सरगुजा की खेती: मूंगफली, तिल, सूरजमुखी, सोयाबीन, सरसों और असली के तेल के बारे में तो आपने सुना ही होगा और खाते भी होंगे, लेकिन क्या आपने कभी सरगुजा के बारे में सुना है? दरअसल, ये झारखंड के आदिवासी समुदाय की प्रमुख तिलहनी फसल है, जिसका इस्तेमाल वो खाद्य तेल के रूप में करते हैं।
सरगुजा का तेल ओमेगा-3 फैटी एसिड और लिनेलोइक एसिड से भरपूर होता है, जो कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित करने में मदद करता है। खाने के अलावा, इस तेल का इस्तेमाल दवा बनाने के लिए भी किया जाता है। मगर इतना फ़ायदेमंद होने के बाद भी इसका तेल बाकी तेल की तरह लोकप्रिय नहीं है। भारत के तिलहन उत्पादन में सरगुजा तेल का योगदान सिर्फ़ 3 प्रतिशत ही है और इसकी वजह है जानकारी का अभाव।
सरगुजा के बारे में जागरुकता फैलाकर और किसानों को सरगुजा की खेती के लिए प्रेरित करके उनकी आमदनी में इज़ाफ़ा किया जा सकता है, क्योंकि सरगुजा कीखेती विपरित परिस्थितियों में भी की जा सकती है। इसलिए कम उपजाऊ और पानी वाले इलाकों के लिए भी ये फसल उपयुक्त है।
कहां होती है सरगुजा की खेती
सरगुजा की खेती झारखंड के साथ ही राजस्थान, महाराष्ट्रस मध्यप्रदेश, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडू, कर्नाटक, गुजरात, पश्चिम बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश, उड़ीसा और पूर्वोत्तर राज्यों में की जाती है। इसकी खेती मुख्य रूप से झारखंड के जनजातीय समुदाय द्वारा की जाती है। वो इसे आमतौर पर कम उपजाऊ भूमि में लगाते हैं और खाद व उर्वरकों का भी सही तरीके से इस्तेमाल नहीं करते हैं जिससे उपज कम होती है। अगर वैज्ञानिक पद्धति से इसकी खेती की जाए, तो किसानों को अच्छी उपज प्राप्त हो सकती है।
जलवायु और मिट्टी
सरगुजा की खेती 13 से 23 डिग्री तापमान में की जा सकती है। सरगुजा के लिए हल्की बलुई मिट्टी से लेकर भारी काली मिट्टी जिसका पी.एच. मान 5.2 से 7.3 तक हो अच्छी मानी जाती है। इसकी खेती लवणीय मिट्टी में भी की जा सकती है, इसमें पौधों का विकास अच्छी तरह होता है।
खेत की तैयारी
इसकी खेती के लिए पहले देसी हल से खेत में दो बार गहरी जुताई कर पाटा लगा दें। अंतिम जुताई के समय 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से 5% एल्ड्रिन धूल या 10% बी.एच.सी. मिट्टी में मिला दें। इससे दीमक का असर कम हो जाता है।

खाद और उर्वरक
अच्छी फसल के लिए प्रति हेक्टेयर 20 किलो नाइट्रोजन, 20 किलो फॉस्फोरस, 15 किलो पोटाश और 15 किलो सल्फर डालें। यूरिया की आधी और सिंगल सुपर फॉस्फेट व म्यूरेट ऑफ पोटाश की पूरी मात्रा बुवाई के समय डालें। यूरिया की बाकी बची मात्रा बुवाई के 25-30 दिन बाद निराई-गुड़ाई करने के बाद डालें।
सिंचाई और खरपतवार नियंत्रण
इसकी खेती बरसात के मौसम में ही की जाती है। आमतौर पर पानी की आपूर्ति बारिश से हो जाती है, लेकिन लंबे समय तक अगर बारिश नहीं होती है या सूखे की स्थिति हो तो सिंचाई करनी ज़रूरी है। फूल आने से पहले ही सिंचाई करनी चाहिए। खरपतवार नियंत्रण के लिए बुवाई के 20-25 दिन बार हाथ से ही निराई-गुड़ाई की जाती है।
बुवाई का सही समय
इसकी बुवाई अगस्त मध्य से लेकर अंतिम मध्य सितंबर तक की जाती है। बुवाई से पहले बीजों को 8 घंटे तक भिगोकर रखना चाहिए। पंक्ति से पंक्ति और पौधों से पौधों के बीज 30X10 सें.मी. की दूरी रखें। बीज एक समान पूरे खेत में फैले इसके लिए बीज की मात्रा का 10 गुना गोबर, खाद या बालू उसमें मिलाकर बुवाई करें। अगर आप सीधी विधि से बुवाई करते हैं तो प्रति हेक्टेयर 5-6 किलो बीज की ज़रूरत होगी, जबकि छिड़काव विधि से बुवाई करने पर 8 किलो प्रति हेक्टेयर बीज लगता है। बीज को पहले ट्राइकोडर्मा से उपचारित कर लेने से रोग व कीटों का खतरा कम हो जाता है।
उपज और आमदनी
यदि वैज्ञानिक तकनीक से इसकी खेती की जाए तो प्रति हेक्टेयर 5-6 क्विंटल तक बीज प्राप्त हो जाता है। इसकी खेती में कुल लागत प्रति हेक्टेयर करीब 16500 रुपए आती है जबिक प्रति हेक्टेयर 5-6 क्विंटल तक बीज प्राप्त हो जाता है। जिसे बाजार में किसान 50 रुपए प्रति किलो की तरह से बेच सकते हैं। इस तरह किसान प्रति हेक्टेयर 11,000 रुपए का शुद्ध मुनाफा कमा सकते हैं।
सरगुजा की उन्नत किस्में
सरगुजा की कुछ उन्नत किस्में इस प्रकार है जिसकी खेती किसानों के लिए फायदेमंद हो सकीत है- जे.एन.सी.-6, जे.एन.सी.-1, जे.एन.सी.-9, उत्कल नाइजर-150, बिरसा नाइजर-1, बिरसा नाइजर-2, पूजा-1
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