छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव ज़िले के रहने वाले मंजीत सिंह सलूजा को खेती के गुर विरासत में मिले हैं। अपने पिता को देखते हुए 20 साल की उम्र से ही उन्होंने खेती को अपनी कर्मभूमि चुना। शुरू से ही उनमें खेती से जुड़ी नई तकनीकों को सीखने और प्रयोग में लाने की ललक थी। इसी ललक ने आज उन्हें एक संपन्न किसान की उपाधि दी है। उन्होंने कई ऐसे विषयों पर काम किया, कई ऐसी तकनीकों को अपनाया जो खेती के क्षेत्र में बड़े ही कौतुहल से देखीं जाती थीं। करीब तीन दशक से ऊपर वो खेती-किसानी को समर्पित कर चुके हैं और अभी भी ये सिलसिला बदस्तूर जारी है। Kisan of India से ख़ास बातचीत में मंजीत सिंह सलूजा ने किसान अपनी उपज की डायरेक्ट बिक्री कैसे कर सकते हैं, कौन सी योजना की मदद से किसान अपनी उपज को सीधा ग्राहक की थाली तक कैसे पहुंचा सकते हैं, इन सब के बारे में विस्तार से बात की। साथ ही, ऑर्गेनिक फ़ार्मिंग और रासायनिक युक्त खेती को लेकर कई बातें साझा कीं। ज़ीरो बजट प्राकृतिक खेती बनाम रासायनिक खेती का मुद्दा बहुत बड़ा है। इन दोनों तरह की खेती के अलग-अलग पहलू हैं। कृषि क्षेत्र में राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित मंजीत सिंह सलूजा ने इस मुद्दे पर हमसे खुलकर बात की और कई पक्ष रखे।
खेती में अनगिनत तकनीकों का किया प्रयोग
मंजीत सिंह सलूजा बताते हैं कि भारत में ड्रिप इरिगेशन तकनीक 1994 में आई। उस समय ये तकनीक भारत के लिए बिल्कुल नई थी। उन्होंने इस तकनीक को प्रयोग करने का फैसला किया। मंजीत सिंह ने इस तकनीक का इस्तेमाल सब्जी, अनाज और फलों की खेती के लिए करना शुरू कर दिया। उन्होंने राजनांदगांव ज़िले में स्थित अपने शिकारीटोला फ़ार्महाउस में सब्जी की खेती के लिए देश का पहला Open Field Automated Drip Irrigation System लगवाया। जैसे-जैसे समय बीतता गया, उन्होंने सिंचाई के तरीकों, उर्वरीकरण के विकल्पों, बुवाई के तरीकों, फसल चक्र में बदलाव जैसे कई अनगिनत प्रयोग किए। मंजीत सिंह कहते हैं पहले जहां किसान सिंचाई के लिए बारिश के पानी पर निर्भर रहते थे, देश में तकनीक के विस्तार से कई चीज़ें बदलीं। फ्लड इरीगेशन (Flood Irrigation) प्रणाली आई, फिर इरीगेशन स्प्रिंकलर सिस्टम (Irrigation Sprinkler System), ड्रिप इरीगेशन सिस्टम (Drip Irrigation System), माइक्रो ड्रिप इरीगेशन सिस्टम (Micro Drip Irrigation System), नेट हाउस (Net House) और फ़िर पॉलीहाउस (Polyhouse) तकनीक के ज़रिए Protective Cultivation को बढ़ावा मिला। मंजीत सिंह ऐसी ही कई अनगिनत तकनीकों को प्रयोग करने से पीछे नहीं हटे। वक़्त के साथ जैसे-जैसे नई-नई टेक्नॉलजी आती गई, उन्होंने उसे अपनाया।

