रदेश के सागर ज़िले के युवा किसान आकाश चौरसिया बताते हैं कि अदरक की कोपलें फूटने में दो महीने लगते हैं। इस दौरान चौलाई का साग तैयार हो जाता है। बारिश में अदरक का बढ़िया दाम मिलता है। इसी तरह गर्मी के जाते ही कुंदरू से बारिश में उपज मिलती रहती है। पाँच फीट की दूसरी पर लगे पपीते फलों से लदे हैं। अदरक के बाद इसी खेत में आलू, बैंगन, करेला और पपीता की लेयर तैयार हो जाएगी। यही सिलसिला साल भर चलेगा, बस फसलें बदलती जाएँगी।

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सम्पर्क सूत्र: किसान साथी यदि खेती-किसानी से जुड़ी जानकारी या अनुभव हमारे साथ साझा करना चाहें तो हमें फ़ोन नम्बर 9599273766 पर कॉल करके या kisanofindia.mail@gmail.com पर ईमेल लिखकर या फिर अपनी बात को रिकॉर्ड करके हमें भेज सकते हैं। किसान ऑफ़ इंडिया के ज़रिये हम आपकी बात लोगों तक पहुँचाएँगे, क्योंकि हम मानते हैं कि किसान उन्नत तो देश ख़ुशहाल।

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