देश के 80 प्रतिशत ऐसे छोटे किसान हैं, जिनके पास 2 हेक्टेयर से कम भूमि है। इन किसानों के लिए एकीकृत कृषि मॉडल (Integrated Farming Model) किस तरह से वरदान साबित हो सकता है, इसके प्रचार-प्रसार में देश के कृषि वैज्ञानिक लगे हुए हैं।
भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान पूसा नई दिल्ली ने छोटे एवं सीमान्त किसानों के लिए 1.0 हेक्टेयर भूमि पर एकीकृत कृषि का एक मॉडल तैयार किया है। 25 जुलाई को पूसा दिल्ली पहुंची उत्तर प्रदेश की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने इस एकीकृत कृषि मॉडल का जायज़ा लिया। राज्यपाल ने एकीकृत कृषि मॉडल (Integrated Farming System, IFS Model) की सराहना की।

इस दौरान ICAR-IARI के निदेशक डॉ. ए.के. सिंह, भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के एग्रोनॉमी डीवीज़न के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. राजीव कुमार सिंह समेत कई प्रतिष्ठित कृषि संस्थानों के वैज्ञानिक और अधिकारी भी मौजूद रहे। आचार्य नरेंद्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय कुमारगंज अयोध्या (NDUAT) के कुलपति डॉ. बिजेंद्र सिंह, चंद्रशेखर आजाद कृषि और प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (CSAUAT) के कुलपति डॉ. डी.आर. सिंह, बिहार कृषि विश्वविद्यालय (BAU) से डॉ एन.पी. सिंह, साथ ही डॉ. आर.के. मित्तल और डॉ. राज सिंह भी उपस्थित रहे।
पूरे साल आमदनी का ज़रिया एकीकृत कृषि मॉडल
भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के एग्रोनॉमी डीवीज़न के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. राजीव कुमार सिंह कहते हैं कि एकीकृत कृषि मॉडल कृषि के क्षेत्र में रोज़गार के अवसर बढ़ाने, परिवार के लिये सन्तुलित पौष्टिक आहार जुटाने, पूरे साल आमदनी के अवसर पैदा करता है। साथ ही मौसम और बाज़ार संबंधी जोखिम को भी कम करने में मददगार है।
डॉ. राजीव कुमार सिंह कहते हैं कि इस तकनीक का मुख्य उद्देश्य किसानों की आमदनी को बढ़ाना है। किसान अपनी मुख्य फसल के साथ-साथ मुर्गी पालन, मछली पालन, मधुमक्खी पालन, रेशम कीट पालन, सब्जी-फल उत्पादन, मशरूम की खेती एक साथ एक जगह पर कर सकते हैं। इसमें एक घटक दूसरे घटक के उपयोग में लाया जाता है। यानी कि पशुओं का अपशिष्ट फसलों के लिए खाद का काम करता है। इससे खाद पर लगने वाली लागत में कमी आती है। एक फसल पर ही निर्भरता न होकर घाटे की संभावना कम हो जाती है।
डॉ.राजीव विस्तार से बताते हैं कि अगर कोई किसान एक हेक्टेयर क्षेत्र में इस तकनीक से खेती करना चाहता है तो लगभग 0.7 हेक्टेयर में फसलों की खेती कर सकता है। इसके लिए फसल चक्र में बरसीम-बेबी कॉर्न, मक्का-सरसों-सूरजमुखी, मक्का-टमाटर-भिंडी, मल्टीकट ज्वार-आलु-प्याज, मक्का-गेहूँ-लोबिया, धान-गेहूँ-लोबिया, लौकी-गेंदा-मल्टीकट ज्वार, अरहर-गेहूँ-बेबी कॉर्न-बैगन-रैटुन बैगन-लोबिया फसलों का उत्पादन कर सकते हैं। इस प्रणाली के अन्तर्गत किसान की कम लागत लगती है क्योंकि ज़्यादा से ज़्यादा उत्पादक सामग्री, जैसे गोबर की खाद, वर्मीकम्पोस्ट की पूर्ति फ़ार्म से ही हो जाती है।

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IFS खेती से आमदनी में इज़ाफ़ा
डॉ. राजीव ने आइएफएस तकनीक को एक उदाहरण के साथ समझाते हुए बताया कि मान लीजिए एक किसान के पास एक हेक्टयर ज़मीन है। इस पर वो पारंपरिक तरीके से धान और गेहूं की खेती करता आ रहा है। इससे उसे साल में डेढ़ से दो लाख लाख रुपये की आमदनी होती है। यही किसान अगर पारंपरिक खेती को छोड़कर एक हेक्टयर में बागवानी, मछली पालन, मुर्गी पालन, बकरी पालन, गौपालन, मशरूम उत्पादन मधुमक्खी पालन जैसी गतिविधियों को अपनाता है तो उसे 4 से 5 लाख रुपये की सालाना आमदनी हो सकती है।
मधुमक्खी पालन और वर्मीकम्पोस्ट से लाभ
इसके अलावा, मधुमक्खी पालन से भी अच्छी कमाई कर सकते हैं। एक बॉक्स की कीमत लगभग 3500 होती है। इस तरह एक बार में एक बॉक्स से 2 किलो शहद प्राप्त होता है। लगभग 10-15 दिन में एक बार शहद निकलने लायक तैयार हो जाता है। इस तरह एक महीने में 4 किलो शहद प्राप्त कर सकते हैं। इसे बाज़ार में बेचकर अच्छा मुनाफ़ा कमा सकते हैं। कृषि-वानिकी प्रणाली के अंतर्गत सहजन की खेती भी कर सकते हैं। सहजन की साल में दो बार फलने वाली उन्नतशील प्रजातियों में पी.के.एम. 1, पी.के.एम. 2, कोयंबटूर 1 और कोयंबटूर 1 प्रमुख हैं। साल में एक पौधे से लगभग 40-50 किलो फल प्राप्त हो जाते हैं।

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