क्या है Automated Drip Irrigation System?
Automated Drip Irrigation System में सिंचाई से लेकर उर्वरक के छिड़काव से जुड़ी सारी जानकारी मोबाइल पर आ जाती है। मंजीत सिंह ने बताया कि ऑटोमेटेड सिस्टम की मदद से हर बूंद में Fertilizer stock solution बराबर मात्रा में पहुंचता है।
बड़े पैमाने पर करते हैं कई तरह के फल-सब्जियों की खेती
मंजीत सिंह सलूजा के दो फ़ार्म हैं, शिकारीटोला फ़ार्महाउस और सलूजा कृषि फ़ार्म। दोनों ही फ़ार्म्स का कुल क्षेत्रफल करीबन 82 एकड़ है। इनमें खीरा, करेला, लौकी, तुरई, भिंडी, बैंगन, मिर्च, फूलगोभी, पत्ता गोभी, हरी मटर, लोबिया, क्लस्टर बीन, फ्रेंच बीन्स, शिमला मिर्च, टमाटर, चेरी टमाटर, ब्रोकोली, ड्रम स्टिक, अदरक, प्याज, हरी प्याज, धनिया, पुदीना, स्वीट कॉर्न, बेबी कॉर्न, हल्दी जैसी कई सब्जियां और मसाले उगाए जाते हैं।
फलों में पपीता, केला, नींबू, ड्रैगन फ्रूट, गन्ना, स्ट्रॉबेरी, अमरूद, सेब बेर, अंजीर, शहतूत, आम, तरबूज जैसे कई फलों की खेती होती है। इसके अलावा, अनाज की फसलों में चावल, गेहूं, ज्वार, बाजरा, हरा चना, काला चना, लाल चना, तिल जैसी फसलों की खेती भी की जाती है।

खुद को बनाया आत्मनिर्भर, बाज़ार पर निर्भरता की खत्म
मंजीत सिंह अपने फ़ार्म में उगाई गई इन फल-सब्जियों को कहीं बाहर या बाज़ार में नहीं, बल्कि खुद बेचते हैं। राजनांदगांव में ही उनका One Step Ahead- Saluja Unique Vegetable Store के नाम से आउटलेट है। वो जो भी उगाते हैं, अपने इस Vegetable Outlet में ही बेचते हैं। उनका ये आउटलेट फ़ार्म के पास ही बना हुआ है। मंजीत सिंह ने बताया कि अगर कोई ग्राहक सीधा फ़ार्म से फल-सब्जी तोड़ने को कहता है तो उनके सामने ही तोड़कर उन्हें दे देते हैं।

किचन गार्डनिंग (Kitchen Gardening) के आइडिया से हुई आउटलेट की शुरुआत
One Step Ahead पर बात करते हुए मंजीत सिंह बताते हैं कि उन्होंने इसकी शुरुआत छोटे स्तर पर की थी। 2012 में पिता के गुजरने के बाद उनकी पत्नी गुरजीत सिंह सलूजा ने खेती-किसानी में उनका साथ दिया। गुरजीत सिंह सलूजा ने किचन गार्डन की शुरुआत की। किचन गार्डन में जो सब्जियां उगाई जाती, वो रिश्तेदारों को बांट दिया करते। फिर मंजीत सिंह सलूजा के ज़हन में आइडिया आया क्यों न खुद इन सब्जियों को बेचा जाए।
मंजीत सिंह कहते हैं कि उन्होंने सबसे पहले 20 ऐसी सब्जियों की सूची तैयार की, जो कम समय में अच्छी पैदावार दे सकें। इन सब्जियों में उन्होंने रासायनिक उर्वरकों (Chemical Fertilizers) और कीटनाशकों (Pesticides) का न्यूनतम उपयोग किया। अपने इस कान्सेप्ट को उन्होंने ‘Near To Nature’ नाम दिया। उन्होंने किचन गार्डनिंग में पत्तेदार सब्जियों की खेती शुरू की। कीटों से बचाव के लिए एंटीवायरल जाल (Antiviral Nets) लगवाए। बेहतर उपज के लिए नेटहाउस में सब्जी की नर्सरी तैयार की।

ठेला लगाकर बेची सब्जियां
मंजीत सिंह बताते हैं कि उनके किचन गार्डन की पहली सब्जी जो बनकर तैयार हुई, वो थी ककड़ी। उन्होंने अपने एक सहकर्मी को फ़ार्म के बाहर ही इन ककड़ियों को बेचकर आने को कहा। 15 मिनट के अंदर ही सारी की सारी ककड़ियाँ बिक गईं। इस तरह लोग धीरे-धीरे उनके फ़ार्म पर सब्जियां खरीदने के लिए आने लगे। फिर छोटे स्तर पर फ़ार्म के बाहर ही ठेला लगाकर सब्जियां बेचना शुरू किया। ग्राहकों की मांग के हिसाब से भी वो कई फल-सब्जियों की खेती करने लगे।
सब्सिडी का लाभ लेकर करवाया आउटलेट का निर्माण
2013 आते-आते ग्राहकों की संख्या इतनी बढ़ने लगी कि उन्होंने अपने फ़ार्म के बाहर ही एक शेड का निर्माण करवाया। फिर उन्होंने अपने क्षेत्र के बागवानी विभाग (Horticulture Department) से संपर्क किया और Vegetable Outlet खोलने से जुड़ी स्कीम के बारे में जाना। उन्हें पता चला कि इस तरह के आउटलेट के निर्माण के लिए 15 लाख के प्रोजेक्ट लागत पर 35 फ़ीसदी की सब्सिडी दी जाती है। उन्होंने इस सब्सिडी का लाभ लेते हुए 2014 में आउटलेट की शुरुआत की।

हर साल 1 अप्रैल से 15 जून तक आउटलेट रहता है बंद, इसका भी है कारण
ग्राहकों की सुविधा के लिए उन्होंने एक व्हाट्सऐप ग्रुप भी बनाया हुआ है। इस ग्रुप में ग्राहकों को प्रॉडक्ट्स की कीमतों और उपलब्धता के बारे में जानकारी दी जाती है। मंजीत सिंह ने आगे बताया कि उनके आउटलेट के कुछ नियम हैं , जैसे तय कीमत (Fixed Price) पर ही सामान दिया जाता है। सामान लेने के लिए सेल्फ सर्विस और सामान ले जाने के लिए प्लास्टिक कैरी बैग का इस्तेमाल नहीं करते। उनका ये Vegetable Outlet हर साल 1 अप्रैल से 15 जून तक बंद रहता है। बंद रखने को लेकर मंजीत सिंह कहते हैं कि जैसे इंसानी शरीर को भी आराम की ज़रूरत होती है, वैसे ही धरती को भी आराम चाहिए होता है। इस तरह से वो गुणवत्ता और स्वस्थ उपज बनाए रखने के लिए आने वाले साल के लिए अपनी ज़मीन को तैयार करते हैं।
श्रमिकों को बनाया अपना Working Partner
मंजीत सिंह बताते हैं कि एक वक़्त ऐसा भी आया जब उन्हें लेबर की समस्या का सामना करना पड़ा। मेहनताना बढ़ाने के बावजूद कोई हल नहीं निकला। फिर उन्होंने अपने यहां काम कर रहे लोगों को अपना कार्यकारी पार्टनर (Working Partner) बनाने का फैसला किया। इस Working Partner Policy के अंतर्गत 100 रुपये की सब्जी उगाने पर 25 रुपये उस श्रमिक की जेब में जाते। उर्वरक, बीज, पानी, और बिजली की उपलब्धता के खर्चे की ज़िम्मेदारी मंजीत सिंह ने अपने ऊपर ली। मंजीत सिंह ने बताया कि आज उनके फ़ार्म के कुछ श्रमिक ऐसे भी हैं, जो पिछले कई साल से उनके साथ काम कर रहे हैं। आज उनके साथ 150 से ज़्यादा सहकर्मी काम करते हैं।

किसानों को सलाह- “शोषण नहीं करना और शोषित भी नहीं होना”
भावी किसानों को सलाह देते हुए मंजीत सिंह कहते हैं कि खेती-किसानी धैर्य, दृढ़ संकल्प, मेहनत और जुनून की परिचायक है। “शोषण नहीं करना और शोषित भी नहीं होना”, मंजीत सिंह कहते हैं कि उनके पिता द्वारा कही ये बात वो हमेशा अपने से गांठ बांधकर रखते हैं। मंजीत सिंह ने कहा कि अगर आप किसी का शोषण कर रहे हैं तो आप एक हत्यारे के समान हैं और अगर आप शोषित हो रहे हैं तो वो आत्महत्या करने जैसा है। इसलिए बतौर किसान आपको अपनी आंखें खुली रखनी चाहिए। खेती का क्षेत्र एक बड़े दांव की तरह है। ये पल में राजा को रंक और रंक को राजा बना देता है, लेकिन कभी इसने भूखा नहीं मारा। मंजीत सिंह आगे कहते हैं कि अगर खेती ने चार साल नुकसान दिया है तो पांचवें साल इतना दिया कि पिछले चार साल के नुकसान की भरपाई हो गई।
क्या है रीटेल आउट्लेट स्कीम?
मंजीत सिंह कहते हैं Retail Vegetable Outlet खोलने को लेकर सरकार की रीटेल आउटलेट स्कीम है। कई किसान इस स्कीम का लाभ उठा रहे हैं। छोटे किसान भी समूह बनाकर इस स्कीम का लाभ ले सकते हैं। उदाहरण देते हुए मंजीत सिंह कहते हैं कि समूह के किसान आपस में तय कर लें कि कौन सा किसान कौन सी सब्जी उगाएगा। सबकी ज़िम्मेदारी निर्धारित कर लें। कौन टमाटर, कौन कद्दू और कौन प्याज उगाएगा। अगर आप आउटलेट खोलने के बारे में सोच रहे हैं तो सिर्फ़ एक सब्जी रखकर आप आउटलेट नहीं चला सकते। आउटलेट में सब्जियों के जीतने विकल्प आप रखेंगे, उतने ग्राहक आपके पास आएंगे। समूह में रहकर मिल-जुलकर काम करना होगा। मंजीत सिंह ने कहा कि महिला सहायता समूहों के लिए ये स्कीम बहुत ही फ़ायदेमंद है। इस स्कीम के तहत आउटलेट का ढांचा बनाने के लिए 35 प्रतिशत की सब्सिडी दी जाती है, जिसकी अधिकतम सीमा 15 लाख रुपये तक होती है। इसके बारे में जानकारी लेने के लिए आप अपने क्षेत्र के बागवानी विभाग से संपर्क कर सकते हैं। अपने ज़िले के NABARD कार्यालय से भी जानकारी प्राप्त का सकते हैं। इसके अलावा, नज़दीकी सार्वजनिक सेवा केंद्रों (Common Service Centres) में जाकर जानकारी ले सकते हैं।
क्यों मंजीत सिंह कहते हैं भारत के लिए सही नहीं जैविक खेती (Organic Farming)?
जैविक खेती (Organic Farming) को लेकर मंजीत सिंह सलूजा दो टूक शब्दों में कहते हैं कि वो इसके पक्ष में नहीं रहे हैं। उनका मानना है कि शायद ऑर्गेनिक फ़ार्मिंग भारत के लिए सही नहीं है। उनका कहना है कि अजैविक प्रॉडक्ट्स की तुलना में ऑर्गेनिक प्रॉडक्ट्स 25 फ़ीसदी महंगे दामों में बिकते हैं। वो कहते हैं कि हमारे देश में ज़्यादा आबादी ऐसे लोगों की है जो इतने पैसे खर्च करने में सक्षम नहीं हैं। जब भी ऐसे लोग बाज़ार में जाते हैं वो ये नहीं पूछते कि सब्जी ऑर्गेनिक है या नहीं, वो सीधा खरीद लेते हैं। मंजीत सिंह कहते हैं कि इसलिए ज़रूरी ये है कि किसानों को उर्वरक के सही इस्तेमाल की जानकारी दी जाए। हर उर्वरक के इस्तेमाल करने की एक तय मात्रा होती है। इसलिए ज़रूरी है कि उर्वरक के अति उपयोग को कम किया जाए। कृषि वैज्ञानिकों, कृषि संस्थाओं की ज़िम्मेदारी है कि किसानों को उर्वरकों के इस्तेमाल को लेकर सरकार द्वारा बनाये गए दिशा-निर्देशों के बारे में जागरूक किया जाए।

केमिकल उपयोग को लेकर जानकारी का अभाव?
मंजीत सिंह ने कहा कि अगर किसान सरकार द्वारा निर्धारित उर्वरक उपयोग दिशा-निर्देशों (fertilizer Use Guidelines) का पालन करेंगे तो कोई नुकसान नहीं होगा। मिट्टी भी स्वस्थ रहेगी और लोगों की सेहत भी। मंजीत सिंह कहते हैं कि अगर कोई किसी पौधे को गोबर या खाद के रूप में नाइट्रोजन देता है, तो वो नाइट्रोजन भी पहले नाइट्रेट फ़ॉर्म में तब्दील होगा। कहीं न कहीं ये भी केमिकल युक्त खेती है। वो कहते हैं इस विषय पर उनका ज़ीरो बजट प्राकृतिक खेती के जनक कहे जाने वाले सुभाष पालेकर से भी वाद-विवाद रहा है।
वो बताते हैं कि हर उर्वरक और दवाई के असर की एक तय सीमा होती है। अगर किसी दवा की प्रभावी सीमा 3 महीने की है, तो आप ऐसे समय में उसे डालिए जब आपको पता हो कि इस पौधे पर तीन महीने से पहले फल नहीं आएंगे। इन तीन महीनों में अगर फल आते हैं तो उन फलों का इस्तेमाल न करें और न ही उसे आगे दें। यहां किसानों को अपनी ज़िम्मेदारी तय करने की भी ज़रूरत है।

सरकार खरीद-बिक्री की देती है इजाज़त, संस्थान और वैज्ञानिक निभाएं अपनी भूमिका
मंजीत सिंह कहते हैं कि एक पौधे को जितने पोषक तत्वों की ज़रूरत होती है, वो उतना ही लेता है। अगर कोई किसान 600 ग्राम उर्वरक डालता है तो पौधा 100 ग्राम ही लेगा। बाकी मिट्टी सोख लेगी। ऐसे करते-करते यकीनन मिट्टी की उपजाऊ क्षमता पर खराब असर पड़ेगा। वहीं कुछ उर्वरक मिट्टी के ज़रिए भूमिगत पानी (Underground Water) में मिल जाएंगे। इसके सेवन से इंसान की सेहत पर भी असर पड़ेगा। इसके लिए किसानों को Insecticides and fertilizers के इस्तेमाल को लेकर शिक्षित करना बहुत ज़रूरी है। मंजीत सिंह कहते हैं जब सरकार उर्वरकों के इस्तेमाल करने को लेकर लाइसेन्स और इसकी बिक्री कर रही है तो वैज्ञानिकों की ज़िम्मेदारी है कि वो इसके सही इस्तेमाल को लेकर किसानों को बताएं। हर ब्लॉक से पाँच किसानों का समूह बनाएं। उनके खेतों में कीटनाशक और उर्वरकों के इस्तेमाल का प्रोजेक्ट ट्रायल चलाएं। बुवाई से लेकर कटाई के बीच की हर प्रक्रिया पर नज़र रखें। किसान को नतीजे दिखेंगे तो Insecticide and fertilizer का सही इस्तेमाल करेगा और दूसरे किसानों को भी इसके लिए प्रेरित करेगा।

कई पुरस्कारों से सम्मानित
2013 में महिंद्रा एग्री टेक द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में उन्हें पश्चिम क्षेत्र के लिए ‘कृषि सम्राट सम्मान’ के अवॉर्ड से नवाज़ा गया। 2013 में ही उन्हें ‘इनोवेटिव फ़ार्मर’ के पुरस्कार से पंजाब कृषि विभाग ने सम्मानित किया। 2014 में कृषि मंत्रालय और महाराष्ट्र सरकार द्वारा सीआईसीआर नागपुर में ‘कृषि वसंत’ नाम से आयोजित एक एग्रीकल्चर फेयर में उन्हें ‘बागवानी में छत्तीसगढ़ के सर्वश्रेष्ठ किसान’ का पुरस्कार मिला। इसके अलावा, मंजीत सिंह सलूजा छत्तीसगढ़ राजनांदगांव के राष्ट्रीय बागवानी मिशन और कृषि प्रौद्योगिकी प्रबंधन एजेंसी (ATMA) के सक्रिय सदस्य हैं। वो इन संस्थानों द्वारा आयोजित कार्यक्रमों में अन्य किसानों और कृषि अधिकारियों के साथ अपने अनुभव साझा कर खेती-किसानी की बारीकियों के बारे में जानकारी देते हैं।
सम्पर्क सूत्र: किसान साथी यदि खेती-किसानी से जुड़ी जानकारी या अनुभव हमारे साथ साझा करना चाहें तो हमें फ़ोन नम्बर 9599273766 पर कॉल करके या kisanofindia.mail@gmail.com पर ईमेल लिखकर या फिर अपनी बात को रिकॉर्ड करके हमें भेज सकते हैं। किसान ऑफ़ इंडिया के ज़रिये हम आपकी बात लोगों तक पहुँचाएँगे, क्योंकि हम मानते हैं कि किसान उन्नत तो देश ख़ुशहाल।

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